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गुरु एवम व्यास पूर्णिमा महत्व एवम निबंध | Guru vyasa Purnima Mahatva Essay In Hindi

Guru Purnima and vyasa puja Mahatva Essay In Hindi  गुरु की महिमा से इतिहास एवम आध्यात्म भरा पड़ा हैं | आज भी गुरु का महत्व सर्वोपरि हैं | विस्तार से जाने इस कलयुग में भी गुरु का स्थान श्रेष्ठ हैं |

वैसे तो कई धर्म होते है तथा हर धर्म के लोगो की अलग अलग मान्यता होती है. जैसे हिन्दू मंदिर जाते है, सिख्क गुरुद्वारे जाते है, तो मुस्लिम लोग मज्जिद जाते है तथा क्रिशन लोग चर्च जाते है |  इन लोगो के अपने धर्मो के देवी देवताओ को पूजने का अलग तरीका भी होता है, परंतु फिर भी एक ऐसी चीज भी है, जिन्हे ये सब एक साथ मानते तथा पूजते है “गुरु”. गुरु कोई भी हो सकता है एक संत महात्मा या कोई चर्च के फादर या कोई और एक साधारण से स्कूल कॉलेज मे पढाने वाला या वाली भी गुरु ही होते है| यह भी कहा जा सकता है कि विद्यालय (school) ही वह पहली जगह है, जहाँ एक बच्चा अपने जीवन मे पहली बार अपने जीवन के पहले गुरु से संपर्क मे आता है तथा विद्यालय (school) ही वह जगह है, जहा एक बच्चा अपने जीवन का प्रथम पाठ पढ़ता है. 

प्राचीन काल मे कोई विद्यालय (school) कॉलेज नहीं होते थे, उस समय विद्यार्थी ऋषियों के आश्रम मे रहकर विद्या ग्रहण करते थे. उस समय किसी भी विद्यार्थी के जीवन का एक पहर उनके गुरुओ के आश्रम मे ही बीतता था, तो उनकी उनके गुरुओ के लिये एक अलग श्रद्धा तथा सम्मान होता था, तो वे आषाढ़ मास की पुर्णिमा को गुरु पुर्णिमा के रूप मे मानते थे तथा इस दिन गुरु पूजा का बड़ा महत्व था, तथा इस आषाढ़ मास की पुर्णिमा के दिन गुरु पूजा का विधान आज तक चला आ रहा है.

इसी दिन महाभारत के रचीयता महर्षि वेद व्यास का जन्म भी हुआ था, तो उन्ही के नाम पर इसे व्यास पुर्णिमा (vyasa poornima) भी कहा जाता है. वैसे वेद व्यास जी का असली नाम कृष्ण  द्वैपयान व्यास था, वे संस्कृत के विद्वान थे, व्यास मुनि ने ही चारो वेदों को रचा था, इसलिये उन्हें वेद व्यास कहा गया | यही आषाढ़ मास की पुर्णिमा के दिन कबीरदास जी के शिष्य घासीदास जी का भी जन्म दिन होता है.

गुरु वह व्यक्ति है जो ज्ञान की गंगा बहाता है तथा अपने शिष्यो को अंधकार से प्रकाश की और ले जाता है . प्राचीन काल मे जब शिष्य गुरु के आश्रम मे रहकर निशुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे, तो वे इसी दिन अपने गुरु को उनकी इच्छा अनुसार गुरु दक्षिणा देते थे तथा इस दिन को एक उत्सव की तरह मनाते थे. प्राचीन काल मे गुरु की आज्ञा भगवान का आदेश होती थी | इसके कई प्रमाण है परंतु सबसे अच्छा उदाहरण एकलव्य का है, जिसने गुरु द्रोण की मूर्ति रखकर शिक्षा गृहण की थी, परंतु फिर भी गुरु द्रोण के गुरु दक्षिणा मे दाए हाथ का अंगूठा मांगने पर बिना किसी संदेह के तुरंत अपना अंगूठा काटकर दे दिया था. हलाँकि आज गुरु की आज्ञा का पालन एकलव्य की तरह विरले ही कोई करता हो, परंतु गुरु पुर्णिमा के दिन उत्सव मनाने का यह रिवाज आज तक चला आ रहा है. गुरु पुर्णिमा के दिन कई पारंपरिक रूप से चल रहे संस्थानो मे आज भी गुरु का सम्मान किया जाता है, कई जगह इस दिन धार्मिक आयोजन किए जाते है | अपने गुरुओ के साथ पवित्र नदियो मे स्नान किया जाता है तथा कई जगह तो मेलो का आयोजन किया जाता है . गुरु के लिए hindi कविता जानने के लिए पढ़े गुरु कविता.

Guru Purnima Mahatva essay In Hindi

गुरु एवम व्यास पूर्णिमा महत्व एवम निबंध

Guru Purnima and Vyasa Puja Mahatva Essay Nibandh

भारत मे आज भी कई ऐसी जगह है, जहा गुरु पुर्णिमा के दिन जाने का अपना अलग महत्व होता है | जहा आज भी गुरु पुर्णिमा के दिन दर्शन करके कई लोग अपने आप को धन्य मानते है, उन्ही मे से कुछ जगह तथा वहा का महत्व और वहा उपस्थित गुरु (संतो) की महिमा की जानकारी हम आपको दे रहे है.

शिर्डी वाले साई बाबा, खंडवा के श्री दादाजी धुनि वाले तथा शेगाव के गजानन्द महाराज:

बिसवी सदी के प्रथम दौर मे सन 1909-10 के दौरान भारत भूमि पर करीब 36 प्रसिध्द संत थे, जिनमे श्री दादाजी धुनिवाले, श्री साई बाबा तथा गजानन्द महाराज तीनों के नाम शामिल है. वास्तव मे अगर कहा जाए तो तीनों ने ही एक सी लीलाए दिखाई. अगर हम इन तीनों संतो के जीवन को ध्यान से देखे तो यह महसूस होता है की तीनों ने ही जन कल्याण के लिए जन्म या यह कह सकते है कि अवतार लिया था. हम जिन नामो से इन संतो को पुकारते है, वास्तव मे यह उनके नाम है ही नहीं. यह नाम तो इन्हे इनके भक्तो द्वारा दिये गए नाम या संबोधन है.

कहा जाता है कि इन तीनों संतो को जिसने जिस रूप मे स्वीकारा उन्हे इन्होने  उसी रूप मे दर्शन दिये है. कहा जाता है कि गजानन्द महाराज ने विठ्ठल भगवान के रूप मे, साई बाबा ने राम भगवान के रूप मे तथा दादाजी ने शंकर भगवान के रूप मे अपने भक्तो को दर्शन दिये है. तीनों ने ही सबका मालिक एक युक्ति को चरितार्थ किया. तीनों ने ही अग्नि और जल की महिमा बताई. श्री दादाजी ने उज़्जेन के सूखे कुए मे पानी निकाला, तो गजानन्द  महाराज तथा साई बाबा ने भी एसे चमत्कार दिखाये.

कहा जाता है कि तीनों ने अपने चमत्कार भक्तो को उनके भगवान से जोड़ने के लिए दिखाये. इन तीनों ने ही कई ऐसी लीलाए दिखाई, जिससे इनके भक्तो ने इन्हे अपने ईश्वर के रूप मे स्वीकार किया तथा आज भी उनमे आस्था बनाए हुये है.

  • गुरु पूर्णिमा व व्यास पूजा –

गुरु पूर्णिमा के दिन ये तीन मुख्य लोगों को याद किया जाता है, कई लोग इन्हें अपना गुरु मानते है और इनके मंदिर जाते है|

1. शिर्डी वाले साईं बाबा
2. खंडवा के धुनी वाले दादा जी
3. गजानंद महाराज
  • शिर्डी वाले साई बाबा (Shirdi Sai Baba ):

शिर्डी के साई बाबा को कौन नहीं जानता . शिर्डी भारतवासियों के लिये एक महत्वपूर्ण दार्शनिक स्थल है जहा हर कोई अपने जीवन मे एक बार जाना चाहता है तथा साई बाबा का आशीर्वाद पाना चाहता है. वैसे तो साई बाबा एक योगी गुरु तथा फकीर थे परंतु उन्होने कई ऐसे कई चमत्कार किए जिसके कारण उन्हे उनके भक्तो द्वारा संत कहा जाने लगा . साई बाबा की मृत्यु शिर्डी मे ही 15 अक्टूबर 1918 को हुई परंतु जब भी उनसे उनके जन्म, माता पिता या कुछ अतीत की अन्य बातो के बारे मे पूछा जाता तो वे टाल देते. साई नाम भी उन्हे महराष्ट्र के शिर्डी गाव मे रहने वाले उनके भक्तो ने दिया था. साई का अर्थ होता है पूजनीय. साई बाबा उनकी आयु के अठारवे वर्ष मे शिर्डी आ गए थे तथा मृत्यु तक यही रहे. उनके भक्त हर समाज के लोग थे तथा हर धर्म के लोगो की उनमे बराबर आस्था थी उन्होने “सबका मालिक एक” कहकर सारे धर्म समाज को एक बंधन मे बांध दिया था. साई एक फकीर के रूप मे शिर्डी मे आए थे परंतु जब शिर्डी मे एक महामारी फैली तथा हर डॉक्टर की दवाई ने काम करना बंद कर दिया उस समय साई की भबूत ने अपना असर दिखाया था इसी प्रकार साई ने एक बार पानी से दिये जलाए थे ऐसे ही और भी कई चमत्कार थे जो साई बाबा ने अपने भक्तो के लिये किए तथा उनके मन मे एक भगवान की उपाधि लेली.

मरने के उपरांत साई ने शिर्डी मे ही समाधि ली यही कारण है की आज भी उनके भक्त साई के दर्शन की लालच मे शिर्डी पहुच जाते है तथा गुरु पुर्णिमा के दिन तो यहा भक्तो का ताता लग जाता है कई भक्त तो ऐसे भी है जिन्हे इस दिन साई के दर्शन तक नहीं हो पाते परंतु फिर भी वे साई की कर्म भूमि पर जाने भर से अपने आपको धन्य मानने लगते है और हर साल इसी लालच से यहा चले आते है. वैसे गुरु पुर्णिमा के लिये शिर्डी मे अनेक इंतजाम किए जाते है ताकि यहा आने वाले भक्तो को कोई असुविधा ना हो परंतु हर साल भक्तो के आने की संख्या बढ़ती जाती है परंतु फिर भी यहा भक्तो के निशुल्क भोजन तथा विश्राम की व्यवस्था की जाती है. शिर्डी मे श्री साई ट्रस्ट की तरफ से साल भर निशुल्क भोजन तथा कम मूल्य मे रहने की अच्छी व्यवस्था दी जाती है . शिर्डी ही वह स्थान है जहा भारत मे तिरुपति तथा वैष्णव देवी के बाद सबसे ज्यादा चढ़ावा आता है यहा कोई भक्त साई के लिये सोने तथा रत्नो से जडा मुकुट ले आता है तो कोई सोने का सिहासन ले आता है. वैसे यह सब चढावा भक्तो के मन की श्रद्धा है वरना साई बाबा तो एक फकीर थे तथा उन्होने एक फकीर की ही तरह भिक्षा पर अपना जीवन व्यापन किया वे जहा रहते थे तथा बैठते थे वह स्थान तथा वह पत्थर आज भी शिर्डी मे मंदिर के पीछे देखा जा सकता है.

शिर्डी जाने का रास्ता :

वैसे तो शिर्डी एक गाव है जहा रेल्वे की सुविधा उपलब्ध नहीं है परंतु फिर भी साई के भक्तो को घबराने की कोई जरूरत नहीं है क्यूकी शिर्डी से कुछ ही किलोमीटर दूर कोपरगाव मे रेल्वे की सुविधा है | यात्री यहा पर उतर कर आसानी से बस या ऑटो की सहता से शिर्डी जा सकते है तथा यहा से यह सुविधा 24 घंटे चालू रहती है. यात्री चाहे तो मनमाड उतरकर भी शिर्डी जा सकते है मनमाड से भी आसानी से शिर्डी के लिये बस मिल जाती है. अगर यात्री चाहे तो रोड के रास्ते से अपनी स्वयम की कार या बस से भी शिर्डी आसानी से जा सकते है. 

  • खंडवा वाले श्री दादाजी धुनिवाले (Khandwa Dhuni wale Dada Ji ):

वैसे खंडवा का नाम शिर्डी की तरह प्रसिद्ध नहीं है परंतु फिर भी जो लोग दादाजी को जानते है तथा उन्हे मानते है उनके परम भक्त बन जाते है. श्री दादाजी की लीलाए अटपटी तथा आलोकिक थी. वे सारे बंधनो से मुक्त अपने आप को प्रकृति प्रेमी के रूप मे सिद्ध करते थे. उन्हे ठंडी गर्मी किसी चीज का अहसास नहीं था . दादाजी न किसी धर्म या जाती के प्रचारक थे न ही उन्हे मना करते थे. उन्होने अपने पूरे जीवन काल मे प्रकृति के नियम के अलावा किसी और नियम को नहीं माना.

वैसे आपको जानकार आश्चर्य होगा की खंडवा मे दादाजी ने सिर्फ तीन बिताए थे और यहा से मंत्रमुग्ध होकर यहा अपनी देह त्यागी. वेसे दादाजी की लीलाओ का प्रमुख स्थान साईखेड़ा है. उनकी प्रमुख लीलाओ मे जीजाबाई के उन्हे पीटने पर श्री कृष्ण की तरह उन्हे दर्शन देना तथा जीजाबाई को ही उन्होने भगवान शंकर के रूप मे भी दर्शन दिये थे.

श्री दादाजी को स्नान करते कभी किसी ने नहीं देखा था वे सोते भी बहुत कम थे अगर वे कभी सो जाते तो दरबार सुना हो जाता. दादाजी को सफेद अकाव की माला बड़ी प्रिय थी कई बार एक ही माला को वे कई दिनो तक पहने रहते. खाने मे दादाजी को टिक्कड़ (मोती रोटी) और लाल मिर्ची कि चटनी बहुत प्रिय थी आज भी दादाजी की समाधि पर भोग स्वरूप यही टिक्कड़ और चटनी चढाई जाती है तथा मंदिर का प्रमुख प्रसाद भी यही है. दादाजी हमेशा धुनि रमाकर बैठते थे तथा उनके समाधि लेने के बाद भी उनकी रमाई धुनि आज तक प्रज्वलित है इसी लिए उनके भक्त उन्हे धुनि वाले दादाजी भी कहते है .

दादाजी की समाधी:

श्री केशवानन्द जी महाराज (बड़े दादाजी) अपनी पूरी जमात के साथ खंडवा मे विराजमान थे उस दिन उन्होने मूंग दाल की खिचड़ी खाई तथा तकिये से सटकर लेट गए. उनके भक्तो द्वारा उन्हे ढुलाई उड़ाई गयी तथा छाया मंडप डाला गया. दादाजी की शयन मुद्रा मे 2 दिन तक रहे उनके भक्त भजन कीर्तन मे रमे हुये थे उन्हे यह उत्साह भी था की दादाजी बड़े दिनो बाद शायन मुद्रा मे है. परंतु उस समय सनसनी फ़ेल गयी जब एक नग्न साधू ने पुलिस थाने मे आकार यह सूचना दि की दादाजी ने देह त्याग दी है. दादाजी की ही इच्छा अनुसार उन्हे खंडवा मे ही समाधि दि गयी.

खंडवा मे ही श्री दादाजी के साथ साथ उनके शिष्य श्री हरियर भोले भगवान की समाधी भी है. खंडवा ही वह तपो भूमि है जहा गुरु शिष्य की समाधि एक साथ एक ही जगह पर पूजनीय है . पूरे भारत मे श्री दादाजी के 2 दर्जन से ज्यादा आश्रम तथा मंदिर है परंतु मूल समाधि खंडवा मे ही है.

कहते है की अगर आपको भक्तो की सेवा तथा मेहमानो का सत्कार देखना हो तो गुरु पुर्णिमा पर खंडवा आइये . गुरु पुर्णिमा के दो दिन पूरे शहर वासी ऐसे मेहमानवाजी करते है जिनकी मिसाल पूरे देश मे कही देखने को नहीं मिलती. पूरा खंडवा दादमय हो जाता है. इस दिन दूर दूर से दादाजी के भक्त पेदल दादाजी के दर्शन तथा उन्हे निशान चढाने खंडवा चले आते है तो खंडवा वासी उनके लिए निशुल्क भोजन तथा रहने की व्यवस्था मे जुट जाते है. यह वे दो दिन होते है जब खंडवा मे कही भी पैर रखने तक की जगह नहीं होती इन दिनों सारे व्यवसायी अपना व्यापार भूलकर भक्तो की सेवा मे लग जाते है वैसे तो खंडवा मे चाहे ईद हो या गणेश विसर्जन हिन्दू मूलिम झगड़ो की खबरे आम है परंतु गुरु पुर्णिमा ही वह मौका है जब सब साथ होकर भक्तो की आवभगत मे लग जाते है. कोई निशुल्क चाय पिलाता है तो कोई खाना खिलता है कोई स्टेशन से निशुल्क मंदिर छोड़ आता है . गुरु पुर्णिमा पर एक खास बात और है इस दिन चाहे 5 मिनिट के लिए पर बारिश स्वरूप दादाजी अपनी कृपा अपने भक्तो पर बरसाते जरूर है.

खंडवा जाने का रास्ता :

भारत के हृदय मे स्थित मध्य प्रदेश के खंडवा जाना बहुत ही सरल है . खंडवा एक रेल्वे जंक्शन है यहा के लिए कही से भी सीधी ट्रेन मिल जाती है तथा यदि यात्री चाहे के वे ट्रेन से न जाकर बस या खुद की कार से जाए तो वह रास्ता भी बहुत ही सुगम है .

  • शेगाव वाले गजानन्द महाराज (Shegaon Wale Gajanand Maharaj ):

भगवान विठ्ठल का अवतार कहे जाने वाले श्री गजानन्द महाराज का प्रमुख दर्शन स्थल महाराष्ट्र के शेगाव मे है . साई बाबा तथा दादाजी धुनि वाले की ही तरह गजानन्द महाराज का भी जन्म तथा पूर्व जीवन अज्ञात है . उनके भक्त उन्हे भगवान गणेश तथा अत्रीपुत्र दत्तात्रय का अवतार भी मानते थे.  कहा जाता है की जहा से श्री नुर्सिह सरस्वती महाराज शेलय मे गुप्त हुये वही से ठीक 350 साल बाद स्वामी समर्थ प्रकट हुये. तथा स्वामी समर्थ जी ने अक्कल्कोट मे समाधि ली उसी समय गजानन्द महाराज शेगाव मे प्रकट हुये. कहा जाता है की गजानन्द महाराज स्वामी समर्थ जी के अवतार थे इसकी पुष्टि इस बात से होती है की दोनों की लीलाए भी मिलती जुलती थी.

गजानन्द हाज गजा पीते थे परंतु वे ऐसे की पदार्थ के आदि नहीं थे. उनके एक भक्त ने उनसे यह वरदान मांगा था की उसकी याद मे वे कभी कभी इस पदार्थ का सेवन करते रहेंगे. उनका यह भक्त काशी का था तथा अपने इस प्रिय पदार्थ को अपने प्रभु को अर्पित करने की लालच मे वो काशी से शेगाव तक आ पहुँचा था.

गजानन्द महाराज ट्रस्ट देश भर मे अपनी सेवा तथा सफाई के लिए प्रसिद्ध है . इसी ट्रस्ट के ही नाम पर कई कॉलेज तथा अन्य संस्थाए भी है. गजानन्द सेवा ट्रस्ट का ईंजीनीयरिंग कॉलेज देश के प्रसिध्द कॉलेजो मे से एक है. गजानन्द सेवा ट्रस्ट देश मे कई जगह अपनी कम मुल्य मे बेहतर सेवा देने के लिए प्रसिद्ध है. 

इन तीनों के अलावा भी कई प्रसिध्द संत है उन्ही मे से एक है निमाड के संत सिंगाजी महाराज तथा बनारस के बाबा किनारम इन संतो के यहा भी गुरु पुर्णिमा पर विशेष आयोजन किए जाते है.

  • संत सिंगाजी महाराज ( Saint Singaji Maharaj ):

कहा जाता है की संत सिंगाजी का जन्म 1576 मे गुरवार के दिन मध्य प्रदेश के बड़वानी मे एक सम्पन्न गव्ली परिवार मे हुआ था उनकी माता गौरा बाई तथा पिता भीमजी थे. सिंगाजी की पत्नी का नाम जसोदा बाई था तथा उनके 4 बालक थे . सिंगाजी घुटनो तक धोती पहनते तथा कानो मे मुद्रियाए, गले मे सैली, कमर मे कटार और कंधे पर तीर धरण करते थे. वे सुंदर होने के साथ साथ बुद्धिमान तथा साहसी भी थे.

एक दिन सिंगाजी को श्री मनरंग स्वामी जी के दर्शन हुये इससे उनके मन मे वैराग्य  उत्पन्न हो गया तथा वे सबकुछ त्याग कर हरसुद मे अपने परिवार के साथ रहने लगे तथा प्रभु भक्ति मे लिन हो गए तथा बाद मे सिंगाजी गाव मे आकर बस गए इस गाव का नाम भी पहले पिपल्या था परंतु बाद मे इसका नाम सिंगाजी के नाम पर सिंगाजी रखा गया. तथा वे पिपल्या वाले सिंगाजी के नाम से जगत विख्यात हुये . सिंगाजी गाव मे ही सिंगाजी महाराज ने समाधि ली. इस गाव सिंगाजी मे हर साल शरद पुर्णिमा पर एक महीने तक मेले का आयोजन किया जाता है. सिंगाजी ने अपने जीवन मे कई लीलाए की जिसका संग्रह निमाड के कई लेखको ने अपनी किताबों मे किया है.

Sneha

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स्नेहा दीपावली वेबसाइट की लेखिका है| जिनकी रूचि हिंदी भाषा मे है| यह दीपावली के लिए कई विषयों मे लिखती है|
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4 comments

  1. गुरु पूर्णिमा हमारे यहाँ भी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है तथा गुरु पूजन एबम व्यास पूजन किया जाता है।।।

  2. apki site bahut achhi h

  3. गुरु पूर्णिमा का एक अलग ही महत्व है| मेरे घर पर मेरे मम्मी पापा ने एक गुरु से दीक्षा ली हुई है और वे इस दिन उनके पास जाकर दिन व्यतीत करते है| इस दिन मेरे स्कूल में बहुत से कार्यक्रम होते थे और गुरुओं को धन्यवाद कर आशीर्वाद लिया जाता था|

  4. दादाजी धाम में वर्षो से गुरु पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जाता हैं | मैं खंडवा की रहने वाली हूँ | इस दिवस पर हर साल हमें स्थानीय अवकाश मिलता हैं

    एक महत्वपूर्ण बात हैं

    इस दिन ज्यादातर खंडवावासी मंदिर में दर्शन के लिए नहीं जाते बल्कि एक दिन पहले एवम बाद में जाते हैं क्यूंकि इनका मानना हैं यह दिन दूर से आये दर्शनार्थियों का हैं उन्हें दर्शन में सुविधा हो इसलिये खंडवा वासी लोग मंदिर के बाहर रह कर ही सेवा कार्य करते हैं | उस दिन भोजन एवम परिवहन की सुविधा मुफ्त कर दी जाती हैं |

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