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कावेरी नदी विवाद | Cauvery River dispute in Hindi

120 साल पुराने कावेरी नदी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला  | supreme court judgment on 120-Year-Old cauvery dispute in Hindi

ब्रिटिश शासन काल से ही तमिलनाडु और कर्नाटक राज्य के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर हक की लड़ाई चलती आ रही है. कावेरी नदी के पानी के हक से जुड़ा ये विवाद लगभग 120 साल पुराना है. वैसे तो इस मामले में बहुत बार कोर्ट द्वारा कई फैसले किए जा चुके है. लेकिन ये विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा है और दोनों राज्यों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. वहीं 16 फरवरी 2018 को इस मसले पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायमूर्ति की एक बेंच की उपस्थिति में एक फैसला सुनाया गया है. कोर्ट के फैसले के अनुसार तमिलनाडु को दिए जानेवाले पानी में कटौती की गई है और अब इस राज्य को 404.25 टीएमसीएफ (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) पानी ही मिल पायेगा. इस नए फैसले से तमिलनाडु को कावेरी नदी का 14.75 टीएमसीएफ पानी काटकर कर्नाटक को दिया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार अब कर्नाटक को 177.25 टीएमसीएफ पानी अपने अंतरराज्यीय बिलीगुंडलू बांध से छोड़कर तमिलनाडु को देना होगा. कोर्ट ने बेंगलुरु निवासियों की पानी की आवश्यकता को मद्देनजर रखते हुए इस फैसले को लिया है. कर्नाटक को नदी के जल का 4.75 टीएमसीएफ भाग पीने के लिए और 10 टीएमसीएफ सिंचाई के लिए दिया जाएगा. वहीं अन्य भूमिगत आवश्यकताओं के लिए कुल 14.25 टीएमसीएफ जल देना का फैसला लिया गया है. इतना ही नहीं इस जल आवंटन के फैसले को 15 वर्षों तक के लिए लागू किया गया है. जबकि केरल को मिलने वाला 30 टीएमसीएफ पानी एवं 7 टीएमसीएफ पानी जो कि पांडुचेरी को मिलता है. अभी भी 15 वर्षों के लिए इसी तरह मिलता रहेगा.

कावेरी नदी विवाद पर साल 2007 में जल आवंटन का फैसला  (Cauvery water dispute verdict)

2007 में कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले के आधार पर 419 टीएमसीएफ पानी यानी 58% पानी तमिलनाडु को मिलता था. वहीं 284.75 टीएमसीएफ यानी पानी का 37 प्रतिशत कर्नाटक को इस्तेमाल करने को मिलता था. बाकी का बचा हुआ 4 प्रतिशत यानी 30 टीएमसीएफ केरल को और एक प्रतिशत यानी 7 टीएमसीएफ पांडुचेरी को भी दिया जाता था. वहीं 2 फरवरी 2007 में आए इस फैसले के विरूद्ध पिछले कुछ महीनों पहले याचिका दायर की गई थी. जिसमें तमिलनाडु ने ज्यादा पानी की मांग रखी थी, उसी तरह कर्नाटक भी अपने लिए पानी की सीमा बढ़ाने के लिए मांग कर रहा था और इसी फैसले की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई है. 

कावेरी नदी की जानकारी (Information about Cauvery river)

भारत के दक्षिणी भाग में बहने वाली कावेरी नदी, हमारे देश की सबसे बड़ी नदियों में से एक है. ये नदी तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल सहित पांडुचेरी में भी बहती है. कावेरी नदी का पूरा क्षेत्र लगभग 81115 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. जिससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितनी बड़ी नदी है. ये नदी तालकावेरी, कोडागु नाम के स्थान यानी की कर्नाटक राज्य से शुरू होती है और अंत में बंगाल की खाड़ी में जाकर अपनी यात्रा पूरी करती है. इस नदी के जल का उपयोग मुख्यता सिंचाई प्रणाली और जलविद्युत शक्ति के लिए किया जाता है. वहीं ऊपर बताए गए सभी राज्य इस नदी का अधिक से अधिक पाना चाहते हैं. जिस वजह से इसका पानी बार-बार झगड़े का कारण बन जाता है. 

आजादी से पहले कावेरी नदी का विवाद  (Cauvery water dispute history )

19 वीं शताब्दी के समय कावेरी नदी पर कई परियोजनाएं बनाई गयी थी. उस समय अंग्रेजी हुकूमत का बोलबाला था. मैसूर एवं मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच कुछ फैसले भी हुए. कावेरी भारत की बड़ी नदियों में से एक है, जिसको दक्षिण भारत की पवित्र नदी एवं साउथ गंगा भी कहा जाता है. ब्रिटिश सरकार एवं मैसूर के राजा के मध्य 1892 में एक समझौता हुआ था. जिसके आधार पर पानी दिया जा रहा था. मोदस वेवान्दी नाम की सभा का आयोजन किया गया था, जिसमे सफलता पूर्वक शांति से फैसला ले लिया गया था. लेकिन 1910 में मैसूर के राजा चाहते थे कि वहां की फसलों एवं खेती को और अच्छा किया जाए. उसके बाद मैसूर की पानी की जरुरत काफी बढ़ गई थी. लेकिन ब्रिटिश नहीं चाहते की मैसूर इसके इस्तेमाल करने की सीमा में बढ़ोत्तरी करें. 1910 में मैसूर के राजा नलवाड़ी कृष्णराज वोडेयार एवं मुख्य इंजीनियर एक बांध बनाने का प्रस्ताव लेकर आए. जो कि कन्नमबाडी गांव में बनाया जाना था. जिसकी क्षमता 41.5 टीएमसीएफ पानी को रोकने की थी. जिसके बाद ब्रिटिश ने दो अधिकारीयों को इस परियोजना की जांच के लिए भेजा. जिन्होंने फैसला लिया कि बांध को 11 टीएमसीएफ की क्षमता का ही बनाया जाना चाहिए. साल 1924 में फिर एक समझौते के तहत 50 साल के लिए एक नियम बनाया गया था.

आजादी के बाद का कावेरी नदी विवाद  (information about cauvery water dispute After independence)

  • भारत की स्वतंत्रता के बाद 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों को बांटा गया. उसी समय राज्य की सीमाओं में परिवर्तन देखने को मिला. जिसके बाद केरल और यूनियन टेररिएट्री पांडुचेरी की सीमा में भी कावेरी का कुछ हिस्सा आने लगा. जिसके चलते इन दोनों राज्यों ने भी पानी की मांग शुरू कर दी, कोडागु यानी कावेरी का जन्म स्थान मद्रास में चला गया था. इसके बाद 1960 में जब इस समझौते पत्र की वैद्यता खत्म होने को थी. राज्य एवं केंद्र सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया.
  • 1970 में कावेरी फैक्ट फाइंडिंग समिति को इस समस्या से निपटने के लिए ये मामला सौंप दिया गया. अपनी जांच पड़ताल पूरी करने के बाद समिति ने साल 1972 को संसद में कावेरी नदी के विवाद पर अपनी रिपोर्ट को पेश किया. इसके 4 साल बाद यानी सन् 1976 में जगजीवन राम की केंद्र सरकार ने राज्यों की सरकारों के साथ मिलकर सीएफएफसी के बिल को पास किया. जिसके बाद कर्नाटक ने हरंगी बांध का निर्माण कार्य शुरू कर दिया. जिसके विरोध में तमिलनाडु ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया एवं निर्माण कार्य को स्थगित करने की गुहार लगाई. इसके लिए तमिलनाडु ने इंटरस्टेट रिवर वाटर डिस्प्यूट एक्ट (आईएसडब्लूडी) 1956 के नियम का सहारा लिया.
  • साल 1993 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कर्नाटक सरकार पर आरोप लगाया कि इस राज्य द्वारा उनके राज्य को तय पानी नहीं दिया जा रहा हैं. जिसको लेकर उन्होंने भूख हड़ताल करना शुरू कर दिया था, जिसके फलस्वरूप कर्नाटक सरकार ने जवाब दिया की इसके पीछे का कारण राज्य में पड़ने वाला सूखा है. इसलिए वो समझौते के अनुसार पानी देने में असमर्थ है.
  • उसके बाद सन् 1998 में सीआरए यानी कावेरी रिवर अथॉरिटी बनाई गई. जिसको कावेरी नदी के झगड़े एवं पानी के बंटवारे के बारे में समझौता करने की जिम्मेदारी दी गई. इस अथॉरिटी में भारत के प्रधानमंत्री को अध्यक्ष एवं बाकी चारों राज्यों के मुख्य मंत्रियों को सदस्य बनाया गया.
  • वर्ष 2002 में फिर से कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों में सूखा पड़ा गया. जिसके चलते संसद से लेकर सड़कों तक हंगामा किया गया. इतना ही नहीं तमिलनाडु को पर्याप्त पानी ना मिलने के कारण वहां के किसानों ने भी प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. वहीं तमिलनाडु के एक किसान ने परेशान होकर कावेरी नदी में कूदकर हत्या कर ली.
  • उसके बाद आगे के आने वाले तीन साल में मानसून के अच्छे होने की वजह से दोनों राज्यों के बीच अच्छे सम्बन्ध हो गए. वहीं साल 2007 में कोर्ट ने फैसला लिया कि तमिलनाडु को 58% पानी दिया जाएगा. लेकिन कनार्टक राज्य ने कोर्ट के इस फैसले का विरोध किया और कहा कि ये फैसले एक तरफा दिया गया है. 

वर्ष 2007 के फैसले के बाद का विवाद 

साल 2012 में सातवीं बार सीआरए की मीटिंग बुलाई गई जो कि मनमोहन सिंह जी की अगुआई में की गई. जिसमें कर्नाटक को 0.8 टीएमसीएफ पानी प्रतिदिन छोड़ने को कहा गया. लेकिन कर्नाटक सरकार ने एक बार फिर मौसम का हवाला देकर इस सहमति को मानने से मना कर दिया. जिसके बाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के व्यवहार को शर्मनाक बताया और कहा कि कर्नाटक सरकार ने ये गलत किया है. वहीं जयललिता ने तमिलनाडु के साथ हो रही नाइंसाफी को बार-बार प्रधानमंत्री के सामने रखा. पहले उन्होंने मनमोहन जी से कर्नाटक के खिलाफ कार्यवाही करने को कहा. उसके बाद 2014 में एनडीए की सरकार के आने के बाद नरेंद्र मोदी जी को भी पत्र लिखा. 2015 में लिखे गए इस पत्र में प्रधानमंत्री जी से गुहार लगाई गयी थी कि वो कर्नाटक को कम से कम 27.557 टीएमसीएफ पानी, सितम्बर तक तमिलनाडु को देने के लिए आदेश दे दें.

वहीं भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक सरकार को आदेश दिए, कि वो 10 दिनों तक के लिए तमिलनाडु की मदद करे और हर दिन इस राज्य को 15,000 क्यूसेक पानी दे. ये आदेश 5 सितम्बर 2016 को दिया गया था, जिसके बाद कर्नाटक में धरना दिया गया. हालांकि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पानी जरूर दे दिया. फिर 9 सितम्बर को कर्नाटक ने पानी में 3000 क्यूसेक कटौती कर दी दिया. जिससे की तमिलनाडु को केवल 12,000 क्यूसेक पानी ही मिल पाया. इसके बाद भी कर्नाटक ने फिर से कई बार नियमों का उल्लंघन किया और कहता रहा कि वो तमिलनाडु इतना पानी नहीं छोड़ सकता. वहीं हाल ही में कोर्ट ने इस मसले पर अपना फैसला सुना दिया है और इस फैसले में कर्नाटक को फायदा हुआ है. कर्नाटक को अब 14.25 टीएमसीएफ पानी कम छोड़ने को कहा गया है.

 

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