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Mahabharat 24th December 2013 Episode 72 Update

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पहला भाग
हस्तिनापुर में, गाँव के सभी लोग बाते कर रहे है कि इस वर्ष फसल बहुत अच्छी रही, शायद पांडू पुत्र युधिष्ठिर के युवराज बनने से शायद देवता भी प्रसन्न है, इसलिए चारों तरफ समृध्दी है, सीमा पर फैले राक्षसों के आतंक को भी अर्जुन ने हटा दिया, प्रजा को क्या चाहिए, फसल अच्छी है और कोई आतंक नहीं शायद हस्तिनापुर के अच्छे दिनों की शरुवात हो चुकी है |

राज महल में, महामंत्री विदुर दूर से देख रहे है | युधिष्ठिर, मामा शकुनी के चरण स्पर्श करता है और दुर्योधन एवम दुह्शासन युधिष्ठिर से आशीर्वाद लेते है | यह देख कर कृपाचार्य विदुर को कहते है कि दुर्योधन में धर्म का वास हो रहा है कुरु पुत्रों में मित्रता बड़ रही है, लेकिन विदुर कहता है अगर गंधार राज शकुनी यहाँ नहीं होते तो वह मान सकता था कि सब कुशल वो अवश्य ही शांति भंग करने की कोई योजना बना रहे होंगे |

शकुनी, दुह्शासन और दुर्योधन से कहता है कि मकड़ी को श्रम से क्या लाभ होता है ? उसके श्रम से शत्रु स्वयम समर्पण करता है अपनी ही मृत्यु की तरफ बड़ता है असहाय होकर छटपटाता है और अंत में प्राण त्याग देता है | शकुनी भी अपने शत्रुओं की यही दुर्दशा देखना चाहता है | दुह्शासन उसे बताता है कि योजना के अनुसार काम प्रारम्भ कर दिया गया है पर क्या पांडव वन जायेंगे | शकुनी कहता है अवश्य जायेंगे, कीले के सिरे पर वार करने से उसका अंत भूमि में धसता है और इस समय कीले का सर भीष्म और अंत युधिष्ठिर है , अगर भीष्म का अपमान होगा तो युधिष्ठिर को अवश्य ही वन जाना होगा, इसलिए उनका अपमान जारी रखो | दुर्योधन कहता है अपमान का पहला चरण दुशाला का विवाह होगा |

गांधारी गहनों को स्पर्श कर उनका अनुभव करती है तभी उसकी दासी आती है जिससे वो पूछती है कि यह आभूषण कैसे है वो बहुत खुश है दुशाला के स्वयम्बर के लिए तब दासी उसे बताती है स्वयंबर नहीं हो सकता दुर्योधन ने दुशाला का विवाह सिन्धु नरेश जयद्रथ से तय कर दिया है | गांधारी चिंतित स्वर में कहती है यस कैसे हो सकता है सिन्धु नरेश से तो शत्रुता है पितामह कभी राज़ी नहीं होंगे |

राज्यसभा में, दुर्योधन सभी को बताता है कि उसने दुशाला का विवाह सिन्धु नरेश से तय कर दिया है | युधिष्ठिर कहता है यह सम्भव नहीं वह शत्रु देश है | दुर्योधन उसे यह उसका निजी मामला है कह कर चुप कर देता है | विदुर कहते है निर्णय लेने का काम मंत्रीमंडल का है और स्वयम्बर का प्रस्ताव वहीँ भेजा जाता है जहाँ राष्ट्र को हानि न हो | भीष्म कहते है दुशाला उसकी बहन ही नहीं कुरु राष्ट्र की पुत्री है |शकुनी कहता है कि वशिष्ठ का विवाह विदर्व की राजकुमारी लोकामुद्रा से हुआ क्यूंकि यह उसकी इच्छा थी तब दुशाला का विवाह उसकी मर्जी से कैसे नहीं हो सकता या यहाँ किसी की मर्जी नहीं चलेगी दुशाला को भी मन मारना होगा | विदुर शकुनी को अपनी वाणी पर अंकुश लगाने का कहते है | दुर्योधन शकुनी का साथ देते हुए कहते है कि शकुनी का अपमान करने का कोई भाव नहीं था| शकुनी कहता है सूर्य स्वयम जलता है इसलिए प्रकाश देता है, चन्द्रमा जल नहीं सकता इसलिए शीतलता देता है प्रकाश नहीं, अर्थात जिसने स्वयम घर नहीं बसाया वो किस प्रकार निर्णय ले सकते है |

दूसरा भाग
भीष्म कहते है मेरे भाई के पुत्र ही मेरा परिवार है ह्रदय को रक्त से दूर नहीं किया जा सकता उसमे जो सम्बन्ध होता है वही सम्बन्ध भीष्म और कुरु राष्ट्र की संतानों में है और भीष्म धृतराष्ट्र की तरफ देखता है कि शायद वो उसके अपमान का जवाब देगा पर वो मौन है | तभी विदुर कहता है कि गंधार राज स्मरण रहे कि प्रेम में ही कर्तव्य का निर्वाह होता है सूर्य प्रजा से प्रेम करता है तभी स्वयम जल कर प्रकाश देता है | शकुनी कहता है सूर्य के प्रकाश में वनस्पति पनपती है और चन्द्र के प्रकाश में औषधि परन्तु मूल्यवान वनस्पति है कर्तव्य का निर्वाह ही आवश्यक है | युधिष्ठिर कहता है कि पितामह ने जो आदेष दिया है वही होगा स्वयम्बर ही रचा जायेगा यही नीति है | दुर्योधन कहता है वो सभासदी नहीं है वो बंधा हुआ नहीं युधिष्ठिर युवराज है वो नियमो से बंधा है पर वो राजा का पुत्र है वो जो कहेगा वही होगा और उसे कोई नहीं रोक सकता | जलप्रपात पर कोई अंकुश नहीं लगा सकता स्वयम भूमि भी उस पर बाधक नहीं बन सकती|

तीसरा भाग
कक्ष में भीष्म बहुत चिंता में है तभी युधिष्ठिर आता है तभी भीष्म कहता है कि एक समय माता पार्वती ने खेल-खेल में भगवान शिव के नेत्र बन्द कर दिए थे जिस कारण पृथ्वी में अन्धकार उत्पन्न हो गया था और उस अन्धकार से अन्धक का जन्म हुआ जिसने पृथ्वी पर हाहाकार मचा दिया था और उस पर स्वयम माता पार्वती और भगवान शिव ही नियन्त्रण कर सकते थे | तभी युधिष्ठिर कहता है इस कारण विश्व के कल्याण के लिए उन्हें ही अपने पुत्र का समाधान करना चाहिए था | भीष्म कहते है परन्तु धृतराष्ट्र कभी दुर्योधन का समधान नहीं कर सकता अपितु करना ही नहीं चाहता | युधिष्ठिर कहता है इसका एक ही उपाय है कि धर्म की रक्षा के लिए दुर्योधन को युवराज बनाया जाये | भीष्म कहते है उन्हें युधिष्ठिर से इस तरह के वाक्य की कल्पना नहीं थी | युधिष्ठिर कहता है वो पितामह का अपमान नहीं देख सकता जो कि दुर्योधन बार बार करेगा | भीष्म कहते है उसने अपने पिता को वचन दिया था कि जब तक हस्तिनापुर में धर्म राज्य नहीं होगा, वो उसकी रक्षा करेगा और अगर दुर्योधन को युवराज बनाया गया, तो उसका वचन पूरा नहीं हो पायेगा जिसके लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया है उसका संघर्ष व्यर्थ साबित हो जायेगा और वह तब ज्यादा अपमानित होगा, वो युधिष्ठिर को कहता है कि युधिष्ठिर जब तक जीवीत है वो राष्ट्र का त्याग नहीं कर सकता |

याद रखने योग्य : दुर्योधन की इकलौती बहन दुशाला का विवाह सिन्धु नरेश जयद्रथ से तय किया गया जो कि हस्तिनापुर का दुश्मन है | और महर्षि वशिष्ठ की पत्नी विधर्व देश की राजकुमारी लोकामुद्रा से हुआ था |

Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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