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Mahabharat 13th December 2013 Episode 65 Update

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पहला भाग
कर्ण के पास पहरेदार आकर कहता है द्वार पर दुर्योधन अंदर आने की आज्ञा मांग रहे है| कर्ण खुद दुर्योधन को लेने आता है और पूछता है कि उससे ऐसा क्या अपराध हुआ है जो दुर्योधन उससे आज्ञा मांग रहा है | दर्योधन कहता है उसको किसी पर विश्वास नहीं, उसके खुद के पिता उसका त्याग करने वाले है कर्ण कहता है अगर दुर्योधन को पांडवो को युध्द करके हराना है तो वो साथ है | दुर्योधन कहता है अभी वो बस जानना चाहता है कि कर्ण उसके लिए क्या कर सकता है| कर्ण कहता है वो प्राण दे सकता है| दुर्योधन कहता है योध्दा के लिए प्राण बहुत तुच्छ होते है और क्या कर सकता है |कर्ण कहता है वो उसके लिए अपने माता-पिता का त्याग कर चूका है और वो कुछ भी कर सकता है | दुर्योधन कहता है कि क्या कर्ण उसके लिए धर्म का त्याग कर सकता है | कर्ण कहता है धर्म से अलग किसी को कुछ प्राप्त नहीं होता | दुर्योधन कहता है उसे उत्तर मिल गया ,तभी कर्ण कहता है धर्म के विरुद्ध कुछ नहीं मिलता पर वो दुर्योधन के लिए सब करेगा, आज से दुर्योधन जो उसे कहेगा वो उसके लिए धर्म होगा |

धृतराष्ट्र खुद युधिष्ठिर से मिलने उसके कक्ष में जाता है और उससे पूछता है कि कल अगर युधिष्ठिर युवराज बनता है तो दुर्योधन क्या करेगा | युधिष्ठिर कहता है वो युद्ध करेगा | धृतराष्ट्र कहता है और उस युध्द में गंगापुत्र भीष्म उसके सामने होंगे जिन्हें स्वयम भगवान परशुराम नहीं हरा सके और इसका मतलब वो अपने पुत्रो को खो देगा ,जो कि जीवन का सबसे बड़ा दुःख है | युधिष्ठिर कहता है आज्ञा दे क्या चाहते है | धृतराष्ट्र कहता है कल वो युधिष्ठिर को युवराज घोषित करेगा और युधिष्ठिर खुद इस पद को दुर्योधन को देदे, जिससे धर्म भी बच जायेगा और युध्द भी टल जायेगा |

दूसरा भाग
अर्जुन और सहदेव से भी मशवरा करले वो दोनों यही है | तभी अर्जुन कहता है जेष्ठ जो आज्ञा देंगे, वो सभी को स्वीकार है पर उसे महाराज से एक प्रश्न का उत्तर चाहिए| अर्जुन पूछता है कि वर्षा ऋतू में सबसे पहले राजा क्यु हल चलाता है और फिर यज्ञ करता है ? धृतराष्ट्र उत्तर देता है भूमि जोतने में बहुत से जीव-जन्तु मर जाते है जिनका भार राजा खुद पर लेता है और यज्ञ करता है जिसके बाद कुछ समय राजा को नरक का भोग भी करना पड़ता है | अर्जुन कहता है फिर राजा ऐसे काम करता ही क्यु है जिसके लिए उसे नरक भोगना पड़े | धृतराष्ट्र को सब समझ आ जाता है और वो युधिष्ठिर को कहता है कल प्रातः युधिष्ठिर का युवराज पद के लिए राज्याभिषेक होगा |
प्रातःकाल युधिष्ठिर को सुस्जित किया जा रहा है और दूसरी तरफ दुर्योधन युद्ध के वस्त्र धारण कर रहा है |

तीसरा भाग
पांडव अपनी माता से आशीर्वाद लेते है | गांधारी वस्त्र कुन्ती को पहुंचाती है| कुन्ती जानना चाहती है यह क्या है गांधारी उसे बताती है कि राज्याभिषेक के बाद युधिष्ठिर को यही वस्त्र धारण करना है इसलिए कुन्ती चुनाव करले | कुन्ती कहती है यह हक़ महारानी का है | गांधारी कहती है वो देख नहीं सकती और यहाँ प्रश्न हक़ का नहीं योग्यता का है और कुन्ती योग्य है | कुन्ती कहती है क्या गांधारी राजकुमारों की जीत से प्रसन्न नहीं है ? गांधारी कहती है वो पांडव के लिए प्रसन्न है पर अपने पुत्र के लिए दुखी भी | कुन्ती कहती है क्या वो दुर्योधन को युवराज बनता देखना चाहती है | गांधारी कहती है नहीं वो एक महारानी भी उसके लिए सबसे पहले राष्ट्रहित है | पर अपने पुत्र की महत्वकांक्षा पूरी न होने का दुःख भी है | कुन्ती कहती है उसे लग रहा है इस सबसे उन दोनों के बीच की दुरी बड़ रही है | गांधारी कहती है दुःख करीब लाता है और सुख दुरी बडाता है और अब कुन्ती के जीवन में सुख है |तभी राज्यअभिषेक की विधी शुरु होती है सभी राज्य सभा में है | पांडव प्रवेश करते है आशीर्वाद लेते है | विधी शुरु होते ही कोरव वहाँ युध्द के वस्त्र धारण कर राज्य सभा में पहुच जाते है |

Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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