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हिंदी कविता : मन नहीं हैं मेरा

मन नहीं हैं मेरा हिंदी कविता | जब इन्सान अकेला हो जाता हैं जब उसका कोई साथ नहीं देता उस वक्त वो खुद से भी हताश हो जाता हैं पर वो कब तक ऐसे रह सकता हैं कब तक खुद से नाराज हो सकता हैं वो खुद को जानता हैं अपनी तकलीफ को महसूस कर सकता हैं अपने डर को समझता हैं कोई साथ दे न दे उसे खुद का हाल तो समझना पड़ता हैं |वो गलत हो या सही उसे खुद को समझाना पड़ता हैं |

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मन

मन नहीं हैं मेरा
पर, खुद से नज़रे मिलाना पड़ता हैं
खुद को प्यार से सहलाना पड़ता हैं
ना चाह कर भी खुद को हँसाना पड़ता हैं

कैसे छोड़ में भी इस दिल का साथ
जो, तन्हाई से डरता हैं
बस प्यार से सम्भलता  हैं
इक पल की ख़ुशी में नाच उठता हैं

मन नहीं हैं मेरा
पर, खुद का हाल तो सुनना पड़ता हैं ||

कर्णिका पाठक

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Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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