अंदल जयंती व आदि पुरम महत्त्व | Aadi Pooram Festival or Andal Jayanthi Significance in hindi

अंदल जयंती व आदि पुरम महत्त्व (Aadi Pooram Festival or Andal Jayanthi Significance in hindi)

अंदल जयंती ‘देवी अंदल’ को समर्पित की गयी हैं. ऐसा माना जाता हैं कि देवी अंदल धन की देवी लक्ष्मीजी  का अवतार थी. यह जयंती या त्यौहार देवी अंदल के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में मनाया जाता हैं. यह तमिल माह ‘आदि’ में मनाया जाता हैं, यहीं कारण हैं कि इसे आदि पूरम भी कहा जाता हैं.

अंदल जयंती/ आदि पुरम कब मनाई जाती है? (Aadi Pooram Date 2020 )

इस वर्ष आदि पूरम की तारीख 24 July 2020 को है. आदि पूरम देवी शक्ति को भी समर्पित हैं और ऐसी मान्यता हैं कि इस दिन देवी शक्ति धरती पर आती हैं और अपने भक्तों को आशिर्वाद प्रदान करती हैं. हिन्दू नक्षत्रों के अनुसार कुल 27 नक्षत्रों में से ‘पूरम’ भी एक नक्षत्र हैं.

देवी अंदल की कथा सम्पूर्ण तमिलनाडु क्षेत्र में विख्यात हैं. देवी अंदल श्री रंगनाथ [भगवान विष्णु] के प्रति अपने अटल और स्थिर भक्ति के लिए ख्याति प्राप्त हैं.

Aadi Pooram Andal Jayanthi Festival

अंदल जयंती / आदि पूरम  संक्षिप्त विवरण [Details in brief of Andal Jayanti or Aadi Pooram] -:

त्यौहार का नाम अंदल जयंती या आदि पूरम
इस वर्ष त्यौहार की तारीख 24 July 2020
उपलक्ष्य / कारण [Reason of Celebration] देवी अंदल के जन्म और विवाह के उपलक्ष्य में.
मान्यता [Belief] देवी अंदल देवी लक्ष्मीजी का अवतार थी.
विवाह [Marriage] भगवान रंगनाथ [भगवान विष्णु] के साथ.
महोत्सव [Festival] भगवान रंगनाथ के सभी मंदिरों में कुल 10 दिनों तक मनाया जाता हैं.

देवी अंदल का परिचय  [Introduction of Goddess Andal] -:

देवी अंदल का जन्म 10वीं सदी में दक्षिणी भारत के तमिलनाडु क्षेत्र में हुआ था. देवी अंदल भगवन विष्णु की प्रबल भक्त थी और उनकी भगवान विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति ने ही उन्हें लोगों के बीच देवी का दर्जा दिला दिया.

देवी अंदल द्वारा रची गयी धार्मिक रचनायें [Goddess Andal’s Religious Compositions] -:

उनके द्वारा लिखी गयी कविताओं में भी भगवान विष्णु के प्रति भक्ति ही दिखाई देती हैं. उनके द्वारा रची गयी कुछ धार्मिक रचनायें, जैसे -: थिरुप्पवाई और नाच्सियर तिरुमोली, आदि. थिरुप्पवाई कुल 30 छंदों और नाच्सियर तिरुमोली कुल 143 छंदों की धार्मिक रचना हैं, जिसमें भी उन्होंने भगवान विष्णु के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित की हैं.

देवी अंदल और भगवान रंगनाथ [भगवान विष्णु] की पौराणिक कथा [Andal devi and lord Vishnu story] -:

देवी अंदल ने 15 वर्ष की छोटी सी आयु में ही भगवान रंगनाथ के प्रति अपनी ललक प्रकट कर दी थी. उन्होंने भगवान रंगनाथ के अलावा किसी और से विवाह करने से भी इंकार कर दिया था. प्राचीन कथा के अनुसार कुछ लोग देवी अंदल के पिता के पास गये और उनसे कहा कि उन्हें भगवान रंगनाथ सपने में आए थे और उन्होंने आपकी बेटी अंदल को दुल्हन बनाकर, उनके मंदिर ‘श्रीरंगम’ में लाने को कहा हैं. श्रीरंगम नामक मंदिर तमिलनाडु में, वैष्णव भगवान रंगनाथ का बहुत ही सौभाग्यशाली मंदिर हैं. दूसरी ओर भगवान रंगनाथ ने श्रीरंगम मंदिर के पुजारियों को सपने में दर्शन देकर देवी अंदल के स्वागत के लिए इन्तेजाम करने की बात कही. इन सभी घटनाओं के बाद जब देवी अंदल एक दुल्हन के रूप में श्रीरंगम मंदिर में पहुंची, तो वे एक प्रकाश  रूप में परिवर्तित हो गयी और भगवान विष्णु के अन्दर विलीन हो गयी. इस घटना के घटित होने पर वहाँ गाँव में देवी अंदल और भगवान रंगनाथ का एक मंदिर ‘श्रीविल्लिपुत्तुर’ बनाया गया हैं.

आदि पूरम या अंदल जयंती पर किये जाने वाले रीति रिवाज़ [Aadi Pooram significance] -:

आदि पूरम 10 दिनों तक चलने वाला त्यौहार हैं, जो तमिलनाडु में हर उस मंदिर में बड़ी ही धूमधाम और शान से मनाया जाता हैं, जो कि भगवान विष्णु का मंदिर हैं. इस 10 दिन तक चलने वाले उत्सव के अंतिम दिन को आदि पूरम कहा जाता हैं और इसी दिन भगवान रंगनाथस्वामी और देवी अंदल के विवाह की रस्में भी पूरी की जाती हैं. इस शादी को ‘थिरुकल्यानाम’ भी कहते हैं.

घर में आदि पूरम पूजा की विधि (Aadi pooram pooja at home)

  • आदि पूरम के दिन घर की औरतें जल्दी उठकर विवाह की तैयारियां करती हैं.
  • उनके द्वारा अपने घर को कोलम से सजाया जाता हैं.
  • मान्यताओं के अनुसार देवी अंदल को कमल का फूल, लाल रंग और कल्कंदु चावल बहुत पसंद हैं, तो उन्हें ये सब चढ़ाने के लिए इसकी तैयारियां की जाती हैं.
  • मंदिरों में देवी अंदल को सिल्क की साड़ी, गहनों और फूलों की माला से सजाया जाता हैं.
  • इसके साथ ही हर घर से आये पकवानों को प्रसाद स्वरुप देवी अंदल को समर्पित किया जाता हैं.
  • चूँकि यह उत्सव देवी अंदल और भगवान रंगनाथ के विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाता हैं तो इसे देखने के लिए अनेक श्रद्धालु मंदिर में आते हैं और इन रिवाजों को पूरा करते हुए देखते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं.
  • अपनी – अपनी प्रथा के अनुसार इस दिन कुछ विशेष रीति रिवाज भी पूरे किये जाते हैं और इसी के साथ पारंपरिक संगीत  भी बजाया जाता हैं.
  • यह महोत्सव देर रात तक चलता रहता हैं और फिर ‘आरती’ गाई जाती हैं और अंत में प्रसाद वितरण होता हैं.
  • इस पावन दिन पर भक्त गण  ‘थिरुप्पवाई’ और ‘ललिता सहस्रानामम’ का भी पाठ करते हैं.

आदि पुरम मनाने का तरीका (Aadi pooram celebration) –

आदि पूरम का यह त्यौहार देवी अंदल के मंदिर ‘श्रीवाल्लिपुत्तुर’ में बहुत बड़े स्तर पर बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता हैं. यह महोत्सव ‘श्रीरंगम श्री रंगनाथ मंदिर’ में भी व्यापक पैमाने पर 10 दिनों तक बड़ी ही शान शौकत से मनाया जाता हैं. यहाँ पर भी देवी अंदल और भगवान रंगनाथ के विवाह का उत्सव बड़ी श्रद्धा से मनाते हैं. यहाँ की बड़ी ही प्रबल मान्यता हैं कि इस उत्सव के अंतिम दिन अर्थात् आदि पूरम को जो अविवाहित कन्याए देवी अंदल की पूजा करती हैं, उनका विवाह शीघ्र ही हो जाता हैं. इसके साथ ही अगर यह आदि पूरम का त्यौहार शुक्रवार [Friday] को आए, तो यह दिन और भी पवित्र माना जाता हैं और फिर यह और भी धूमधाम से मनाया जाता हैं और साथ ही अन्य कई अतिरिक्त रीति रिवाज भी पूर्ण किये जाते हैं.

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