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स्वामी विवेकानंद जीवन परिचय एवम अनमोल वचन | Swami Vivekanand biography Quotes In Hindi

Swami Vivekanand biography Quotes In Hindi हमारे देश में जन्मे एक मठवासी [Monk] संत, जिन्होंने अपने छोटे – से जीवनकाल में अपने कार्यों के कारण प्रसिद्धि प्राप्त की और केवल देश ही नहीं, विदेशों में भी उनके ज्ञान और मंतव्यों का लोहा माना गया, ऐसे महापुरुष थे –“स्वामी विवेकानंद ”.

19वीं सदी में भारतीय विद्वान् रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और भारतीय संस्कृति एवं साहित्य को विदेशों तक फ़ैलाने में जिस महापुरुष का योगदान था, वे थे स्वामी विवेकानंद. सम्पूर्ण विश्व में ‘हिन्दूधर्म’ का स्थान बनाने और इसके महत्व को बताने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा हैं.

स्वामी विवेकानंद जीवन परिचय  ( Swami Vivekanand biography In Hindi)

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स्वामी विवेकानंद का संक्षिप्त परिचय -:

नाम नरेन्द्रनाथ दत्त
घरेलु नाम नरेन्द्र और नरेन
मठवासी [Monk] बनने के बाद नाम स्वामी विवेकानंद
पिता का नाम विश्वनाथ दत्त
माता का नाम भुवनेश्वरी देवी
भाई – बहन 9
जन्म तिथी 12 जनवरी, 1863
जन्म स्थान कलकत्ता, भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंस
शिक्षा – दीक्षा बेचलर ऑफ़ आर्ट [1984]
संस्थापक [Founder] रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ
फिलोसोफी आधुनिक वेदांत और राज योग
साहित्यिक कार्य

[Literary Work]

राज योग, कर्म योग, भक्ति योग, मेरे गुरु [My Master], अल्मोरा से कोलोंबो तक दिए गये सभी व्याख्यान [Lectures].
अन्य महत्वपूर्ण कार्य न्यू यॉर्क में वेदांत सोसाइटी की स्थापना, केलिफोर्निया में ‘शांति आश्रम [Peace Retreat]’ और भारत में अल्मोड़ा के पास अद्वैत आश्रम की स्थापना.
उल्लेखनीय शिष्य

[ Notable Disciples ]

अशोकानंद, विराजानंद, परमानन्द, अलासिंगा पेरूमल, अभयानंद, भगिनी [Sister] निवेदिता, स्वामी सदानंद.
मृत्यु तिथी 4 जुलाई, 1902
मृत्यु स्थान बेलूर, पश्चिम बंगाल, भारत

स्वामी विवेकानंद ने भारत के आध्यात्मिक उत्थान [Spiritual Enlightenment] के लिए बहुत कार्य किया. पश्चिम के देशों में वेदांत फिलोसफी फैलाई. वे वेदांत फिलोसोफी के सर्वाधिक प्रभावी, आध्यात्म प्रमुख व्यक्ति थे और उन्होंने गरीबों की सेवा के लिए “रामकृष्ण मिशन” की स्थापना की. वे त्याग की मूर्ति थे और उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश और गरीबों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया. इसके लिए वे हमेशा लालायित रहते थे. उन्होंने देश के युवाओं में प्रगति करने के लिए नया जोश और उत्साह भर दिया था. वे एक देशभक्त संत के रूप में जाने जाते हैं, इसलिए उनके जन्म दिवस को “राष्ट्रीय युवा दिवस [National Youth Day]” के रूप में मनाया जाता हैं. रामकृष्ण परमहंस के जीवन  के बारे में पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.

नरेन्द्र का परिवार [Swami Vivekananda family] -:

नरेन्द्र का जन्म ब्रिटिश राज में कलकत्ता शहर में 12 जनवरी, 1863 को मकर संक्रांति के दिन हुआ था. मकर संक्रांति का महत्व जानने के लिए यहाँ क्लिक करें. वे एक पारंपरिक बंगाली परिवार से थे और कुल 9 भाई – बहन थे. उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायलय [High Court] में अभिवक्ता [Attorney] थे और माता भुवनेश्वरी देवी एक धार्मिक घरेलु महिला थी. उनके दादाजी संस्कृत और फारसी के विद्वान थे. घर में ही इस प्रकार के धार्मिक और शिक्षित माहौल ने नरेन्द्र का इतना उच्च व्यक्तित्व बनाया.

नरेन्द्र का बचपन और उनसे जुड़े किस्से [Swami Vivekananda childhood] -:

जब नरेन्द्र छोटे थे, तब वे बहुत शरारती हुआ करते थे. वे पढाई के साथ – साथ खेलकूद में भी अव्वल थे. उन्होंने संगीत में गायन और वाद्य यंत्रों को बजाने की शिक्षा ग्रहण की थी. बहुत ही कम उम्र से वे ध्यान [Meditation] भी किया करते थे. मेडिटेशन कैसे करें ये जानने के लिए यहाँ क्लिक करें. अपने बचपन में वे ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में और विभिन्न रीति – रिवाजो के बारे में और जातिवाद [Castizm] के बारे में प्रश्न किया करते थे और इनके सही या गलत होने के बारे में जिज्ञासु थे. बाल्यकाल से ही नरेन्द्र के मन में सन्यासियों के प्रति बड़ी श्रद्धा थी, अगर उनसे कोई सन्यासी या कोई फ़कीर कुछ मांगता या किसी व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता होती थी और अगर वो नरेन्द्र के पास होती थी तो वे तुरंत ही उसे दे देते थे.

नरेन्द्र अपने बचपन में जितने भले स्वभाव वाले थे, उतने ही शरारती भी थे. इसकी पुष्टि इस बात से होती हैं कि उनकी माँ उनके बारे में एक बात कहती थी कि वे भगवान शिव से हमेशा एक बालक देने की प्रार्थना करती थी और उन्होंने यह प्रार्थना स्वीकार की और अपने किसी भूत [Ghost] को भेज दिया.

नरेन्द्र की शिक्षा दीक्षा [Swami Vivekananda education] -:

सन 1871 में, जब नरेन्द्र 8 वर्ष के थे, उनका प्रवेश ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूशन में करा दिया गया और सन 1877 तक उन्होंने यही शिक्षा प्राप्त की. सन 1877 – 1879 तक वे सह परिवार रायपुर में रहे और सन 1879 में पुनः कलकत्ता लौट आये.

सन 1879 में नरेन्द्र ने अपनी मेट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण [pass] की और कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया. एक साल बाद उन्होंने कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया और फिलोसफी पढ़ना प्रारंभ किया. यहाँ उन्होंने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी फिलोसफी और यूरोपियन देशों के इतिहास के बारे में ज्ञानार्जन किया.

नरेन्द्र विभिन्न विषय पढ़ते थे, जिनमें फिलोसफी, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य, आदि शामिल थे. इसके अलावा वे हिन्दू धर्म ग्रंथों, वेदों, उपनिषदों, श्रीमद् भगवद गीता, रामायण, महाभारत औरपुराणों में भी बड़ी रूचि रखते थे और इन्हें पढ़कर वे अपनी जिज्ञासाओं को भी शांत करते थे.

सन 1884 में नरेन्द्र ने बेचलर ऑफ़ आर्ट की डिग्री प्राप्त कर ली थी. नरेन्द्र की आश्चर्यजनक याददाश्त के कारण उन्हें कुछ लोग ‘श्रुतिधरा’ भी कहते थे.

नरेन्द्र की बढ़ती उम्र के साथ उनका ज्ञान तो बढ़ ही रहा था, परन्तु उनके तर्क भी प्रभावी होते जा रहे थे. उनके मन की ईश्वर के अस्तित्व की बात और भी गहराती गयी और इसी ने उन्हें “ब्रह्मसमाज” से जोड़ा. परन्तु उनकी प्रार्थनाओं के तरीकें और भजन, आदि में निहित सार भी उनकी ईश्वर के प्रति जिज्ञासा को शांत नहीं कर पाया.

गुरु से मिलन [Meeting of his Teacher] -:

ब्रह्म समाज से जुड़ने के बाद नरेन्द्र को ब्रह्म समाज के प्रमुख देवेन्द्रनाथ टैगोर से मिलने का मौका मिला और अपनी आदत के अनुसार उनसे पूछा कि “क्या उन्होंने ईश्वर को देखा हैं?”, तब देवेन्द्रनाथजी ने उनके प्रश्न का उत्तर देने की बजाय उनसे कहा कि “बेटे, तुम्हारी नज़र एक योगी की हैं.” और इसके बाद भी उनकी ईश्वर की खोज जारी रही.

ब्रह्म समाज से जुड़ने के बाद, परन्तु अपने अध्ययन के दौरान ही सन 1881 मेंवे दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण परमहंस से मिले. श्री रामकृष्ण परमहंस माँ काली के मंदिर में पुजारी हुआ करते थे. वे बहुत बड़े विद्वान तो नहीं, परन्तु एक परम भक्त अवश्य थे. जब नरेन्द्र उनसे पहली बार मिले तो अपनी आदत और जिज्ञासा वश उन्होंने रामकृष्ण परमहंस से भी पूछा कि “क्या उन्होंने ईश्वर को देखा हैं ?” तो रामकृष्ण परमहंस ने उत्तर दिया कि “हाँ, मैंने ईश्वर को देखा हैं और बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ.” नरेन्द्र को ऐसा उत्तर देने वाले वे प्रथम व्यक्ति थे और नरेन्द्र उनकी बात की सच्चाई को महसूस भी कर पा रहे थे. उस समय वे पहली बार किसी व्यक्ति से इतना प्रभावित हुए थे. इसके पश्चात् उन्होंने रामकृष्ण परमहंस से कई मुलाकातें की और अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने में सक्षम इस व्यक्ति [रामकृष्ण परमहंस] को अपना गुरु बना लिया. इस प्रकार नरेन्द्र ने अपने गुरु की छत्र – छाया में 5 सालों तक ‘अद्वैत वेदांत’ का ज्ञान प्राप्त किया.

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु और मठवासी बनने का निर्णय [Death of Ramkrishna Paramhans & Decision to be a Monk] -:

सन 1886 में रामकृष्ण परमहंसकी मृत्यु हो गयी, वे गले के कैंसर से पीड़ित थे. उन्होंने अपना उत्तराधिकारी नरेन्द्र को बनाया था. अपने गुरु की मृत्यु के पश्चात् वे स्वयं और रामकृष्ण परमहंस के अन्य शिष्यों [disciples] ने सब कुछ त्याग करके, मठवासी [Monk] बनने की शपथ ली और वे सभी बरंगोर [Barangore] में निवास करने लगे.

स्वामी विवेकानंद की यात्राएं [Swami Vivekananda journey to america] -:

सन 1890 में नरेन्द्र ने लम्बी यात्राएँ की, उन्होंने लगभग पूरे देश में भ्रमण किया. अपनी यात्राओं के दौरान वे वाराणसी, अयोध्या, आगरा, वृन्दावन और अलवर, आदि स्थानों पर गये और इसी दौरान उनका नामकरण हुआ – स्वामी विवेकानंद के रूप में. यह नाम उन्हें खेत्री के महाराज ने उन्हें दिया था, उनके अच्छे और बुरे में फर्क करके अपने विचार रखने की आदत के कारण. इस यात्रा के दौरान वे राजाओं के महल में भी रुकें और गरीब लोगों के झोपड़ों में भी. इससे उन्हें भारत के विभिन्न क्षेत्रों और वहाँ निवास करने वाले लोगों के संबंध में पर्याप्त जानकारी मिली. उन्हें समाज में जात – पात के नाम पर फैली तानाशाही [Tyranny] के बारे में जानकारी मिली और इस सब से अंततः उन्हें ये समझ आया कि यदि उन्हें एक नये विकसित भारत का निर्माण करना हैं तो उन्हें इन बुराइयों को ख़त्म करना होगा.

अपनी यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद के साथ उनका कर्मकुंडल [वाटर पॉट], उनका स्टाफ और 2 किताबें -: श्रीमद् भगवत गीता और दी इमिटेशन ऑफ़ क्रिस्ट हमेशा रहती थी. इस भ्रमण के दौरान उन्होंने भिक्षा [Alms] भी मांगी. श्रीमद भगवत गीता में श्रीकृष्ण के अनमोल वचन  जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|

विश्व धर्म सम्मलेन [Conference of World Religions] -:

सन 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका के शिकागो शहर पहुंचें. यहाँ सम्पूर्ण विश्व के धर्मों का सम्मेलन आयोजित किया गया था. इस सम्मलेन में एक स्थान पर सभी धर्म गुरुओं ने अपने – अपने धर्म की पुस्तकें रखी थी, वहाँ हमारे देश के धर्म के वर्णन के लिए रखी गयी एक छोटी सी किताब थी – “श्रीमद् भगवत गीता”, जिसका कुछ लोग मजाक बना रहे थे, परन्तु जैसे ही स्वामी विवेकानंद की बारी आई और उन्होंने अपना भाषण देने की शुरुआत की, वैसे ही सारा हॉल तालियों की आवाज से गूंज उठा क्योंकि स्वामी विवेकानंद के द्वारा अपने भाषण की शुरुआत में कहे गये वे शब्द थे -: “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों”, इसके बाद उनके द्वारा किये गये धर्म के वर्णन से सभी लोग अभिभूत हो गये और हमारी धार्मिक किताब श्रीमद् भगवत गीता का सभी ने लोहा माना.

अन्य आध्यात्मिक कार्य -:

स्वामी विवेकानंद जी को वहाँ की प्रेस ने “Cyclonic Monk from India” का नाम दिया था. उन्होंने ऐसी ही कई जगहों, घरों, कॉलेजों में अपने व्याख्यान दिए और उनके वक्तव्य के विषय होते थे -: भारतीयता, बुद्धिज्म और सामंजस्य.

स्वामी विवेकानंदजी ने लगभग 2 सालों तक पूर्व एवं मध्य यूनाइटेड स्टेट्स में लेक्चर देने में व्यतीत किये, जिनमे मुख्य रूप से शिकागो, न्यू यॉर्क, डेट्रॉइट और बोस्टन शामिल हैं. सन 1894 में न्यू यॉर्क में उन्होंने ‘वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना की.

सन 1895 तक उनके व्यस्त कार्यक्रमों और दिनचर्या का असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ने लगा था और इसीलिए अब उन्होंने अपने लेक्चर टूर को विराम दिया और वेदांत और योग के संबंध में निजी कक्षाएं [प्राइवेट क्लास] देने लगे. इस वर्ष में नवम्बर माह में वे एक आयरिश महिला मार्गरेट एलिज़ाबेथ से मिले, जो आगे जाकर उनकी प्रमुख शिष्यों में से एक रही और बाद में उन्हें भगिनी [Sister] निवेदिता के नाम से जाना गया.

सन 1896 में उन्हें ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के मैक्स मुलर से मिले, जो एक इंडोलोजीस्ट थे और पश्चिम में स्वामी विवेकानंदजी के गुरु रामकृष्ण परमहंसजी की जीवनी लिखने वाले प्रथम व्यक्ति थे. उनके ज्ञान और विद्वता को देखते हुए हॉवर्ड यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अकादमिक पद [Academic Poste] का प्रस्ताव [Offer] दिया गया, परन्तु अपने मठवासी जीवन के बन्धनों के कारण स्वामीजी ये प्रस्ताव ठुकरा दिए.

भारत आगमन और रामकृष्ण मिशन की स्थापना [Swami Vivekananda and Ramakrishna mission] -:

पश्चिमी देशों की 4 सालों लम्बी भ्रमण यात्रा के बाद सन 1897 में स्वामी विवेकानंद भारत लौट आये. अपनी यूरोप यात्रा के बाद स्वामी विवेकानंद हमारे देश के दक्षिणी क्षेत्रों -: पंबन, रामेश्वरम, रामनाद, मदुरै, कुम्बकोनाम और मद्रास में भी अपने लेक्चर देने गये. वे अपने लेक्चर्स में हमेशा निम्न श्रेणी के लोगों के उत्थान की बात कहते थे. इन सभी स्थानों पर सामान्य जनता और राज घरानों ने इनका उत्साह पूर्वक स्वागत किया.

इस दौरान वे ये अनुभव कर चुके थे कि यदि भारत में विकास की नई लहर शुरू करनी हैं तो जातिवाद को ख़त्म करना होगा, धर्म का सही अर्थ लोगों को समझाना होगा और उनका आत्मिक विकास [Spiritual Development] करना होगा और ये सब एक मिशन की स्थापना से ही संभव हैं. तब उन्होंने अपने गुरु के नाम पर ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की और इसके सिद्धांत और लक्ष्य निश्चित किये, जो कि कर्म योग पर आधारित थे.

अगले 2 साल में वे गंगा नदी के किनारे एक जमीन खरीदने और वहाँ एक भवन का निर्माण कराने में व्यस्त रहें और यहाँ ‘रामकृष्ण मठ’ की स्थापना की.

रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ दोनों का ही प्रमुख केंद्र [Headquarters] बेलूर मठ हैं.

इनके अलावा स्वामी जी ने अन्य 2 मठों की और स्थापना की, जिसमे से एक ‘अद्वैत आश्रम’ हैं, जो हिमालय में अल्मोड़ा के पास मायावती में स्थित हैं और दूसरा मद्रास में स्थित हैं. इसके साथ ही 2 जर्नल्स की भी शुरुआत की -: अंग्रेजी भाषा में ‘प्रबुद्ध भारत’ और बंगाली में ‘उद्बोधन’.

विवेकानंद जी ने शिकागो में प्रथम विज़िट की यात्रा के दौरान  जमशेद टाटा को अन्वेषण और शिक्षण संस्थान [Research and Educational Institution] खोलने के लिए प्रेरित किया गया. इसकी स्थापना के बाद जमशेदजी टाटा ने उन्हें इस संस्थान के प्रमुख पद को ग्रहण करने का प्रस्ताव दिया, परन्तु उन दोनों के बीच ‘आध्यात्मिक विचार’ न मिलने के कारण स्वामी विवेकानंदजी ने उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.

पश्चिम का दूसरा दौरा और अंतिम वर्ष [Second Visit to the West and Final Years] -:

सन 1899 में अपने गिरते स्वास्थ्य के बाबजूद, स्वामी जी ने दूसरी बार अपने पश्चिम के दौरे का निश्चय किया और इस बार उनके साथ उनके शिष्य भगिनी निवेदिता और स्वामी तुरियानंद जी थे. इस दौरान उन्होंने सेन फ्रांसिस्कों और न्यू यॉर्क में ‘वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना की और केलिफोर्निया में ‘शांति आश्रम [Peace Retreat]’ स्थापित किया.

सन 1900 में वे ‘धर्म सभा’ हेतु पेरिस चले गये. यहाँ उनका लेक्चर ‘लिंगम की पूजा’ और ‘श्रीमद् भगवद की सत्यता’ पर आधारित था. इस सभा के बाद भी वे अनेक स्थानों पर गये और अंत में 9 दिसंबर, 1900 को कलकत्ता वापस लौट आए और फिर बेलूर में स्थित बेलूर मठ गये. यहाँ उनसे मिलने वालों में जन साधारण जनता से लेकर, राजा और राजनैतिक नेता भी शामिल होते थे.

सन 1901 में उन्होंने कुछ तीर्थ यात्राएँ की, जिनमे उनका बोधगया और वाराणसी जाना, शामिल हैं. गिरते स्वास्थ्य के कारण वे अस्थमा, डायबटीज और नींद न आने जैसी बिमारियों से ग्रसित हो गये. डायबटीज से बचने के उपाय जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|

स्वामी विवेकानंदजी की मृत्यु  [Death of Swami Vivekanand] -:

4 जुलाई, 1902 अपनी मृत्यु के दिन, वे प्रातः जल्दी ही उठ गये थे. वे बेलूर मठ गये और वहाँ 3 घंटों तक ध्यान [Meditation] किया और फिर अपने शिष्यों को शुक्ल – यजुर्वेद, संस्कृत व्याकरण [Grammer] और योग की फिलोसोफी का ज्ञान दिया. शाम को 7 बजे वे अपने कमरे में गये और किसी को भी डिस्टर्ब करने से माना किया. रात 9.10 बजे ध्यान के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी. उनके शिष्यों के अनुसार उन्होंने ‘महा-समाधी’ ली थी. उनका अंतिम संस्कार गंगा नदी के तट पर किया गया.

स्वामी विवेकानंद की सीखें और फिलसोफी [Teachings & Philosophy of Swami Vivekanand] -:

स्वामी विवेकानंद जी के विचारों में राष्ट्रीयता हमेशा सम्मिलित रही, वे हमेशा देश और देशवासियों के विकास और उत्थान के लिए कार्यरत रहें. उनका मानना थे कि प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में एक विचार या संकल्प निश्चित करना चाहिए और सम्पूर्ण जीवन उसी संकल्प के लिए न्यौछावर कर देना चाहिए, तभी आप सफलता पा सकेंगे.

स्वामी विवेकानंद का प्रभाव [Influence of Swami Vivekanand] -:

स्वामी विवेकानंद एक ऐसी हस्ती थे, जिनका प्रभाव कई ऐसे लोगों पर पड़ा, जो स्वयं दूसरों को प्रभावित करने में पूर्णतः सक्षम थे. इन लोगों में मुख्य रूप से शामिल थे -: हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, ओरोबिन्दो घोष, रबिन्द्रनाथ टेगौर, चक्रवर्ती राजगोपाला चारी, जवाहरलाल नेहरु, बाल गंगाधर तिलक, जमशेदजी टाटा, निकोला टेसला, एनी बेसेंट, रोमेन रोल्लेंड, नरेन्द्र मोदी और एना हजारे, आदि. महात्मा गाँधी के अनमोल वचन जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|

साहित्यिक कार्य [Literary Work] -:

बानहट्टी के अनुसार स्वामी विवेकानंद एक अच्छे चित्रकार [painter], लेखक और गायक थे अर्थात वे अपने आप में एक सम्पूर्ण कलाकार थे. उनके द्वारा लिखे गये निबंध रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन दोनों की ही मैगज़ीन में छपें. उनकी भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ [Command] थी, जिसके कारण उनके द्वारा दिए गये लेक्चर्स और भी अधिक प्रभावी और समझने में आसान होते थे.

उनके कुछ रचनाए, जो उनके जीवनकाल में ही प्रकाशित [Published in his Lifetime] हुई, उनका विवरण निम्नानुसार हैं -:

क्रमांक प्रकाशन का वर्ष रचना का नाम
1. 1887 संगीत कल्पतरु [वैष्णव चरण बसक के साथ]
2. 1896 कर्म योग
3. 1896 राज योग [न्यू यॉर्क में दिए गये भाषणों के दौरान कही गयी बातों का संकलन]
4. 1896 वेदांत फिलोसोफी
5. 1897 लेक्चर्स फ्रॉम कोलोंबो टू अल्मोड़ा
6. मार्च, 1899 बंगाली रचना – बर्तमान भारत [उद्बोधन में प्रकाशित]
7. 1901 माय मास्टर [न्यू यॉर्क की बेकर एंड टेलर कम्पनी द्वारा प्रकाशित]
8. 1902 वेदांत फिलोसोफी : जनाना योग पर लेक्चर्स

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के बाद प्रकाशित रचनायें [Books published by Swami Vivekananda] -:

क्रमांक प्रकाशन का वर्ष रचना का नाम
1. 1902 भक्ति योग पर भाषण
2. 1909 द ईस्ट एंड द वेस्ट
3. 1909 इंस्पायर्ड टॉक्स [Inspired Talks]
4. नारद भक्ति सूत्र [अनुवादित रचना]
5. परा भक्ति [Supreme Devotion]
6. प्रैक्टिकल वेदांत
7. स्वामी विवेकानंद के भाषण और लेखन कार्य
8. कम्पलीट वर्क्स – स्वामी विवेकानंद के सभी भाषण, रचनायें और प्रवचन [9 वॉल्यूम में उपलब्ध हैं]

स्वामी विवेकानंद का योगदान [Contribution of Swami Vivekanand] -:

अपने जीवनकाल में स्वामीजी ने जो भी कार्य किये और इसके द्वारा जो योगदान दिया, उसके क्षेत्र को हम निम्न 3 भागों में बाँट सकते हैं -:

  • वैश्विक संस्कृति के प्रति योगदान [Contribution to World Culture],
  • भारत के प्रति योगदान [Contribution to India],
  • हिंदुत्व के प्रति योगदान [Contribution to Hinduism].

इन क्षेत्रों में किये गये योगदान को निम्न संक्षिप्त विवरण द्वारा समझा जा सकता हैं -:

  • वैश्विक संस्कृति के प्रति योगदान [Contribution to World Culture] -:
  1. स्वामी विवेकानंद ने धर्म के प्रति नई और विस्तृत समझ विकसित की,
  2. उन्होंने सीख और आचरण के नये सिद्धांत स्थापित किये,
  • उन्होंने सभी लोगों के मन में प्रत्येक इन्सान के प्रति नया और विस्तृत नज़रिया रखने की प्रेरणा दी,
  1. उन्होंने पूर्व और पश्चिम के देशों के बीच जुड़ाव [Bridge] का कार्य किया.
  • भारत के प्रति योगदान [Contribution to India] -:
  1. उन्होंने भारत के साहित्य को अपनी रचनाओं द्वारा समृद्ध बनाया,
  2. उनके प्रयासों से सांस्कृतिक जुड़ाव उत्पन्न हुआ,
  • उन्होंने हमारी प्राचीन धार्मिक रचनाओं का सही अर्थ समझाया,
  1. भारतीय संस्कृति का महत्व समझाया और पश्चिमी सभ्यता के दुष्प्रभावों को भी वर्णित किया,
  2. देश में जातिवाद को ख़त्म करने के लिए उन्होंने निचली जातियों के कार्यों का महत्व समझाया और उन्हें समाज की मुख्य धारा [Main Stream] से जोड़ा.
  • हिंदुत्व के प्रति योगदान [Contribution to Hinduism] -:
  1. सम्पूर्ण विश्व के सामने हिंदुत्व की महानता और इसके सिद्धांत प्रतिपादित करके इसकी वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई.
  2. हिन्दुओं की विभिन्न जातियों के बीच होने वाले भेदभाव और मनमुटाव को काम करने का उल्लेखनीय प्रयास किया और इसमें बहुत कुछ सफल भी रहें.
  • क्रिस्चियन मिशनरी द्वारा हिंदुत्व के संबंध में फैलाई जा रही गलत धारणाओं को समाप्त किया और इसका सही अर्थ समझाया.
  1. प्राचीन धार्मिक परंपराओं और नवीन सोच का उचित समन्वय स्थापित किया.
  2. हिन्दू फिलोसोफी और हिन्दू धार्मिक सिद्धांतों को एक नवीन और स्पष्ट रूप दिया.

विवेकानंद मेमोरियल [Vivekanand Memorial] -:

अपने जीवनकाल के दौरान 24 दिसंबर, 1892 को स्वामी विवेकानंद कन्याकुमारी पहुंचे थे और समुद्र पर एक एकांत पहाड़ी पर जाकर ध्यान किया था, जो 3 दिनों तक चला था. यह पहाड़ी आज ‘विवेकानंद मेमोरियल’ के रूप में जानी जाती हैं और बहुत प्रसिद्ध दार्शनिक स्थल [Tourist Destination] बन चुकी हैं.

इस प्रकार स्वामी विवेकानंदजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन परोपकार में ही व्यतीत किया और हमारे विकास के लिए नवीन भारत का भी निर्माण किया.

स्वामी विवेकानंद अनमोल वचन ( Swami Vivekanand Quotes in hindi)

  Quotes In English: Quotes In Hindi
1 You cannot believe in God until you believe in yourself. जब तक तुम अपने आप में विश्वास नहीं करोगे, तब तक भगवान में विश्वास नहीं कर सकते |
2 We are what our thoughts have made us; so take care about what you think. Words are secondary. Thoughts live; they travel far. हम जो भी हैं हमारी सोच हमें बनाती हैं इसलिए सावधानी से सोचे | शब्द द्वितीय हैं पर सोच रहती हैं और दूर तक यात्रा करती हैं |
3 Arise! Awake! and stop not until the goal is reached. उठो जागों और तब तक मत रुको जब तक अपना लक्ष्य प्राप्त ना कर सको |
4 The more we come out and do good to others, the more our hearts will be purified, and God will be in them. हम जितना बाहर आते हैं और जितना दूसरों का भला करते हैं हमारा दिल उतना ही शुध्द होता हैं और उसमे उतना ही भगवान का निवास होगा |
5 When an idea exclusively occupies the mind, it is transformed into an actual physical or mental state. जब एक सोच दिमाग में आती हैं तो वह मानसिक और शारीरिक स्थिती में तब्दील हो जाती हैं | 
6 The world is the great gymnasium where we come to make ourselves strong. संसार एक बहुत बड़ी व्यायामशाला हैं जहाँ हम खुद को शक्तिशाली बनाने आते हैं |
7 Truth can be stated in a thousand different ways, yet each one can be true. सच हजारो तरीके से कहा जा सकता हैं तब भी उसका हर एक रूप सच ही हैं |
8 Never think there is anything impossible for the soul. It is the greatest heresy to think so. If there is sin, this is the only sin; to say that you are weak, or others are weak. ऐसा कभी नहीं सोचना चाहिए कि आत्मा के लिए कुछ भी असम्भव हैं | यह सोचना ही सबसे गलत हैं | अगर यह पाप हैं तो वही पाप हैं कि हम खुद को और दूसरों को कमजोर कह रहे हैं  |
9 All the powers in the universe are already ours. It is we who have put our hands before our eyes and cry that it is dark. ब्राह्मण की सारी शक्तियाँ हमारी हैं यह हम ही हैं जो अपनी आँखों के आगे हाथ रख लेते हैं और रोते हैं कि अंधकार हैं |
10 The moment I have realized God sitting in the temple of every human body, the moment I stand in reverence before every human being and see God in him – that moment I am free from bondage, everything that binds vanishes, and I am free. जिस वक्त मुझे यह महसूस हुआ कि भगवान शरीर रूपी मंदिर में रहते हैं | उस पल से मैं हर एक व्यक्ति के सामने खड़े हो कर उनकी पूजा करता हूँ उस पल से मैं सारी बंधिशों से मुक्त हो गया | सभी चीजे जो बांधती हैं वो खत्म हो गई और मैं स्वतंत्र हो गया |
11 God is to be worshiped as the one beloved, dearer than everything in this and next life. भगवान को अपने प्रिय की तरह पूजा जाना चाहिए यह पूजा आज के और अगले जीवन से बढ़कर होनी चाहिए |
12 External nature is only internal nature writ large. बाहरी स्वभाव आतंरिक स्वभाव का बड़ा रूप हैं |
13 As different streams having different sources all mingle their waters in the sea, so different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to God. जैसे अलग-अलग धाराएँ अलग-अलग जगह से आती हैं पर सभी एक सागर में मिल जाती हैं उसी तरह भिन्न- भिन्न विचारों के लोग भले सही हो या गलत सभी भगवान के पास जाते हैं.

Vini

विनी दीपावली वेबसाइट की लेखिका है, जिनको लिखने का शौक है, इसलिए वे दीपावली साईट के लिए कुछ विषयोंपर लिखती है|

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