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Mahabharat 4 December 2013 Episode 58 Update

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पहला भाग

भीष्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहते है कि आज का दिन हस्तिनापुर के लिए नया सबेरा ले कर आया है, जब भी सूर्य यात्रा पर निकलता है तो एक पल अपनी पुरानी जिन्दगी को देखता है | उसी प्रकार वो आज अपनी बीती हुई जिन्दगी को देख रहे है, जिसमे उन्हें धृतराष्ट्र, पांडू और विदुर खेलते हुए दिखाई देते है, एक दिन जब, ये तीनो एक विचित्र खेल खेलते है, जिसमे पांडू और विदुर वृक्ष की टहनी पर चढ़ जाते है और धृतराष्ट्र को आवाज देते हुए कूद जाते, धृतराष्ट्र भी इन दोनों को धरती पर गिरने नहीं देता पकड लेता है | तब भीष्म ने पांडू से प्रश्न किया कि यह कैसा खेल है ?अगर वो दोनों गिर जाते तो मर सकते थे | तब पांडू कहता है कि भाई धृतराष्ट्र के होते हुए यह सम्भव ही नहीं, पांडू को सबसे ज्यादा विश्वास अपने बड़े भाई पर था | भीष्म कहते है जब पांडू को लेने यमराज आये होंगे ,तब उसने निःसंदेह एक बार भी यमराज से यह नहीं पूछा होगा कि वह अपने पांच पुत्रो को किसके सहारे छोड़े जा रहा है क्योंकि उसे अपने जेष्ठ पर पूरा भरोसा था | भीष्म, महारज से कहते है कि युवराज पद की घोषणा से पहले धर्म और सत्य का मुल्यांकन अवश्य करे, इसमें ईश्वर महाराज को प्रेरणा दे, यही भीष्म का आशीर्वाद है |शकुनी व्यंग में दुर्योधन को धीमे स्वर में बोलता है “भेरव ने भेरवी गाली”| विदुर कहता है “महाराज के निर्णय की सभी को प्रतीक्षा है” |

तभी धृतराष्ट्र को याद आता है, (जब पांडू युद्ध जीतकर आया था, उसने अपनी जीत का पूरा श्रेय अपने जेष्ठ धृतराष्ट्र को दिया था)धृतराष्ट्र कहता है उसके सामने विकट परिस्थिती है, अगर स्पर्धा का कोई उचित परिणाम निकलता तो आज दुविधा नहीं होती,एक राजा में धर्म का वास होता है और उसे धर्म को अपने अंदर टटोलना आवयश्क है | तभी दुर्योधन कहता है कि सभा में किसी को धृतराष्ट्र के धर्म के विषय में संदेह नहीं है और वो अवश्य ही धर्म अनुकूल निर्णय लेंगे इसलिए अपना निर्णय सुनाये |

दूसरा भाग

धृतराष्ट्र युवराज पद की घोषणा करने जा ही रहे थे कि इतने में गुरु द्रोण सभा में आजाते है और कहते है कि वो महाराज से विनती कर रहे कि उनके शिष्यों में से युवराज का चयन यह न करे | धृतराष्ट्र कहता है वह कहने का तात्पर्य नहीं समझा | विदुर कहता है कि गुरु द्रोण की गुरु दक्षिणा अभी उनके शिष्यों ने नहीं दी है और अगर गुरु खुद योग्य शिष्य चुने तो हम पर भेद-भाव का कोई आरोप भी नहीं लगा पायेगा | शकुनी कहता है बार बार प्रतिस्पर्धा क्यु की जाये,” बार बार दर्पण में चेहरा देखने से उसी चेहरे में दोष दिखने लगता है |” विदुर कहता है गुणों की तुलना बाहरी आवरण से करना गलत है |

धृतराष्ट्र पूछता है गुरु द्रोण को क्या चाहिए गुरु दक्षिणा में ? द्रोण कहता है उसे पांचाल के राजा द्रुपद से प्रतिशोध चाहिए | जो भी शिष्य यह कर पायेगा वह श्रेष्ठ होगा | द्रुपद ने द्रोण की शिक्षा का अपमान किया था उसने उसी दिन प्रण लिया था कि वह अपने शिष्यों को योग्य बनाएगा और द्रुपद से प्रतिशोध लेगा | धृतराष्ट्र मना कर देता है कहता है कि द्रुपद बहुत शक्तिशाली और बलवान है ,उसकी सेना भी बहुत बड़ी है कुरु कुमार यह नहीं कर सकते | और द्रोण से कुछ और मांगने को कहता है द्रोण कहते है यह कोई व्यापार नहीं है | वह भी किसी और राज्य से शक्तिशाली शिष्य ढूंढ लेगा और जाते जाते वह कह जाता है अगर कुरु कुमारों में इतना सामर्थ्य नहीं तो धृतराष्ट्र को भी किसी और राज्य से योग्य राजा खोजना चाहिए | और वो लौटने लगता है तभी पीछे से अर्जुन गुर को पुकारता है |

Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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