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Election 2014 “The Voice Of Democracy”

Election सर पर हैं सभी को चिंता हैं अब क्या होगा ? पिछले कुछ years में बढ़ती महंगाई ने गरीबों को तो कुचला ही हैं | साथ ही मध्यम और उच्च वर्ग (lower and higher middle class)को भी हिला दिया हैं |  प्रधानमंत्री (prime minister) के पद पर एक उचित उम्मीद्वार (right candidate) के आजाने उसकी सत्ता फ़ैल जाने मात्र से क्या सभी तकलीफे कम हो जाएँगी | महंगाई के अलावा हर area में problems बढ़ी हैं |

अपने ही देश में security की guarantee देने का वादा करते हैं | हमारे मुलाज़िम (servant) होकर हमें ही नौकरी देने का दावा करते हैं | हर 5 years में बदलते हैं सत्ता के चेहरे और अगर 5 years में  ना बदले तो उन्हें देखकर ही कुफ्त होती हैं | कोई सराहनीय काम तो नहीं करते पर हाँ public में और गुस्सा और निराशा को भर अपने bank balance को बढ़ाकर चलता बनते हैं  |

हर बार का यही रोना हैं हर 5 years में new new dreams तो दिखा देते हैं पर भूखा सपने देख कर करेगा क्या ? India कृषि (farm) प्रधान देश हैं | किसानों (farmer) के विकास (development) के साथ ही देश की उन्नति हो सकती हैं और farmer बस  मौत (suicide) को गले लगा रहे हैं | life जी जाए इतना भी courage नहीं रह गया सीधे मौत को गले लगाना ही एक रास्ता बचा हैं |

Government सरकार Modi, Gandhi या Kejariwal की नहीं जब सरकार जनता (public) की बनेगी तब ही जनता को चैन की सांस मिलेगी 2014 electionमें जो भी देश को बाग़डोर सम्भाले पर अब government public को बनानी हैं | अब जागने को जरुरत हैं घर के नौकरों से ईमानदारों से काम करवाने की जरुरत हैं अगर मालिक आलसी होगा तो नौकर तो बैमानी करेगा ही |

government भी public की servant हैं और servant बिना direction दिए काम नहीं पाती इसलिए अब जरुरत हैं अपनी power का use करे और इन चुनिन्दा सत्ता लोभियों को उनकी सही जगह दिखाए |

“सत्यमेव जयते” 

bandar madari ka khel

कभी बन्दर, कभी मदारी

चलों सुनाऊ एक कहानी,
हर बार की घटना मेरी जुबानी |

बिछ गए थे धरती पर सितारें,
ऐसे दिखाएँ सुनहरे सपनों के नज़ारे |

सपनों में था दो वक्त का खाना,
घरों में राशन और भरपूर उजाला |

ऐसा दिखाया सुन्दर नज़ारा,
जिसमे था बैखोफ बदलता ज़माना |

मेरे ही घर में मुझे सुरक्षा का वादा,
नयें-नयें सपनों का ठनठौक दावा |

काम हैं ऐसा जैसे बन्दर मदारी का प्रसिद्द खेल,
कभी बन्दर बने राजा कभी मदारी, ऐसा पञ्चवर्षीय मेल |

हँसकर अब हम यूँही टाल जाते हैं,
ऐसे मदारी हर बार हमें बन्दर बनाने आते हैं|
                             बन्दर बनाने आते हैं ||

By: कर्णिका पाठक 

Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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