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चलो! घूम आये बचपन की गलियाँ

बचपन की सुनहरी यांदे  ना जाने कहाँ ओझल हो गई, जब भी पीछे मुड़कर कर देखते हैं तो एक खिली हुई मुस्कान चेहरे पर दस्तक दे जाती हैं | कैसे बीत जाते हैं पल ? कैसे बचपन बस एक अहसास बन जाता हैं, जिसे हर कोई जीना चाहता हैं, पर वो कभी हाथ नहीं आता | खिल उठता हैं मन, जब उन गलियों से दिल गुजरता हैं, कभी मुस्कान, तो कभी छलक जाते हैं आंसू | ऐसी ही कई यादो से सजा होता हैं बचपन |

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ऐसे ही कुछ पल यहाँ संजोय रखे हैं आइये दिखाते हैं आपके बचपन की झलकियाँ :

छुपम छिपाई: अक्सर ही इस खेल में हम दोस्तों से रूठ जाते थे क्यूंकि कोई दाम देना नहीं चाहता था | घंटो तक किसी को ढूंढना नहीं चाहता था | आजकल बच्चे इसे खेलना भूल ही गए हैं क्यूंकि एक साथ कई बच्चे एक घर में होते ही नहीं या बच्चे बस किताबो के बोझ में दबते जा रहे हैं | और सबसे बड़ा दुश्मन मोबाइल जिसने आज के बच्चो का चहचहाता बचपन ही छीन लिया |

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केरम : गर्मी के दिनों में बिना केरम के तो कोई मजा ही नहीं होता | मस्त मस्त माँ के हाथ के बने पकवानों के साथ एक के बाद एक नये शॉट लगाना और हारते वक्त गेम बिगाड़ कर भाग जाना या जीतने पर अपने साथी को दिन भर चिढ़ाना|

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गिल्ली डंडा : दिन रात का कोई ठिकाना नहीं होता था जब गिल्ली डंडा साथ होता था | माँ कितनी ही आवाज लगा दे जाने का मन ही नहीं होता था जब तक कि कान पकड़ कर ना ले जाये |

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लट्टू : भँवरा घुमाना और उसके लिए घंटो उस पर रस्सी को लपेटना | साथी का घूम जाए और हमारा नहीं तो दिल में गुस्सा आता था वो शाम को घर पर निकलता था | दिन रात प्रेक्टिस करके अगले दिन लट्टू घुमाकर दिखाए बिना चैन नहीं आता था |

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कंचे : कंचे खेलने से ज्यादा उसे जितने में मजा आता था गिनते वक्त जितने ज्यादा कंचे हाथ में आते उतना दिल खुश हो उठता और जितने कम उतना ही उदास |

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सितोलिया : सितोलिया सितोलिया या निमोर्चा निमोर्चा चिल्लाकर पुरे मोहल्ले की नाक में दम कर देते थे |

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पतंग : पतंग उड़ाना तो कभी कोई भूल ही नहीं सकता जब नीले आसमान में कई रंग साथ होते तो उदास चेहरे भी खिल उठते थे | जनवरी में मकर सक्रांति के आते ही घर में मंजा सूतना शुरू हो जाता और तरह-तरह की प्लानिंग के बाद सभी अपने भाई, बहन, पापा, मम्मी, दादा, दादी के साथ अपने पडौसी की फॅमिली को टक्कर देने घर की छत पर पहुँच जाते थे | और जोर जोर से “काटा रे , काटा  रे” चिल्लाकर सामने वाले को चिढ़ाते|

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घोड़ा बादाम छाई : जहाँ स्कूल की रिसेस होती और सब दौड़ कर मैदान में अपनी अपनी क्लास के बच्चो के साथ जगह बनाते और इस खेल को खेलते | जिसमे जोर जोर से चिल्लाते “घोड़ा बादाम छाई पीछे देखी मार खाई |”

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खो- खो : इसे तो सभी बहुत ध्यान से खेलते थे क्यूंकि ये कॉम्पिटिशन में आने वाला खेल जो होता था | साल के शुरू में ही हर क्लास की टीम तैयार की जाती थी जिसमे सभी बहुत मेहनत करते थे |

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गुलेल : निशाने बाजी का शौक बहुत भारी पड़ता था, पडौसी के घर के शीशे टूट जाते और वो घर लड़ने आ जाता था | फिर भी छिपते छिपाते गुलेल ले कर घर से भाग ही लेते थे |

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सांप- सीढी / लूडो :यह एक ऐसे खेल जिन्हें हम अक्सर अपने माँ, पापा या भाई बहन के साथ खेलते | जब दिन भर के बाद पापा घर आते तो हम जिद्द करते | थके होने के बाद भी पापा बच्चो की मुस्कान देख पिघल जाते और खेलने लगते | कभी कभी तो जान बुझकर हार भी जाते | और आज बच्चे पापा के आते ही बस उनका मोबाइल ले लेते हैं और सर उठाकर अपने पापा से बाते भी नहीं करते |

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राजा, मंत्री, चोर सिपाही : क्या खेल था | हराने वाले से पार्टी लेने का मजा ही अनोखा होता था | और चोर का मुहं न चाहकर भी डरा हुआ बन जाता या जबरजस्ती के कोई न कोई हंसता | कई बार तो लड़ाई भी हो जाती | पर फिर वो यादे याद आती हैं |

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Read Some Poem On Childhood Memories In  Hindi “नटखट बचपन की सुनहरी यांदे

Golden Memory With Hindi Poem

Karnika

Karnika

कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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