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Mahabharat 26th December 2013 Episode 74 Update

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पहला भाग
दुर्योधन,दुह्शासन और शकुनी ठहाके लगा लगा कर हँस रहे है वो पांडवो को जिन्दा जलादेने वाली योजना को लेकर बहुत प्रसन्न है लेकिन कर्ण प्रसन्न नहीं | दुर्योधन कहता है उसके शत्रु समाप्त हो जायेंगे,तभी कर्ण कहता है केवल शत्रु नहीं उनके साथ सबका सामर्थ्य,सम्मान और हस्तिनापुर का गौरव भी समाप्त हो जायेगा | दुर्योधन पूछता है कर्ण यह किस तरह की बात कर रहा है ? और वह दुखी क्यु है ? कर्ण कहता है कि दुर्योधन उसे माफ़ करे, पर वह तब खुश होता, जब दुश्मन को अपने बाणों से मारता और अपने सीने पर दुश्मन के बाणों का घाव स्वीकारता अर्थात अगर युद्ध किया होता तो वह खुश होता | यह कार्य धर्म के विरुध्द है सोते हुए जीव को मारना धर्म नहीं है और इस तरह तो किसी योध्दा और हत्यारें में कोई अंतर नहीं रह जायेगा| शकुनी उसे जवाब देता है कि युध्द में जितना ही धर्म होता है और जो जीतता है वहीँ इतिहास रचता है इसलिए वो धर्म की बात ना करे | कर्ण कहता है धर्म वह है जिसमे मनुष्य की आत्मा का विकास होता है वह नहीं जिससे मनुष्य निर्बल बनता है तभी दुह्शासन बहुत तीखे शब्दों में कहता है कि कर्ण को शत्रुओ से प्रेम क्यु हो रहा है उसे याद नहीं कि उसे अंग राज किसने बनाया | दुर्योधन दुह्शासन को मौन रहने को कहता है और ऐलान करता है जैसा उसका मित्र कर्ण कहेगा वैसा ही होगा उसके दिल को दुखाने का कोई काम नहीं होगा अत : पुरोचन को संदेश भेजो कि योजना निषेध की जाये | दुह्शासन उसे रोकता है पर दुर्योधन कर्ण से कहता है पहले वो अपने मित्र का हित ही देखेगा चाहे उसका हक़ ना मिले और उसे सन्यास लेना पड़े | कर्ण कहता है वो उसके युवराज बनने की खिलाफ़ नहीं अपितु छल के खिलाफ़ है और वह युद्ध के साथ है | दुर्योधन कहता है वो किससे युद्ध करेगा उसके पिता से? जीत किसी की भी हो उसकी तो हार ही है उसके पास छल के अलावा कोई रास्ता नहीं छोड़ा पांडवों ने |अब बस यही रास्ता है या तो छल करे या अधिकार का त्याग और अधिकार का त्याग करने वालो को भी नरक ही मिलता है | दुर्योधन की इस बात पर शकुनी कर्ण से पूछता है कि क्या उसे दुर्योधन के हक़ पर भी संदेह है अगर है तो वह बोले |कर्ण कहता है उसे हक़ के लिए कोई संदेह नहीं है तभी दुर्योधन कर्ण से बीच का रास्ता निकालने को बोलता है लेकिन कर्ण मौन है |
दूसरा भाग
कुन्ती और सभी पांडव वारणावत के लिए निकलने से पहले सबसे विदा लेते है | कुन्ती, गांधारी के गले मिलती है और धृतराष्ट्र से भी विदा लेती है | भीष्म युधिष्ठिर से कहता है कि यात्रा में विघ्न डालना सही नहीं पर उनका इस वक्त हस्तिनापुर से दूर जाना सही नहीं है इसलिए सभी शीघ्र ही वापस लौट आये |भीम कहता है उनका भी हस्तिनापुर के बिना रहना सम्भव नहीं है चिंता लगी रहेगी और दुर्योधन की तरफ देखता है | शकुनी बहुत ही करुण शब्दों से कुन्ती से विदा लेता है जिसे देख कर्ण का मन भर आता है और उसे किसी का भी इस तरह से जाना ठीक नहीं लगता पर वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता | दुर्योधन, युधिष्ठिर से कहता है हस्तिनापुर और यहाँ की प्रजा की चिंता न करे तभी युधिष्ठिर जवाब देता है कि प्रजा की चिंता तो स्वयम देवता करते है परन्तु मनुष्य की चिंता करनी पड़ती है क्यूंकि अधर्मी का साथ स्वयम भगवान भी नहीं देते | भीम कहता है जेष्ठ का मतलब यह है कि उन्हें दुर्योधन की चिंता रहेगी | दुर्योधन कहता है उनकी सभी चिंताएं शीघ्र ही समाप्त होंगी |
तीसरा भाग
प्रस्थान करने के पहले कुन्ती कर्ण से मिलती है | कर्ण उसके चरण स्पर्श करता है और कुन्ती उसे यशस्वी भव का आशीर्वाद देती है साथ ही आशीर्वाद देती है कि कर्ण धर्ममय बने क्यूंकि अधर्म वह पारा है जो स्वर्ण का रंग भी बदल देता है| कुन्ती प्रस्थान करती है पर उसकी आँखों में आंसू है और कर्ण भी दुखी है |
द्वारिका में, अर्जुन कृष्ण से विदा लेता है और कहता है उसने थोड़े वक्त में ही उससे बहुत कुछ सिखा, तभी कृष्ण ने कहा जिसकी मन की स्थिती सीखने की होती है वही सीखते है | कृष्ण अर्जुन से कहते है रास्ते में त्रिवेणी संगम है वहाँ स्नान करे और गुप्त सरस्वती की कथा का स्मरण करे तो उसे पुन्य मिलेगा | अर्जुन कहता है उसे यह कथा नहीं मालूम | कृष्ण बताते है जब सरस्वती माता को हाथ में अग्नी लेकर पृथ्वी पर चलाना था, उनसे यह नहीं हुआ तो वह पृथ्वी के नीचे रहने चली गई |

याद रखने योग्य : लक्क्ष्याग्रृह  कोरवों की पांडवों को मारने की एक साजिश थी, जिसमे उन्होंने पांडवों को छल से फंसाया और यह वारणावत की भूमि पर हुआ था |
precap: पांडव वारणावत पहुँचते है जहा प्रजा उन्हें नव निर्मित महल दिखाती है,जिसमे प्रवेश से पहले कुन्ती दीपक जलाने का बोलती है जिसे सुन पुरोचन भयभीत है |

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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