Mahabharat 10th January 2014 Episode 84 Update

Arjun-and-Draupadi-in-Mahabharat

पहला भाग
महर्षि याच एवम उपयाच ध्रुपद को पुत्र की प्राप्ति के लिए बधाई देते हुए कहते है कि उसे यह पुत्र उनके पुण्यों के कारण देवताओं ने दिया है अब ध्रुपद उसके भाग्य में लिखी पुत्री के लिए यज्ञ में आहुति दे लेकिन ध्रुपद इनकार कर देता है दोनों ऋषि उसे समझाते है कि वह ऐसा नहीं कर सकता है वह कहता है उसे बस पुत्र चाहिए था जो उसे मिल गया | उपयाच उसे कहते है कि यह पुत्री उसके लिए वरदान है जिसके कारण पुरे विश्व में धर्म की स्थापना होगी | धुपद कहता है कन्या से कभी किसी पिता को यश की प्राप्ति नहीं हुई ना ही कोई कन्या कोई लाभ पहुंचा सकती है | महर्षि कहते है ध्रुपद मुर्ख है पुत्री से ही प्रेम मिलता है पुत्री ही सारी शक्तियों को जन्म देती है | पुत्र केवल एक कूल में धर्म की स्थापना करती है और पुत्री दोनों कुलो को धर्म देती है | परन्तु ध्रुपद नहीं रुकता वह जा रहा है महर्षि ने कहा कि देवताओं का क्रोध बड रहा है वापस यज्ञ वेदी के पास आजाओ |
अग्नी की ज्वाला बढ़ रही है और वो ध्रुपद का रस्ता रोकती है ध्रुपद को वापस वेदी के पास आना होता है और वो आहुति डालता है कहता है उसे एक क्या उसे ऐसी पुत्री मिल सकती है जिसे बस कष्ट औए पीढ़ा मिले | महर्षि कहते है कि वह कैसा पिता है जो यह मांग रहा है पर वो नहीं सुनता, फिर आहुति डालता है और कहता है क्या उसे ऐसी पुत्री मिल सकती है जिसको निर्बल बनाने वाली तकलीफ मिले पर उसका मन बलवान हो और जो दूसरों को भी बलवान रखे , जिस पर हमेशा अन्याय हो जिसे सदेव दुःख मिले पर उसका मन कभी न डरे और इस तरह वह अपनी अंतिम आहुति देकर वापस लौट जाता है | उसके द्वारा कहे कथन शिखन्डिनी और दृष्ट्द्युम को अच्छे नहीं लगते |
दूसरा भाग
यज्ञ कुण्ड में विस्फोट होता है गर्जना के साथ पुत्री का जन्म होता है जिसे सुन ध्रुपद अचम्भित है और महर्षि कहते है यह देवताओं का आशीर्वाद है इससे ज्यादा कभी ध्रुपद ने पाया ही नहीं इसका नाम कृष्णा होगया पर सारा संसार इसे द्रोपदी के नाम से जानेगा |
तीसरा भाग
कन्या का जन्म होता है और वह धुपद का आशीर्वाद लेने जाती है कहती है वह देवताओ का आशीष है उसका मन अग्नी निर्मल और ताप अग्नी की तरह है और वह अपने पिता से आशीर्वाद लेने किये झुकती है पर ध्रुपद पीछे हट जाता है कहता है वो देवता के आशीर्वाद को चरणों में नहीं रख सकता है और वह किसी को अपने मस्तक पर नहीं बैठाता इतना कह कर वह द्रोपदी को छोड़ कर चला जाता है |
याद रखने योग्य : ध्रुपद को दृष्ट्द्युम और द्रोपदी यज्ञ से प्राप्त होते है यह यज्ञ महर्षि याच एवम उपयाच ने करवाया था |

Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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