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म्यूच्यूअल फंड क्या है, प्रकार, सीमा लाभ एवं हानि | Mutual Fund Type benefits and Loss In India in hindi

म्यूच्यूअल फंड और डेब्ट म्यूच्यूअल फंड क्या है, प्रकार, सीमा लाभ एवं हानि | What is Mutual Fund and Debt Mutual Funds, Type  benefits In India in hindi

म्यूच्यूअल फण्ड एक तरह का इन्वेंस्टमेंट इंस्ट्रूमेंट है, जहाँ पर एक बड़ी संख्या में निवेशक एक साथ अपना धन जमा करते हैं और ये जमा धन एक म्यूच्यूअल फण्ड का निर्माण करता है. इसके उपरान्त निवेशक बाज़ार के विभिन्न वित्तीय ख्सेत्रों में इस धन का निवेश कर्ता है. इस निवेश पर ही निवेशकों द्वारा लगाये गये धन का रिटर्न अथवा रिस्क निर्धारित होता है. निवेशकों के धन को बराबर हिस्सों में बाँट दिया जाता है, जिसे यूनिट कहा जाता है.

म्यूच्यूअल फण्ड की संरचना (Mutual Fund Structure)

म्यूच्यूअल फण्ड की संरचना को निम्न भागों में बांटा गया है.

  • स्पोंसर : स्पोंसर वह आदमी होता है, जो म्यूच्यूअल फण्ड अथवा ट्रस्ट सेट करता है. स्पोंसर को म्यूचुअल फण्ड में निवेशित राशि का कम से कम 40 प्रतिशत निवेश करना होता है. स्पोंसर पर हानि का दायित्व नहीं होता है.
  • ट्रस्ट : इंडियन ट्रस्ट एक्ट 1882 के अनुसार म्यूच्यूअल फण्ड को एक ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया जाता है. ट्रस्ट के दस्तावेज़ भारतीय पंजीकरण अधिनियम 1908 के अंतर्गत बनते हैं और ट्रस्ट पंजीकृत होता है.
  • ट्रस्टी : ट्रस्टी मुख्य तौर पर एक कॉर्पोरेट बॉडी होती है, जिसका मुख्य दायित्व यूनिट होल्डर के लाभ को सुरक्षित रखना होता है.
  • एसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) : एएमसी का चुनाव ट्रस्टी द्वारा होता है. एएमसी को एसईबीआई द्वारा अनुमोदित होना चाहिए.
  • संरक्षक : कोई ट्रस्ट कंपनी, बैंक अथवा इसी तरह के आर्थिक संस्थान, जो एसईबीआई से अनुमोदित हो, म्यूच्यूअल फण्ड के निवेशकों के निवेश को सुरक्षा प्रदान करते है.
  • रजिस्ट्रार और ट्रान्सफर एजेंट : रजिस्ट्रार और ट्रान्सफर एजेंट का चयन एएमसी द्वारा होता है. रजिस्ट्रार सभी आवेदन पत्रों का नियमन करता है, वहीँ ट्रान्सफर एजेंट निवेशकों से बात करता है और उनके रिकार्ड्स को समय दर समय अपडेट करता रहता है.

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म्युचुअल फण्ड के प्रकार (Mutual Fund Types in hindi)

निवेश सुविधा और निवेशकों के आधार पर म्यूच्यूअल फण्ड विभिन्न तरह के होते हैं. इन सभी के विषय में नीचे आवश्यक विवरण दिया जा रहा है.

  • संरचना के अनुसार :
  1. ओपन एंडेड स्कीम्स : ये म्यूच्यूअल फण्ड के यूनिट्स साल में किसी भी समय खरीदा और बेचा जा सकता है. इसके यूनिट्स का क्रय- विक्रय एनएवी के अंतर्गत होता है. मुख्य तौर पर ये फण्ड निवेशक को ये आज़ादी देता है कि वो जब तक चाहे तब तक इस फण्ड में पैसे लगा सकता है. इसमें पैसे लगाने की कोई सीमा नहीं है. निवेशक अपने मन मुताबिक़ पैसे लगा सकता है. इस फण्ड में निवेश करने के लिए अतिरिक्त शुल्क भी देना पड़ता है.
  2. क्लोज्ड एंडेड स्कीम : क्लोज्ड एंडेड स्कीम के यूनिट्स इसके शुरू होने के समय ख़रीदे जा सकते हैं. साल के मध्य में इस योजना पर निवेश नहीं किया जा सकता है. इस फण्ड के यूनिट्स इनके मिच्योरिटी के बाद बेचे जा सकते हैं. इस स्कीम में लिक्विडिटी लाने के लिए कभी कभी इस फण्ड को स्टॉक एक्सचेंज से भी जोड़ दिया जाता है. इसके यूनिट स्टॉक मार्केट की सहायता से ही बेचा जा सकता है.
  3. इंटरवल स्कीम : इस स्कीम में ओपन और क्लोज्ड दोनों तरह की सुविधा पायी जाती है. मसलन इसके यूनिट की ओपन एंडेड स्कीम की तरह फण्ड कार्यकाल के दौरान पुनः खरीद की जा सकती है. म्यूच्यूअल कंपनी का फण्ड मैनेजमेंट वैद्य समय अंतराल के दौरान पूर्व स्थापित यूनिट होल्डर से शेयर खरीदने की सुविधा देते हैं.
  • संपत्ति वर्ग के आधार पर :

एसेट क्लास के अंतर्गत निम्न म्यूच्यूअल फण्ड मौजूद हैं.

  1. इक्विटी फण्ड : ये वैसे म्यूच्यूअल फण्ड हैं, जिनका निवेश इक्विटी स्टॉक अथवा शेयर कंपनियों में होता है. इन्हें मुख्यतः ‘हाई रिस्क’ फण्ड माना जाता है किन्तु इसमें पाए जाने वाले रिटर्न भी बहुत अधिक लाभ वाले होते हैं. इस फण्ड के अंतर्गत कुछ विशेष रुपी फण्ड मसलन इंफ्रास्ट्रक्चर, जल्दी चलने वाले उपभोक्ता सामान, बैंक आदि भी शामिल हो सकते हैं.  
  2. डेब्ट फण्ड : ये वे फण्ड है, जिनका निवेश डेब्ट इंस्ट्रूमेंट जैसे, सरकारी बांड, कंपनी डिबेंचर अथवा फिक्स इनकम एसेट में किया जाता है. इस तरह के निवेश को ‘सेफ इन्वेस्टमेंट’ कहा जाता है और इसमें मिलने वाला लाभ पूर्व निश्चित होता है. इस फण्ड के रिटर्न में टैक्स नहीं लगता है अतः यदि निवेशक को 10,000 रू से अधिक का लाभ होता है, तो वो खुद से इसका टैक्स दे सकता है.
  3. मनी मार्केट लिक्विड फण्ड : इस तरह के फण्ड का निवेश टी- बिल, cp आदि में किया जाता है. इस तरह के निवेश को भी ‘सेफ इन्वेस्टमेंट’ के अंतर्गत रखा जाता है. इसमें पाए जाने वाला रिटर्न जल्द मिलता है और ये रिटर्न औसत होता है. मनी मार्किट फण्ड को काश मार्किट फण्ड की तरह भी देखा जाता है. इस तरह के फण्ड में निवेश करने से पहले निवेशक को ये ध्यान रखना चाहिए कि इसमें ब्याज रिस्क, पुनः निवेश रिस्क और क्रेडिट रिस्क होता है.  
  4. बैलेंस अथवा हाइब्रिड फण्ड : ये वैसे फण्ड हैं, जो ‘मिक्स एसेट क्लास’ में निवेश करता है. इस फण्ड में कहीं कहीं इक्विटी एसेट्स डेब्ट से अधिक होता है. इसमें होने वाले रिस्क और रिटर्न दोनों लगभग सामान ही होते हैं. इस फण्ड का एक बेहतर उदाहरण फ्रेंक्लिन इंडिया के बैलेंस फण्ड- DP (G) में देखा जा सकता है. इस फण्ड में निवेश किये गये धन का 65 से 80 प्रतिशत इक्विटी फण्ड तथा बाक़ी हिस्सों का निवेश डेब्ट फण्ड में किया जाता है.
  • निवेश उद्देश्य के आधार पर :
  1. ग्रोथ स्कीम्स : इस स्कीम के अंतर्गत धन प्राथमिक रूप से इक्विटी स्टॉक में लगाया जाता है, जिसका सिर्फ एक ही मकसद होता है एक बड़ा लाभ. अतः इसे रिस्की भी माना जाता है. हालांकि एक लम्बे समय तक इसी में निवेश करने की योजना इसके रिस्क को कम कर देती है.
  2. इनकम फण्ड : इस स्कीम के तहत निवेश किया गया धन फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है. इस तरह के इंस्ट्रूमेंट में आम तौर पर विभिन्न तरह के बांड और डिबेंचर होते हैं. इस फण्ड में निवेश करने का मुख्य उद्देश्य एक नियमित लाभ और निवेश की सुरक्षा होती है.
  3. लिक्विड फण्ड : इस फण्ड के अंतर्गत निवेश धन का प्रयोग अल्प समय के इंस्ट्रूमेंट मसलन टी- बिल, CPs आदि में किया जाता है, जिसका मकसद निवेश में प्रवाह बनाए रखना होता है. म्यूच्यूअल फण्ड में कम समय के लिए पैसे लागने वाले लोगों के लिए ये बहुत कारगर फण्ड है, क्योंकि इसमें रिस्क बहुत कम होता है.
  4. टैक्स सेविंग फण्ड : टैक्स सेविंग फण्ड में निवेशित धन का प्रयोग मुख्यतः इक्विटी शेयर के लिए किया जाता है. इसमें इनकम टैक्स का प्रभाव होता है. ये एक ‘हाई रिस्क’ स्कीम है, किन्तु यदि निवेशित धन अच्छा प्रदर्शन करता है, तो इस स्कीम में एक बड़े लाभ के मिलने की सम्भावना होती है.
  5. कैपिटल प्रोटेक्शन फण्ड : इस तरह के फण्ड में निवेशित धन को दो भागों में बाँट कर एक भाग फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट तथा दूसरे भाग को इक्विटी इंस्ट्रूमेंट में लगा दिया जाता है. ऐसा करने का मुख्य मकसद निवेशित धन को सुरक्षित करना होता है.
  6. फिक्स्ड मैच्योरिटी फण्ड : ये वैसे फण्ड हैं जिनमे निवेशित धन का एक हिस्सा डेब्ट और दूसरा हिस्सा मनी मार्किट में लगाया जाता है. मनी मार्किट की मैच्योरिटी की तारीख अक्सर डेब्ट से पहले की होती है.
  7. पेंशन फण्ड : पेंशन फण्ड में वैसे लोग निवेश करते हैं, जिन्हें एक लम्बे समय के लिए निवेश करना तथा बड़ा लाभ प्राप्त करना होता है. इसमें निवेशित धन निवेशक के रिटायर हो जाने के बाद नियमित रूप से रिटर्न देता है. इसमें निवेशित धन का एक हिस्सा डेब्ट में तथा एक हिस्सा इक्विटी मार्किट में लगाया जाता है. इक्विटी मार्किट में लगाया गया धन अधिक लाभ देता है और डेब्ट फण्ड निवेशित धन की सुरक्षा नियंत्रित करता है.
  • विशेषता के आधार पर :
  1. सेक्टर फण्ड : इसमें निवेशित धन मुख्यत मार्केटिंग क्षेत्र के काम में लगाया जाता है. मार्केटिंग में निवेश के लिए आम तौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का प्रयोग किया जाता है. निवेशित धन का रिटर्न चयनित मार्केट के उतार चढ़ाव पर निर्भर करता है.
  2. इंडेक्स फण्ड : इस फण्ड में धन उस इंस्ट्रूमेंट पर निवेशित होता है, जो किसी एक्सचेंज के किसी ख़ास इंडेक्स को प्रदर्शित करता है. इसमें BSE सेंसेक्स की भूमिका होती है.
  3. फण्ड ऑफ़ फंड्स : ये वे फण्ड हैं, जो विभिन्न म्यूच्यूअल फण्ड में पैसा निवेश करते हैं. इसका रिटर्न निवेशित धन के परफॉरमेंस पर निर्भर करता है. इसे मुलती मेनेजर फण्ड भी कहा जाता है. इसे एक ‘सेफ इन्वेस्टमेंट’ माना जा सकता है, क्योंकि इसमें निवेशित धन में विभिन्न तरह के म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम शामिल होती हैं.
  4. इमर्जिंग मार्केट फण्ड : ये वह मार्केटिंग फण्ड है, जिसमें निवेशित धन विकसित होते देशों में निहित मार्केट में लगाया जाता है. इसमें निवेशित धन का मुख्य उदेश्य भविष्य में लाभ कमाना होता है. इसमें बहुत रिस्क होता है, जो विकासशील देश की घटती- बढती अर्थव्यवस्था पर आधारित होता है. इसमें एक बड़े लाभ की भी सम्भावना होती है.
  5. इंटरनेशनल फण्ड : इस म्यूच्यूअल फण्ड की सहायता से विदेश में स्थित कंपनियों में पैसा लगाया जाता है. इस स्कीम की सहायता से विकासशील देशों में स्थित कंपनियों में भी पैसा लगाया जा सकता है. इसके तहत उन कम्पनियों में पैसा नहीं लगाया जा सकता है, जो निवेशक के देश में स्थित हो.
  6. ग्लोबल फण्ड : इस फण्ड की सहायता से विदेश के किसी भी हिस्से में स्थित कंपनी में पैसा लगाया जा सकता है. ये इंटरनेशनल फण्ड से भिन्न होता है, क्योंकि इस स्कीम के तहत निवेशक उन कम्पनियों में भी पैसे लगा सकता है, जो उसके देश में स्थित हो.
  7. रियल एस्टेट फण्ड : ये वे म्यूच्यूअल फण्ड हैं, जिनके सहारे रियल एस्टेट कम्पनियों में पैसा लगाया जा सकता है. इस म्यूच्यूअल फण्ड के तहत रियाल्टार, बिल्डर, प्रॉपर्टी मैनेजमेंट कंपनी आदि में निवेश किया जा सकता है. रियल एस्टेट म्यूच्यूअल फण्ड में किसी भी समय मसलन किसी प्रोजेक्ट के शुरू होते समय या आधे निर्मित हो चुके प्रोजेक्ट में पैसा लगाया जा सकता है.
  8. कमोडिटी फोकस्ड स्टॉक मार्केट : इस म्यूच्यूअल फण्ड के तहत उन कंपनियों में पैसा निवेश होता है, जो कमोडिटी मार्केट में काम कर रहे हैं, जैसे कोई मीनिंग कंपनी अथवा अन्य निर्माता कंपनी.
  9. मार्केट न्यूट्रल फण्ड : इस तरह के म्यूच्यूअल फण्ड किसी मार्किट में सीधे सीधे निवेश नहीं करते हैं. इसके अंतर्गत ट्रेज़री बिल, ETFs आदि में निवेश किया जाता है. इसमें निवेश का मूल मकसद एक स्थायी विकास और नियमित लाभ है.
  10. इनवर्स फण्ड : ये किसी पारंपरिक म्यूच्यूअल फण्ड से भिन्न है. इसमें निवेशक को लाभ उस समय प्राप्त होता है जब मार्केट गिरता है. मार्केट के बढ़ने पर इसमें निवेशक को हानि होती है. इसमें निवेश करने वाले लोगों का उद्देश्य एक बड़ा लाभ कमाना होता है. अतः इस म्यूच्यूअल फण्ड में बहुत बड़ी रिस्क होती है.
  11. एसेट्स एलोकेशन फण्ड : एसेट एलोकेशन फण्ड दो तरह के होते हैं. पहला टारगेट डेट फण्ड और दूसरा टारगेट एलोकेशन फण्ड. इसमें निवेशित धन को विभिन्न किस्तों में बाँट दिया जाता है और विभिन्न बांड अथवा इक्विटी मार्केट में निवेशित किया जाता है.
  12. गिफ्ट फण्ड : गिफ्ट फण्ड के अंतर्गत निवेशित धन को सरकारकी सुरक्षा में निवेशित किया जाता है. सरकारी क्षेत्र में निवेशित होने के कारण इसमें किसी तरह का रिस्क नहीं पाया जाता. अतः जो व्यक्ति रिस्क फ्री स्कीम में पैसा लगाना चाहता है, उसके लिए ये एक उत्तम स्कीम है.
  13. एक्सचेंज ट्रेड फण्ड : ये वैसे म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम हैं, जिसमे ओपन और क्लोज्ड दोनों तरह के स्कीम पाए जाते हैं. इसमें निवेश करना स्टॉक मार्केट में निवेश करना होता है. इस स्कीम में सर्विस चार्ज बहुत कम होता है.
  • रिस्क के आधार पर :
  1. लो रिस्क : इस तरह के म्यूच्यूअल फण्ड में वैसे लोग निवेश करते हैं, जो अपने पैसे पर किसी तरह का रिस्क नहीं चाहते. इस तरह के इन्वेस्टमेंट में डेब्ट मार्केट अथवा वैसी जगह पैसे लगाते हैं, जो एक लम्बे समय तक निवेश माँगता है. लो रिस्क होने की वजह से इसमें निवेशक को रिटर्न भी कम ही प्राप्त होता है. गिफ्ट फण्ड लो रिस्क फण्ड का ही एक उदाहरण है.
  2. मीडियम रिस्क : इस तरह के फण्ड प्लान में मध्यवर्ती रिस्क होता है. ये उन लोगों के लिए जो थोडा- बहुत रिस्क लेकर अपने निवेश पर अधिक लाभ कमाना चाहते हैं. इस तरह के फण्ड प्लान का इस्तेमाल एक लम्बे समय और बड़े लाभ के लिए किया जा सकता है.
  3. हाई रिस्क : ये प्लान उस तरह के लोगों के लिए होता है, जो अपने निवेश पर अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहते हैं. इनवर्स म्यूच्यूअल फण्ड इसी तरह का एक हाई रिस्क फण्ड प्लान है. इसमें बड़े लाभ की खूब सम्भावना रहती है.

सही म्यूच्यूअल प्लान कैसे चुनें (How to choose right Mutual Fund)

विभिन्न तरह के आर्थिक संस्थानों ने विभिन्न तरह के म्यूच्यूअल प्लान का इजाद किया है. ऊपर लिखे गये सभी प्लान में कौन सा प्लान अपने लिए कारगर है, ये पता करना एक मुश्किल काम है. किसी भी तरह के म्यूच्यूअल फण्ड को चुनते हुए सबसे पहले अपनी आवश्यकताओं पर ध्यान दें. अपनी आवश्यकताओं और अपने उद्देशों को अच्छी तरह समझ लें. क्या आप कम समय में अधिक धन कमाना चाहते हैं या धीरे धीरे एक कम किन्तु नियमित लाभ पाना चाहते हैं. इसके बाद विभिन्न प्लान के रिस्क के तहत ये समझ लें कि कौन सा रिस्क आप आसानी से उठा सकते हैं. इसके बाद अपनी आवाश्यकता के अनुसार विभिन्न म्यूच्यूअल फण्ड में से एक को चुन लें. 

म्यूच्यूअल फण्ड कोई सा भी हो थोडा बहुत रिस्क ज़रूर रहता है. किसी भी प्लान में निवेश करते समय प्लान के सभी दस्तावेज़, नियम और शर्तों को खुद से पढ़ कर अच्छी तरह से समझ लें. सारी बातें समझने के बाद ही निवेश करें.   

म्यूच्यूअल फण्ड से फायदे (Mutual Fund Benefits)

तात्कालिक समय में हर कोई अपने संचित धन को किसी ऐसे काम में लगाना चाहता है, जहाँ से उसे और धनार्जन का मौक़ा मिल सके. मुचुअल फण्ड भी धनार्जन का ही एक तरीका है. यहाँ पर इसके कुछ लाभ के बारे में दर्शाया जा रहा हैं.

  • म्यूच्यूअल फण्ड निवेश को विविध बनाता है. स्टॉक मार्किट में म्यूच्यूअल फण्ड की सहायता से पैसा लगाना एक बेहतर विकल्प है, क्योंकि इसमें रिस्क कम हो जाते हैं.
  • म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश पेशेवर फण्ड मेनेजर के द्वारा कराया जाता है, फण्ड की सारी देख रेख और निवेश की समीक्षा इन्हीं के द्वारा की जाती है.
  • म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश के कई विकल्प मौजूद हैं. विभिन्न निवेशकों की विभिन्न क्षमताओं के अनुसार इसे बनाया गया है. निवेशक अपनी सुविधा और धनार्जन की योजना के अंतर्गत अपना पसंदीदा स्कीम चुन सकते हैं.
  • म्यूच्यूअल फण्ड में बहुत कम पैसे लगाकर शुरुआत की जा सकती है. कई म्यूच्यूअल फण्ड कंपनियां ऐसी हैं, जो मासिक तौर पर महज 1000 रूपए निवेश करके म्यूच्यूअल फण्ड निवेशक बनने का मौक़ा देती हैं.
  • म्यूच्यूअल फण्ड हर तरह से पारदर्शी स्कीम है. इसमें किसी भी प्रकार का ‘हिडन चार्जेज’ वगैरह नहीं लगता हैं. म्यूच्यूअल फण्ड निवेश की सभी आवश्यक जानकारियां म्यूच्यूअल फण्ड के सभी यूनिट के निवेशकों को पता रहती है. इससे पारदर्शिता बनी रहती है और लोग इसमें अपने पैसे इन्वेस्ट करते हैं.
  • म्यूच्यूअल फण्ड में टैक्स का बहुत फायदा होता है. ये अन्य इन्वेस्टमेंट इंस्ट्रूमेंट से अधिक फायदेमंद होता है. इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड में ‘लॉन्ग टर्म गेन टैक्स’ नामक टैक्स शुन्य है. अर्थात यदि आप अपने खरीदे गये शेयर एक महीने के बाद बेचें तो भी किसी तरह का कर नहीं लगेगा. 

म्यूच्यूअल फण्ड की सीमायें (Mutual Fund Disadvantages)

म्यूच्यूअल फण्ड की अपनी कुछ सीमायें भी हैं, जिन्हें निवेश के पहले जानना बेहद आवश्यक है.

  • कुछ म्यूच्यूअल फण्ड में अधिक पैसा लगाना पड़ता है. दरअसल ये पैसा म्यूच्यूअल फण्ड का नियमन और मैनेजरों की तनख्वाह की तरह भी काम में आता है. कभी कभी यदि निवेशक म्यूच्यूअल फण्ड से बाहर निकल रहा होता है उस समय भी अतिरिक्त शुल्क ‘एग्जिट लोड’ के तहत लिए जाते हैं.
  • इसमें निवेशित पैसे विभिन्न मार्किट में लगे हुए होते हैं. साथ ही इसमें एक साथ कई लोगों के पैसे भी लगे हुए होते हैं. अतः कभी कभी एक बड़ा लाभ होने पर भी वो लाभ सभी में इस तरह बटता है कि निवेशकों को ख़ास लाभ नहीं मिल पाता है.
  • कुछ ऐसे म्यूच्यूअल फण्ड भी हैं, जिसे ट्रेडिंग वाले दिन के मध्य में नहीं बेचा जा सकता है, वे दिन के अंत में ही बिक सकते हैं, मसलन ओपन एंडेड फण्ड.

डेब्ट म्यूच्यूअल फंड क्या है? (What is Debt mutual funds )

डेब्ट फण्ड उस तरह के म्यूच्यूअल फण्ड हैं, जिनमे एक सीमित आय के मद्देनज़र निवेश किया जाता है, जैसे सिक्यूरिटी बांड, ट्रेज़री बांड. डेब्ट फण्ड के अंतर्गत गिल्ट फण्ड, मंथली इनकम प्लान, अल्प समय प्लान, लिक्विड फण्ड, फिक्स्ड मच्योरिटी प्लान आदि आते हैं. इन सबके अतिरिक्त डेब्ट फण्ड के अंतर्गत अल्प सामायिक से दीर्घ सामयिक तक हर तरह की योजना उपलब्ध रहती है. ये मुख्यतः उन लोगों के लिए होता है, जो परिवर्तनशील इक्विटी मार्किट में निवेश नहीं करना चाहते हैं. ये एक कम लाभ किन्तु लगातार लाभ देने वाली योजना है. साथ ही ये स्टोक्क मार्किट से बहुत आसान पद्दति में काम करता है.

विभिन्न प्रकार के डेब्ट म्यूच्यूअल फण्ड (Debt mutual funds types)

अलग अलग तरह से अलग अलग समय काल के निवेश को ध्यान में रखते हुए कई तरह के डेब्ट म्यूच्यूअल फण्ड उपलब्ध हैं. नीचे मुख्य डेब्ट म्यूच्यूअल फण्ड के नाम और उनके संक्षिप वर्णन दिए जा रहे हैं.

  • लिक्विड या मनी मार्किट फण्ड : इस नीति के अंतर्गत निवेशक का धन बहुत कम समय के मार्केट इन्वेस्टमेंट जैसे ट्रेज़री बिल, सरकारी सुरक्षा आदि में निवेश किया जाता है, जिसमे जोखिम बहुत कम होता है. ये 91 दिन के लिए भी बाज़ार में लगाया जाता है. ऐसे निवेश परिवर्तनशील नहीं होते.

      लिक्विड फण्ड के फायदे :

  1. ऐसे म्यूच्यूअल फण्ड का कोई लॉक इन पीरियड नहीं होता है. साथ ही इस तरह के निवेश से पैसे उठाने का क्रम किसी व्यापार के दिन के 24 घंटे के अन्दर शुरू हो जाता हैं.
  2. लिक्विड फण्ड में अन्य तरह के म्यूच्यूअल डेब्ट से ब्याज दर का जोखिम बहुत कम होता है, क्योंकि इससे कम समय के लिए निवेश किया जाता है.
  • अल्ट्रा शोर्ट टर्म फण्ड : ये भी एक अल्प सामायिक निवेश है किन्तु कई तरह से ये लिक्विड फण्ड निवेश से भिन्न है. जैसे :
  1. इसमें मच्योरीटी पीरियड 91 दिन से अधिक का होता है.
  2. एक ब्याज दर से निवेशक के धन की सुरक्षा तो करता है किन्तु बाज़ार की अस्थिरता को संभाल नहीं पाता.
  3. इसके लिए एक तरह का ‘एग्जिट लोड’ चार्ज देना पड़ता है, जो इसे अधिक स्थिर बनाती है, किन्तु लिक्विड फण्ड में ऐसा चार्ज नहीं लगता.
  4. ये लिक्विड फण्ड से अच्छा रिटर्न देता है.
  • मंथली इनकम प्लान : मंथली इनकम प्लान के तहत निवेशक को एक नियमित भुगतान की प्राप्ति होती है. कोई निवेशक इस लाभ को प्रति महीने, प्रति तीन महीने पर, अर्धवार्षिक अथवा वार्षिक रूप में प्राप्त कर सकता है. मंथली इनकम प्लान मुख्यतः निवेश के बहुत बड़े हिस्से से जुड़ा होता है. इस निवेश में इस बात का ध्यान रखना अति आवश्यक है कि ये निवेश किये गये धन की वृद्धि पर निर्भर करता है. इसमें सभी भुगतान अनिवार्य नहीं हैं.
  • गिल्ट फण्ड : गिल्ट फण्ड में निवेशक का धन एक लम्बे समय के लिए सरकारी सुरक्षाओं के अधीन रहता है. ये कदाचित सबसे अधिक सुरक्षित निवेश हो सकता है किन्तु इस बात का ध्यान रखना अति आवश्यक है कि गिल्ट फण्ड के रिटर्न में कई तरह की विविधता देखी जाती है. आम तौर पर एक नियमित गिल्ट फण्ड प्रत्येक छः महीने में 5 प्रतिशत वार्षिक तौर पर 16 प्रतिशत और प्रति पांच वर्षों में 9 प्रतिशत के दर से घटता बढ़ता है.
  • शोर्ट टर्म प्लान : ये फण्ड उन लोगों के लिए हैं जो 3-6 मिहिने के निवेश के क्षितिज के साथ है. ये फण्ड मुख्य रूप से शोर्ट टर्म पेपर जैसे सर्टिफिकेट और डिपाजिट (CDs) और कोमेर्सिअल पेपर (CP) में निवेश करते हैं.कॉर्पस के कुछ हिस्से को भी कॉर्पोरेट में निवेश किया जाता है.

डेब्ट म्यूच्यूअल फण्ड के लाभ (Debt mutual funds benefits)

  • डेब्ट फण्ड फिक्स्ड डिपाजिट से अधिक लाभकारी है क्योंकि ये फिक्स्ड डिपाजिट से अधिक टैक्स फ्रेंडली है.
  • यदि निवेशक कम समय का अपरक्राम्य लाभ पाना चाहता है तो डेब्ट फण्ड का विकल्प उसके लिए बहुत अच्छा साबित हो सकता है.

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Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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