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भारत में आपातकाल, उसके प्रकार प्रक्रिया एवं 1975 आपातकाल की मुख्य बातें | Emergency in India, Types, Process and 1975 important points in hindi

भारत में आपातकाल, उसके प्रकार प्रक्रिया एवं 1975 आपातकाल की मुख्य बातें | Emergency in India, its Types Process and 1975 emergency important points in hindi

भारत में अंग्रेजी हुकूमत का एक ऐसा दौर गुज़रा है, जहाँ पर सारे भारतवासियों को हद से ज्यादा कष्ट उठाने पड़े. इस समय अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों से तंग आकर देशवासियों ने क्रातियाँ की, सत्याग्रह किये और कई बलिदानों के बाद देश को आज़ादी मिल सकी. अंग्रेजी हुकूमत के चले जाने के बाद देश वासियों को इस बात की पूरी ख़ुशी थी, कि अब भारत में लोकतंत्र आ चुका है और यहाँ पर किसी भी नेता का तानाशाही रवैया नहीं सहा जाएगा, किन्तु बहुत जल्द ही 25 जून सन 1975 में भारत में इंदिरा गाँधी ने भारतीय लोकतंत्र की मान्यताओं का हनन करते हुए आपातकाल की घोषणा की. यह दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला और कलंकित दिन की तरह आया था. यह आपातकाल जितने दिनों तक रहा, भारतीय लोकतंत्र की मूल्यों की धज्जियाँ उडती रहीं. सरकार के विरोध में बोलने वाले लोगों को सरकार पुलिस के द्वारा गिरफ्तार कराती रही. कई जन आंदोलनकारियों को बुरी तरह पीटा गया. इस तरह से देश के हर तबके के लोगों को दबाने की कोशिश की गयी. यहाँ पर भारत में आपातकाल लागू करने के सभी पक्षों पर विस्तृत वर्णन किया जा रहा है.

आपातकाल क्या है (What is Emergency)

आपातकाल भारतीय संविधान में एक ऐसा प्रावधान है, जिसका प्रयोग तब किया जाता है, जब देश को किसी आतंरिक, बाह्य अथवा आर्थिक रूप से किसी तरह के खतरे की आशंका होती है. अतः यह तीन ऐसी स्थितिया हैं जब सरकार द्वारा इमरजेंसी लागू की जा सकती है.

आपातकाल की आवश्यकता (Emergency Necessities)

संविधान के निर्माताओं ने इस तरह की आपातकालीन स्थिति की कल्पना की कि यदि कभी देश पर ऐसा संकट आये, जिससे राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा खतरे में हो तो इस समय के लिए कुछ ऐसे प्रावधान बनाने पड़ेंगे, जिसके अनुसार केंद्र सरकार के हाथ बंधे न हों और वह बिना किसी रोक टोक गंभीर निर्णय ले सके. उदाहरण के तौर पर यदि कोई पड़ोसी देश हम पर हमला करता है, तो हमारी सरकार को संसद में जवाबी हमले के लिए किसी तरह की बिल पास न करवानी पड़े. चूँकि हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र है, तो हमारे देश को किसी अन्य देश से लड़ने के लिए पहले संसद में बिल पास कराना होता है. किन्तु कभी कभी ऐसा भी हो सकता है कि हमला अचानक हो और हमें किसी तरह की औपचारिक क्रियाकलापों को निपटाने का मौक़ा नहीं मिले. ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार के पास इस प्रावधान के तहत अधिक शक्तियां आ जाती हैं और केंद्र सरकार अपनी मर्ज़ी के अनुसार निर्णय लेने में समर्थ हो जाती है. केंद्र सरकार को यह शक्तियाँ इस आपातकालीन स्थिति से देश को निकालने के लिये प्राप्त होती हैं.

भारतीय संविधान में आपातकाल (Emergency in Indian Constitution)

भारत विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र है. इसके संविधान के निर्माण में विश्व भर के कई देशों के संविधान पर शोध किया गया है. भारतीय संविधान में आपातकाल की चर्चा संविधान के 18 वें हिस्से में आर्टिकल 352 से 360 के बीच की गई है. भारतीय संविधान में यह प्रावधान वेइमार संविधान (1919 से 1933) से लिया गया है. वेइमार रिपब्लिक जर्मनी को कहा जाता था.

भारत में आपातकाल के प्रकार (Emergency Types in India)

भारतीय संविधान में तीन तरह के आपातकाल का वर्णन है, जिसका वर्णन नीचे किया जा रहा है,

  1. नेशनल इमरजेंसी : इसका वर्णन संविधान के आर्टिकल 352 में किया गया है. यह इमरजेंसी पूरे देश में लागू होती है. यह मुख्यतः तीन परिस्थितियों में लागू की जा सकती है. ये तीन स्थितियां हैं :
  • यदि किसी अन्य देश के साथ युद्ध हो रहा हो.
  • बाहर से किसी ‘नॉन स्टेट एक्टर’ यदि हम पर हमला कर दे. भारतीय संविधान में इस घटना के लिए ‘एक्सटर्नल अग्रेशन’ शब्द का प्रयोग किया गया है.
  • यदि देश के अन्दर ही किसी हथियारबंद संस्था द्वारा भारत सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल देती है. भारतीय संविधान में पहले इस स्थिति को ‘इंटरनल डिस्टर्बेंस’ के नाम से परिभाषित किया गया था, किन्तु बाद में इसे बदल कर ‘आर्म्ड रिबेलियन’ कर दिया गया. यह परिवर्तन सन 1978 में बदल दिया गया था.

उपरोक्त तीनों स्थितियों के अतिरिक्त भी यदि सरकार को कभी ऐसा लगता है कि ऐसी स्थितियों के आने की संभावना है, तो सरकार इस स्थिति में नेशनल इमरजेंसी लागू कर सकती है.

  1. राष्ट्रपति शासन (स्टेट इमरजेंसी) : इसका वर्णन संविधान के आर्टिकल 356 में किया गया है. यह किसी राज्य में तब लागू की जाती है, जब वहाँ पर संविधानिक तंत्र प्रशासन चलाने में असमर्थ हो जाती है. आरम्भ में इसका वर्णन बस इतना ही था किन्तु बाद में जब कोर्ट केस आदि हुए तो, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने उन विशेष कारणों का वर्णन किया जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा जा सकता है. इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान के आर्टिकल 365 के आधार पर भी किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है. इस आर्टिकल के अंतर्गत यदि कोई राज्य केंद्र सरकार के आवश्यक निर्देशों का पालान नहीं करता है, तो भी वहाँ पर राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है.
  2. आर्थिक आपातकाल : इसका वर्णन भारतीय संविधान के आर्टिकल 360 में किया गया है. यह भारत में तभी लागू किया जा सकता है, जब भारत की आर्थिक स्थिरता किसी रूप से खतरे में आ जाती है. अतः यदि किसी स्थिति में भारत की आर्थिक नीतियाँ पूरी तरह से असफल हो जाती हैं, तो यह इमरजेंसी भारत सरकार द्वारा लागू की जा सकेगी.

भारत में राष्ट्रीय आपातकाल (नेशनल इमरजेंसी) (National Emergency in India)  

भारत में अब तक तीन बार राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया गया है. इन तीनों आपातकाल का समय निम्नलिखित है.

  • वर्ष 1962 से वर्ष 1968 तक, जिस दौरान भारत- पकिस्तान और भारत- चीन युद्ध हुए. इस समय भारत की आर्थिक स्थितियां बहुत ख़राब हुईं. 
  • वर्ष 1971 में भारत पाकिस्तान लड़ाई के समय भी पुनः इस इमरजेंसी को लागू किया गया.
  • वर्ष 1975 में इंदिरा गाँधी ने ‘इंटरनल डिस्टर्बेंस’ का कारण बता कर पूरे भारत में इमरजेंसी लागू कराई. यह इमरजेंसी बहुत अधिक प्रभावशाली थी, जिसके अंतर्गत सरकार ने आम लोगों की आवाजों को दबाने का खूब प्रयास किया. इसका विस्तृत वर्णन नीचे किया जा रहा है.

आपातकाल की प्रक्रिया (Emergency Procedures)

भारत में इमरजेंसी सिर्फ भारत के राष्ट्रपति लागू कर सकते हैं, किन्तु इसके लिए उन्हें यूनियन कैबिनेट द्वारा लिखित में सिफारिश की आवश्यकता होती है. हालाँकि सन 1975 में ऐसा नहीं हुआ था और उस समय प्रधानमत्री इंदिरा गाँधी ने मौखिक तौर पर घोषणा करके देश में आपातकाल लागू किया था. इस इमरजेंसी की घोषणा संसद के दोनों सदनों में इसके लागू होने के एक महीने के अन्दर एप्रूव्ड कराने की आवश्यकता होती है. यदि दोनों सदनों द्वारा यह एप्रूव्ड हो जाती है, तो यह आपातकाल लगातार छः महीने तक जारी रहता है और इसे अलगे छः महीने के लिए लागू कराने के लिए पुनः दोनों सदनों में बिल पास कराना होता है. इस आपातकाल की समय सीमा बढ़ाने के लिए संसद के किसी एक सदन में ‘स्पेशल मेजोरिटी’ के तहत बिल पास कराना होगा. ‘स्पेशल मेजोरिटी’ के अंतर्गत संसद में मौजूद वोट कर रहे सदस्यों का 2/3 हिस्सा हक़ में होना चाहिए.

आपातकाल की समाप्ति (Emergency Termination)

आपातकाल की समाप्ति भारत के राष्ट्रपति किसी भी समय कर सकते हैं. विशेष बात यह है कि इसकी समाप्ति की घोषणा के लिए राष्ट्रपति को किसी भी तरह की संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है. हालाँकि राष्ट्रपति को अपनी यह घोषणा वापस लेनी पड़ सकती है, जब लोकसभा में एक आम बहुमत के साथ इस बात की पुष्टि हो जाए कि देश में आपातकाल की आवश्यकता है.

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भारत में वर्ष 1975 के आपातकाल की मुख्य बातें (Emergency in India 1975 Important Points)   

वर्ष 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतान्त्रिक इतिहास का काला दिवस माना जाता है.  जैसा कि ऊपर वर्णन है कि इस आपातकाल के पीछे भारत की तात्कालिक प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने ‘इंटरनल डिस्टर्बेंस’ का हवाला दिया था और इसी हवाले पर यह इमरजेंसी 21 मार्च 1977 तक चली. यह इंदिरा गाँधी के जीवनकाल में लिया गया सबसे बड़ा फैसला था. इस इमरजेंसी के दौरान सभी तरह के लोकतान्त्रिक चुनावों को निलंबित कर दिया गया तथा आम नागरिकों की स्वतंत्रता में भी कई तरह से रोक लगा दिए गये. इंदिरा गाँधी के अधिकतर विरोधियों को जेल में डाल दिया गया और भारतीय मीडिया तथा प्रेस को सेंसर कर दिया गया. इसका पूरा वर्णन इस प्रकार है:

  • राजनैतिक और नागरिक अशांति :

वर्ष 1973 -75 इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ पूरे भारत में अशांति बढ़ने लगी थी. इंदिरा गाँधी की सरकार का कई तरह से विरोध किया जा रहा था. इस समय का सबसे बड़े आंदोलन में एक था गुजरात का नव निर्माण आंदोलन. यह आंदोलन वर्ष 1973 – 74 के बीच रहा. यहाँ की राज्य शिक्षा व्यवस्था इस दौरान पूरी तरह से चरमरा गयी थी और विद्यार्थियों के आन्दोलनों की वजह से राज्य सरकार को केंद्र सरकार में मिला दिया गया. वर्ष 1974 के मार्च अप्रैल महीने में होने वाला बिहार छात्र संघर्ष समिति को जयप्रकाश नारायण का समर्थन प्राप्त हुआ और इस नेतृत्व में बिहार सरकार के ख़िलाफ़ एक बड़ा आंदोलन हुआ.

इस समय जय प्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का ऐलान किया, जिसके अंतर्गत विद्यार्थियों, किसानों और आम मजदूरों को एक साथ लाया गया. इस आंदोलन का उद्देश्य ये था कि ये सभी लोग पूरी तरह से अहिंसात्मक तरीके से अपनी मांगे सरकार के सामने रखें. इसी समय रेलवे कर्मचारी यूनियन ने पूरे देश भर में रेलवे की हड़ताल कर दी. इस हड़ताल को इंदिरा गाँधी द्वारा बहुत ही निर्मम तरीक़े से दबाया गया. इस दौरान कई रेलवे कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उनके परिवारवालों को रेलवे क्वार्टर से बाहर निकाल दिया गया. सरकार को अपने इस कुकृत्य की वजह से काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी. सरकार को इसके लिए संसद में भी काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी.

  • इमरजेंसी की घोषणा :

सरकार ने सभी नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी को इस बात के लिए सावधान कर दिया कि पकिस्तान से युद्द होने वाला है. इस युद्ध के अतिरिक्त सरकार के सामने जो तात्कालिक समस्याएं थीं वह था सूखा और सन 1973 का तेल संकट. इन संकटों से जूझते हुए भारत की अर्थ व्यवस्था काफ़ी खराब हो गयी थी. सरकार का कहना था कि देश के अन्दर हो रहे हड़ताल और प्रतिवाद ने सरकार को कार्य करने में पूरी तरह से असक्षम बना दिया है, जिस वजह से भारत की व्यवस्था खराब होती जा रही थी.

इस समय इंदिरा गाँधी को उनके कुछ ईमानदार नेताओं तथा अपने बेटे संजय गाँधी, जिनकी शक्ति इस समय राजनैतिक रूप से बहुत अधिक बढ़ गयी थी, इनके सलाह को मानना सही समझा. इस समय पश्चिम बंगाल के तात्कालिक मुख्य मंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने भी इंदिरा गाँधी को देश भर में ‘आतंरिक आपातकाल’ लागू करने की सलाह दी. इन्होने इस पत्र में इस बात की चर्चा की कि भारत में आतंरिक रूप से बहुत अधिक अराजकता फ़ैल गयी है और सरकार को काम करने में कठिनाइ हो रहा है. इस तरह से सिद्धार्थ शंकर राय ने ये दिखाया कि किस तरह संविधान के दायरे में रह कर भी लोकतान्त्रिक मूल्यों का हनन किया जा सकता है.

  • आपातकाल के दौरान शासन प्रबन्ध :

इंदिरा गाँधी ने ’20- पॉइंट’ इकनोमिक प्रोग्राम को तैयार किया, जिसका उद्देश्य देश के कृषि और औद्योगिक विकास को प्रगति देना था. इसी के साथ सरकार ग़रीबी और अशिक्षा से भी लड़ना चाहती थी, किन्तु इन सब के पीछे सरकार का अनुशासन असहनीय था और इसे ‘डिसिप्लिन ऑफ़ द ग्रेवयार्ड’ कहा गया. इमरजेंसी के दौरान ये ऐलान किया गया कि सभी ट्रेनें समय पर चलेंगी और सारे कर्मचारी अपने काम पर आसानी से जा सकेंगे और काम कर सकेंगे. सरकारी कार्यालयों में उनके कार्यों का लेखा जोखा पहले की ही तरह रहेगा. इस ’20 पॉइंट्स’ के अलावा संजय गाँधी ने भी पांच और पॉइंट्स का वर्णन किया. इन पांच पॉइंट्स की सहायता से संजय गाँधी देश में शिक्षा, परिवार नियोजन योजना, वृक्षारोपण, जातिवाद की समाप्ति और दहेज़ प्रथा को समाप्त करना चाहते थे. कालांतर में इमरजेंसी के दौरान इन दोनों प्रोग्राम को एक साथ करके ‘ट्वेंटी फाइव’ पॉइंट प्रोग्राम बनाया गया.

  • आपातकाल के दौरान गिरफ्तारियां :

भारतीय संविधान के 352 आर्टिकल के अंतर्गत इंदिरा गांधी ने स्वयं को सरकार में रखते हुए कई असाधारण संवैधानिक शक्तियां प्राप्त की. इन् संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग इंदिरा गाँधी ने अपने विपक्ष तथा आम लोगों के विरोध को दबाने के लिए किया. सरकार ने पूरे देश भर में पुलिस और आर्मी लगा दी और सरकार के निर्णयों का विरोध करने वाले लोगों को गिरफ्तार करना शुरू किया. इस समय कई नेता जैसे विजयराजे सिंधिया, जयप्रकाश नारायण, राज नारायण, मोरारजी देसाईं, चरण सिंह, जीवतराम कृपलानी, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्णा आडवाणी, अरुण जेटली, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, गायत्री देवी के साथ आठ कई अन्य तात्कालिक जननेताओं को गिरफ्तार किया गया.

इस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात ए इस्लामी जैसी संस्थाओं पर सरकार द्वारा बैन लगा दिया गया. इस समय के कई कम्युनिस्ट नेताओं को भी अरेस्ट किया गया. मोहन धरिया और चन्द्र शेखर जैसे कांग्रेसी नेताओं ने भी सरकार के इस फैसले के विरोध में सरकार को अपना इस्तीफ़ा दिया और कांग्रेस पार्टी से भी हट गये. इन नेताओं को भी अरेस्ट कर लिया गया. तमिलनाडु की करूणानिधि सरकार गिरा दी गयी और उनकी पार्टी के कई नेताओ को जेल में डाल दिया गया. इन लोगों को ‘मेंटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट’ के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था.

  • क़ानून मानवाधिकार और चुनाव :

इस समय विपक्षों की स्थिति बहुत खराब हो चली थी. कई राज्य सरकार और चुनावों को रद्द कर दिया गया था. तात्कालिक सरकार के पास 2/3 की बहुमत, यानि स्पेशल मेजोरिटी थी, अतः तात्कालिक कांग्रेस सरकार देश के लिए नया क़ानून लिख सकती थी. इस समय जब इंदिरा गाँधी को यह लगा कि तात्कालिक कानून व्यवस्था बहुत धीमी है, तब उन्होंने राष्ट्रपति के लिए ऐसे विधेयक को चुना जिससे होने से वे अपने मन मुताबित कार्य कर सकती थी. इस तरह इंदिरा गाँधी ‘रूल बाई डिक्री’ के अनुसार अपना शासन चलाना चाहती थीं. जस्टिस खन्ना ने अपनी किताब ‘मेकिंग ऑफ़ इंडिया’स कंस्टीट्यूशन’ में लिखा कि ‘कोई एक संविधान केवल पन्ने पर लिखा गया नियम नहीं है, बल्कि यह आम लोगों के जीवन यापन का तरीक़ा है’.

  • जबरन नसबंदी :

सितम्बर 1976 में संजय गाँधी ने देश भर में अनिवार्य नसबंदी का आदेश दिया. इस नसबंदी के पीछे सरकार की मंशा देश की आबादी को नियंत्रित करना था. इसके अंतर्गत लोगों की इच्छा के विरुद्ध नसबंदी कराई गयी. वर्ष 1976- 77 के समय करीब 8.3 मिलियन नस्बंदियाँ कराई गयीं. इस समय सरकार के इस फैसले से कई आम लोगों की दैनिक जीवन तक भी प्रभावित हुई. कई लोगों को इस नसबंदी से इन्फेक्शन हुआ और वे एक समय तक कार्य करने तथा जीविकोपार्जन करने में असमर्थ रहे. हवा सिंह नाम के एक जवान विधुर को भी ज़बरदस्ती इस प्रक्रिया के अंतर्गत लाया गया और इन्फेक्शन की वजह से उसकी मौत हो गयी थी.

इमरजेंसी के समय सरकार के विरुद्ध आलोचना के मुख्य कारण

इमरजेंसी के समय सरकार के विरुद्ध आलोचना किये जाने के निम्नलिखित कारण हैं.

  • बिना किसी चार्ज के आम लोगों की पुलिस द्वारा जांच पड़ताल.
  • कई आम तथा निजी मीडिया का सरकारी प्रचार प्रसार के लिए प्रयोग.
  • इमरजेंसी के दौरान संजय गाँधी ने किशोर कुमार को कांग्रेस पार्टी की बॉम्बे रैली के लिए गाने को कहा था, किन्तु किशोर कुमार ने इससे इनकार कर दिया था. इस पर तात्कालिक ब्रॉडकास्टिंग मंत्री विद्या चरण शुक्ल ने किशोर कुमार के गाने का दूरदर्शन तथा टीवी पर आने पर अनौपचारिक बैन लगा दिया था. यह बैन 4 मई 1976 से लेकर इमरजेंसी के अंतिम दिनों तक चला.
  • ज़ामा मस्जिद तथा पुरानी दिल्ली के तुर्कमेन गेट के आस पास के सभी झोपड़ पट्टियों को हटा दिया गया.
  • सरकार द्वारा जबरन नसबंदी की प्रक्रिया भी सरकार की आलोचना के लिए एक बहुत बड़ा कारण रहा.
  • इस समय कई किताबों और फ़िल्मों पर भी बैन लगाया गया.

आपातकाल के बाद भारत में सन 1977 का चुनाव (1977 Elections in India)

जनवरी 1977 में इंदिरा गाँधी ने फिर से चुनाव की घोषणा की और सभी आंदोलनकारियों को जेल से रिहा करा दिया गया. इस समय कांग्रेस की सबसे बड़ी विपक्ष जनता आंदोलन ने लोगों से यह अपील की, कि भारतवासियों के लिए लोकतंत्र और तानाशाह के बीच किसी एक को चुनने का आख़िरी मौक़ा होगा. लोकसभा के दौरान इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी दोनों ने अपने लोकसभा सीट गंवा दिए. इसी तरह बिहार और उत्तरप्रदेश में भी सभी कांग्रेसी नेताओं को हार मिली. कांग्रेस को इस चुनाव में सिर्फ 153 सीटें ही प्राप्त हुईं, जिसमे 92 सीटें दक्षिण भारत के चार राज्यों की थीं. इस चुनाव में जनता पार्टी को कुल 298 सीटें प्राप्त हुईं. इस समय भारत को उसका पहला ग़ैरकांग्रेसी प्रधानमन्त्री प्राप्त हुआ. ये प्रधान्मंत्री थे मोरारजी देशाई. इस समय उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिल पायी थी, जब कि उत्तरप्रदेश को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था. पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस की स्थिति बहुत खराब हो गयी थी.

इस तरह से इमरजेंसी भारतीय राजनैतिक इतिहास में यहाँ के लोगों के लिए एक बहुत दुखद अवधि रही है, जिसे आज भी सबक के तौर पर याद किया जाता है.  

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