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Mahabharat 3 December 2013 Episode 57 Update

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पहले भाग में

अर्जुन, भोज में हुए उसके और कर्ण के बीच के व्यवहार के लिए कुन्ती से क्षमा मांगता है,कुन्ती अपने आंसू पौछ कर उसे कहती है कि वो आज अर्जुन को अपने हांथो से भोजन कराना चाहती है, लेकिन अर्जुन कहता उसके कारण पितामह भीष्म को भी बहुत दुःख हुआ है इसलिए वह पहले उनसे क्षमा मांगने जायेगा |

भीष्म अपने कक्ष में गहरी सोंच में है और भोज में हुए द्वंद के बारे में बार-बार सोच रहा है तभी अर्जुन भीष्म के कक्ष में आता है और भीष्म को प्रनिपाथ करता है | भीष्म बहुत दुखी स्वर में उससे कहता है कि आज जो कुछ भी भोज में हुआ, वो बहुत गलत था | अर्जुन कहता है वह उस बात के लिए क्षमा मांगने आया है| भीष्म उससे कहता है कि उसे क्षमा क्यु मांगना है गलत धृतराष्ट्र ने किया है अंगराज और अर्जुन के द्वंद को राजनैतिक बनाना गलत था | लेकिन भीष्म और विदुर कुछ कर न सके | अर्जुन कहता है वो भीष्म की दुविधा समझता है | भीष्म कहता है वो नहीं समझ सकता,जब सिंघासन पर अयोग्य राजा होता है तो उसके द्वारा लिए गये गलत निर्णयों का भागीदारी सबको बनना पड़ता है | पता नहीं कल की सभा में धृतराष्ट्र किसे युवराज बनाये और किस तरह का राजा हस्तिनापुर को मिले | अर्जुन कहता है अगर भीष्म आज्ञा दे, तो वो चारो भाई अपने सामृथ्य पर युधिष्टिर को राजा बना सकते है | भीष्म कहता है अगर पांडव हस्तिनापुर के विरुद्ध युद्ध करते है,तो उन्हें भीष्म का सामना करना पड़ेगा और जब तक स्वयम भगवान् उनका साथ ना दे ,तब तक, पांडव भीष्म को हरा नहीं सकते |

दूसरी तरफ, अश्व्थामा अपने पिता गुरु द्रोण को यह बताता है कि कल प्रातः सभा में धृतराष्ट्र,दुर्योधन को युवराज घोषित कर देगा और उसके बाद दुर्योधन अश्व्थामा को राजा बनाएगा, जैसा दुर्योधन ने उसे वचन दिया था | गुरु द्रोण को देखकर अश्व्थामा पूछता है कि क्या दुर्योधन युवराज नहीं बन पायेगा | गुरु द्रोण ने कहा कि युवराज योग्यता के बल पर बनता है |

दूसरा भाग

सभी कुमार सभा में जा रहे है, तभी दुर्योधन मूर्तिकार को आदेष देता है कि उसकी मूर्ती सबसे ऊँची होना चाहिए| मूर्तिकार हाथ जोडकर कहता है,सभी की मूर्ती समाना बनाने की प्रथा है| दुशासन कहता है जो कहा है वो ही किया जाये, वो अभी राजा का आदेष भिजवाता है | तभी अश्व्थामा आता है कहता है परम्परा तोड़ने की क्या जरूरत, मूर्ती लम्बी न सही ऊंचाई पर तो रखी जा सकती है, अब बस यह देखना है इस मूर्ती के नीचे क्या रखे| कर्ण कहता है उसकी मूर्ती बनाई जाये और उसके कंधों पर दुर्योधन की मूर्ती राखी जाये| दुर्योधन कहता है वह मित्रो के साथ खड़ा होता है और शत्रुओ के कंधे पर | दूसरी तरफ से पाँचों पांडव सभा के लिए आ रहे है जिन्हें देख दुशासन कहता है फिर तो पांच मूर्ती बनानी होगी| इस तरह कोरव और उनके मित्र पांडव का उपहास करते है |

तीसरा भाग

गांधारी शिवलिंग की पूजा कर रही है तभी शकुनी वहाँ कुछ रखता है |गांधारी पूछती है यह क्या है ?तब शकुनी कहता है पिण्ड है गांधारी तेज स्वर में पूछती है कि यह किस अतृप्त आत्मा का लोह का बना पिण्ड है | शकुनी कहता है कि आत्मा के पिण्ड तो मिट्टी के बनते है ,यह तो अतृप्त इच्छा का पिण्ड है जो आज पूरी होगी, जब सभा में दुर्योधन को युवराज बनाया जायेगा और कुछ समय बाद राजा, जिसके बाद यहां गंधार का राज होगा | गांधारी गुस्से से कहती है तो क्या वो हस्तिनापुर को खत्म करना चाहता है शकुनी कहता है वो बस यहाँ की निती बदलना चाहता है और भीष्म का घमंड तोडना चाहता है जो आज सभा में टूट जायेगा|

ध्वनी सुनाई देती है, आज हस्तिनापुर में युवराज के पद की घोषणा की जाएगी |
राज्यसभा में सभी आसीन है धृतराष्ट्र आता है और आसन पर बैठता है एवम महामंत्री विदुर को सभा शुरु करने की आज्ञा देता है | विदुर , धृतराष्ट्र से निवेदन करता है कि सबसे पहले कुरु राज कुमारों को पितामह का आशीर्वाद लेलेने दिया जाये | धृतराष्ट्र कहता है पितामह सभा की शुरुवात करेंगे | तभी शकुनी धीमे स्वर में दुर्योधन को बोलता है भीष्म क्या बोलना चाहता है ? दुर्योधन कहता है क्या बोलेंगे बस आशीर्वाद ही देंगे |

Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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