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वत पूर्णिमा व वट सावित्री व्रत का महत्त्व व पूजा विधि

Vat purnima savitri vrat katha puja vidhi in hindi भारत देश में दो तरह के कैलेंडर होते है, इन्ही के हिसाब से तीज त्यौहार मनाये जाते है. अमानता व् पूर्णिमानता ये दो मुख्य कैलेंडर है, जिसे देशवासी फॉलो करते है. वैसे तो दोनों कैलेंडर एक ही जैसे होते है, लेकिन कुछ त्यौहार में तारीख का हेर फेर हो जाता है.  पूर्णिमानता कैलेंडर को उत्तरी भारत के प्रदेश मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब व् हरियाणा में फॉलो किया जाता है, वही अमानता कैलेंडर को बाकि के बचे हुए प्रदेश फॉलो करते है.

वत पूर्णिमा व वट सावित्री व्रत का महत्त्व व पूजा विधि

Vat purnima and vat savitri vrat katha puja vidhi in hindi

पूर्णिमानता कैलेंडर के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाया जाता है, वही अमानता कैलेंडर के अनुसार इसे ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को मनाते है, जिसे वट पूर्णिमा व्रत भी कहते है. महाराष्ट्र, गुजरात व् दक्षिण की सभी शादीशुदा महिलाएं इसे उत्तर में मनाये जाने के 15 दिन बाद मनाती है. हालाकिं व्रत के पीछे की पौराणिक कथा दोनों कैलेंडरों में एक जैसी है.

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वट सावित्री व्रत व् वट पूर्णिमा व्रत 2016 में कब है?( Vat savitri or Vat Purnima 2016 Date)

ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत होता है, जो इस बार 4 जून 2016 को पड़ रहा है. वहीँ ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत होता है, जो 19जून 2016 को है.

क्यों मनाई जाती है वट सावित्री?

कहा जाता है इस दिन सावित्री अपने पति सत्यभामा के प्राण यमराज के यहाँ से वापस ले आई थी. इसी के बाद से उन्हें सती सावित्री कहा जाने लगा. इस त्यौहार का महत्व हर विवाहिता के जीवन में होता है. पति की सुख समर्धि व् लम्बी आयु के लिए ये व्रत रखा जाता है. साथ ही माना जाता है कि इस व्रत से जीवन में आने दुःख दूर हो जाते है. इससे घर में, बच्चों के जीवन में सुख शांति रहती है, उनका विकास होता है.

वट सावित्री व वट पूर्णिमा व्रत महत्त्व (Vat savitri or Vat purnima Mahatv)

वट का मतलब बरगद का पेड़, यह एक विशाल पेड़ होता है, जिसमें जटाएं लटकती रहती है. सावित्री देवी का रूप मानी जाती है. हिन्दू पूरण में बरगद के पेड़ में ब्रम्हा, विष्णु व् महेश का रहवास माना जाता है. इस वृक्ष की जड़ में ब्रम्हा रहते है, बीच में विष्णु व् उपरी सामने के भाग में शिव होते है. इसलिए इस वृक्ष के नीचे बैठकर इसकी पूजा करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती है.

वट सावित्री व वट पूर्णिमा व्रत से जुड़ी कथा (Vat savitri or Vat purnima vrat katha) –

अश्वपति नाम का सच्चा, ईमानदार राजा हुआ करता था. उसके जीवन में सभी तरह का ऐशोआराम सुख शांति थी. बस एक ही कष्ट था, उसका कोई बच्चा नहीं था. वह एक बच्चा चाहता था, जिसके लिए उसे सबने कहा कि वो देवी सावित्री की आराधना करे, वो उसकी मनोकामना पूरी करेंगी. बच्चे की चाह में वह पुरे 18 वर्ष तक कठिन तपस्या करता रहा. उसके कठिन ताप को देख देवी सावित्री खुद उसके पास आई, और उसे एक बेटी का वरदान दिया, जिसका नाम सावित्री रखा गया. जब ये लड़की बड़ी हुई और युवावस्था में पहुंची तो खुद अपने लिए अच्छे जीवनसाथी तलाशने लगी. जिसके बाद उसे सत्यभामा मिले. लेकिन सत्यभामा की कुंडली के अनुसार उसका जीवन अधिक नहीं था, उसकी 1 साल में म्रत्यु लिखी थी.

सावित्री अपने पति सत्यभामा के साथ एक बार बरगद पेड़ के नीचे बैठी थी. सावित्री की गोद में सर रखकर सत्यभामा लेटे हुए थे,  तभी उनके प्राण लेने के लिए यमलोक के राजा यमराज अपने दूत को भेजते है. लेकिन सावित्री अपने प्रिय पति के प्राण देने से इंकार कर देती है. यमराज कई लोगो को भेजते है, लेकिन सावित्री किसी को भी अपने पति के प्राण नहीं देती है. तब खुद यमराज उसके पास जाते है, और सत्यभामा के प्राण मांगते है.

सावित्री के मना करने पर वे उसे इसके बदले में वरदान मांगने को कहते है. सावित्री अपने सास-ससुर की सुख शांति मांगती है, जो यमराज उसे दे देते है. लेकिन इसके बाद भी सावित्री अपने पति को नहीं छोडती, और साथ में जाने को बोलती है| जिसके बाद अपने माता पिता की सुख समर्धि मांगती है. यमराज वो भी मान जाते है, लेकिन सावित्री फिर भी उनके पीछे पीछे उनके आवास में जाने लगती है. तब यमराज आखरी इच्छा उससे पूछते है, तब वो उनसे एक बेटा मांगती है. यमराज ये भी मान जाते है. लेकिन सावित्री इस वरदान के द्वारा यमराज से चालाकी करती है. वो बोलती है, बिना पति के उसे बेटा कैसे मिल सकता है. यमराज कुछ नहीं बोल पाते, लेकिन सावित्री के सच्चे प्यार को वो समझ जाते है. यमराज सावित्री के प्रयास को देख खुश होते है, और सत्यभामा की आत्मा उसके शरीर में वापस भेज देते है. इसके साथ ही दुनिया इन्हें सती सावित्री के नाम ने जानने लगती है. और यहाँ से वट सावित्री का त्यौहार मनाया जाने लगा.

वट सावित्री मनाने का तरीका –

वट सावित्री व्रत का महत्त्व करवा चौत के समान ही होता है| वट सावित्री के व्रत में कई लोग 3 दिन का उपवास रखते है. 3 दिन बिना खाने के रहना मुश्किल है, इसलिए पहले दिन रात को खाना खा लेते है, दुसरे दिन फल फूल खा सकते है, व् तीसरे दिन पूरा दिन का व्रत रहते है. रात में पूजा के बाद ये व्रत पूरा होता है. महिलाएं दुल्हन की तरह अपना साज श्रंगार करती है.

वट सावित्री व वट पूर्णिमा व्रत पूजा विधि (Vat savitri or Vat purnima puja vidhi) –

कई लोग सिर्फ वट सावित्री वाले दिन उपवास रखती है, व् पूजा के बाद भोजन ग्रहण करती है. यह पूजा वट के वृक्ष के नीचे होती है. एक बांस की टोकरी लेते है, उसमें सात तरह का अनाज रखते है, जिसे कपड़े के 2 टुकड़े से ढक देते है. एक दुसरी बांस की टोकरी में देवी सावित्री की प्रतिमा रखते है, साथ में धुप, दीप, कुमकुम, अक्षत, मोली रखते है. अब वट वृक्ष में जल चढ़ाकर, कुमकुम, अक्षत चढाते है, साथ ही देवी सावित्री की पूजा करते है. फिर लाल मौली/सूत के धागे को लेकर वट ब्रक्ष के चारों ओर घूमकर बांधते है, ऐसा 7 बार करते है. उसके बाद सभी औरतें मिलकर सावित्री की कथा सुनती है. ये करने के बाद ब्राह्मण व जरुरत मंद को दान करते है. चना व् गुड़ का प्रसाद सबको दिया जाता है, व खुद भी खाया जाता है.

वट सावत्री व्रत व् वट पूर्णिमा व्रत का महत्त्व एक ही है, बस इसे कुछ दिन आगे पीछे मनाया जाता है.

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विभूति दीपावली वेबसाइट की एक अच्छी लेखिका है| जिनकी विशेष रूचि मनोरंजन, सेहत और सुन्दरता के बारे मे लिखने मे है| परन्तु साईट के लिए वे सभी विषयों मे लिखती है|
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