असम समझौता 1985 के बारे में विस्तार से जानें

1985 असम समझौता क्या है? कब हुआ (What is Assam Accord 1985 in hindi ?, Clause, Significance) (Inner Line Permit System in hindi, ILP)

भारत सरकार ने हाल के कुछ महीनों में कई सारे बड़े विधेयक बनाएं और हमारे भारत देश का इतिहास के साथ – साथ भूगोल भी बदल गया. अभी हालही में भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक बनाया हैं जिसे लोकसभा एवं राज्य सभा दोनों ही सदनों में पास कर दिया गया हैं. लेकिन इस विधेयक के आने से असम के लोगों द्वारा काफी विरोध किया जा रहा हैं. उनका कहना हैं कि इस विधेयक के आने से असम समझौता जोकि सन 1985 में किया गया था उसका उलंघन हो रहा है. अब आपको हम इस लेख के माध्यम से असम समझौता असल में हैं क्या इस जानकारी से अवगत कराते हैं.

What is Assam Accord

असम समझौता 1985 क्या है ? (What is Assam Accord ?)

असम में सन 1985 में भारत सरकार और ऑल इंडिया असम छात्र संघ एवं असम गण  संग्राम परिषद ने मिलकर एक समझौते पर साइन किया थे. जब हमारा देश आजाद हुआ था, उसके बाद असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या धीरे – धीरे करके बहुत अधिक होती जा रही थी जिसके कारण वहां के मूल निवासियों को काफी परेशानी होने थी. और इसके चलते उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया. इस विरोध प्रदर्शन ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया जोकि असम में रह रहे अवैध शरणाथियों के खिलाफ था. इस आंदोलन में सबसे आगे असम छात्र संघ एवं असम गण संग्राम परिषद था. यह विरोध प्रदर्शन 6 साल तक चला. इसी विरोध प्रदर्शन को खत्म करते हुए भारत सरकार और ऑल इंडिया असम छात्र संघ एवं असम गण संग्राम परिषद ने मिलकर इस समझौते पर साइन किये. वह समझौता यह था कि –

  • असम में ऐसे बांग्लादेशी शरणार्थी जोकि सन 1971 से पहले से यहाँ रह रहे हैं उन्हें यहाँ रहने का पूरा हक होगा. जबकि अन्य राज्यों में यह सन 1951 से पहले आये लोगों के लिए है.
  • लेकिन असम में इसके लिए एक शर्त यह भी रखी गई कि जो लोग सन 1951 से सन 1961 के बीच में यहां आकार बसे हैं उन्हें भारत के अन्य निवासियों की तरह सभी चीजों का अधिकार होगा. लेकिन जो लोग सन 1961 से सन 1971 के बीच में यहाँ आकर बसे हैं, उन्हें नागरिकता के बाकी सारे अधिकार तो दिये जायेंगे, लेकिन उन्हें आने वाले 10 साल तक मतदान करने से वंचित रखा जायेगा.
  • जबकि सन 1971 के बाद के शरणार्थी को जोकि यहाँ आकर बस गए हैं, उन्हें यहाँ के कानून के तहत निर्वासित कर दिया जायेगा. यह समझौता सन 1985 में स्वतंत्रता दिवस के दिन उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी द्वारा किया गया था. 

असम समझौते से पहले हुए विरोध प्रदर्शन की शुरुआत (Protests Started Before Assam Accord)

असम समझौता होने से पहले असम में रहने वाले बाहरी निवासियों एवं असम में रहने वाले मूल निवासियों और उनके लीडर संघ यानि असम छात्र संघ एवं असम गण संग्राम परिषद द्वारा जो विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था, उसकी चिंगारी सन 1979 में हुए उपचुनाव के बाद से भड़क गई. जब उस चुनाव में राज्य की मंगलदोई सीट पर वोटर्स की संख्या अचानक से सामान्य से बहुत अधिक बढ़ गई. इसकी जब पूरी तरह से जाँच की गई तब पता चला कि यह बांग्लादेशी शरणार्थियों की वजह से बढ़ी हुई है. जब यह बात सामने आई तो वहां के मूल निवासियों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ, और उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया. धीरे – धीरे यह मामला काफी गर्म होने लगा और इस विरोध प्रदर्शन ने आंदोलन का रूप ले लिया. जोकि पूरे राज्य में बांग्लादेशी शरणार्थियों के खिलाफ शुरू हो चूका था.

यह विरोध प्रदर्शन ऐसा था कि एक के बाद एक कई सारी हिंसक घटनाएँ यहाँ होने लगी. जिसमें लगभाग 800 से 1000 बांग्लादेशी शरणार्थियों को मार दिया गया था. उस दौरान पूरे राज्य में निरंतर एक के बाद एक हमले होते चले गए, कई सारे आंदोलन भी हुए, इसके अलावा राजनीतिक अस्थिरता, राज्य सरकारों की हार और यहां तक कि राष्ट्रपति शासन तक राज्य में लागू करना पड़ा था. इस विरोध प्रदर्शन एवं आंदोलन से मानो वहां के रहने वाले लोगों का पूरा जीवन अस्त – व्यस्त हो गया था. 6 साल तक यह हिंसक वातावरण होने के बाद भारत सरकार और असम के छात्र संघ एवं असम गण संग्राम परिषद ने मिलकर समझौते पर हस्ताक्षर किये और तब जाकर यह मामला शांत हुआ.     

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असम में विरोध प्रदर्शन का कारण क्या था ? (What was the Reason for the Protests in Assam ?)

असम में सन 1979 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन का कारण आप निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझें –

  • सन 1971 में पाकिस्तानी सेना और बांग्लादेश के बीच हिंसक घटनायें होना प्रारंभ हुई. जिसके चलते बड़ी संख्या में बांग्लादेशी भारत में शरण लेने लगे. यह संख्या 10 लाख के पार पहुंच गई थी. और ये सभी अवैध तरीके से यहाँ रह रहे थे.
  • असम में बांग्लादेशी शरणार्थियों की अचानक से जनसंख्या में वृद्धि होने से वहां के मूल निवासियों को यह लगने लगा कि उनकी संख्या ज्यादा होने से यह उनकी संस्कृति, भाषाएँ एवं राजनीतिक व्यवस्था सब कुछ पर कब्जा कर लेंगे. इसके चलते वे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे है.
  • इसके अलावा उन्हें यह भी लग रहा था कि बांग्लादेश से आने वाले हिन्दूओं को जब यहाँ की नागरिकता हासिल हो जायेगी, तो वे वहां के मूल निवासियों के अधिकारों को चैलेंज करते हुए खुद का अधिकार उन पर भी स्थापित करने लगेंगे.

इस वजह से असम के रहने वाले मूल निवासी बांग्लादेशी शरणार्थियों की घुसपैठ के विरोध में थे. और फिर असम समझौता करने पड़ा.

एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स) मुद्दा क्या है ? (What is NRC (National Register of Citizens) Issue ?)

एनआरसी यानि कि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स एक ऐसा रजिस्टर हैं, जहाँ सभी भारतीय नागरिकों की जानकारी दी हुई होती है. लेकिन इसे पूरे भारत में यानि कि सभी राज्यों के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि यह सिर्फ असम के लिए था. जिसमें सन 1971 से पहले असम में रह रहे सभी लोगों की जानकारी शामिल थी. यह वहां के नागरिक की पहचान करने के लिए बनाया गया था. इस पर भारत सरकार और असम सरकार मिलकर कार्य करती थी. इसके लागू होने के बाद इसे कई बार अपडेट करने का कार्य किया गया लेकिन यह हो नहीं पाया. और नतीजा यह निकला कि अगले 35 साल तक इस पर कोई भी अपडेशन का कार्य नहीं किया गया.

इसके बाद इस पर सन अगस्त, 2019 में फिर से काम शुरू किया गया और इसमें लगभग 19 लाख लोगों के नाम शोर्ट लिस्ट कर दिए गये. शोर्ट लिस्ट किये गये नामों में अधिकतर हिन्दू और मूल निवासी आदिवासी नागरिक थे. अब असम के विरोध करने वाले लोगों का कहना हैं कि नागरिकता संशोधन बिल के आने के बाद एनआरसी पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगी. और अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेश शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी.

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नागरिक संशोधन विधेयक 2019 का असम में विरोध (Citizenship Amendment Act Assam Protest)

असम में नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 के आने से सन 1979 से सन 1985 के बीच हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन फिर से एक बार बड़ी खबरों में आ गया. दरअसल हमारे देश की तत्कालिक केंद्र सरकार का नागरिकता संशोधन विधेयक को लाने का उद्देश्य यह था कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यक जोकि हिन्दू, जैन, इसाई, बौद्ध, पारसी और सिख धर्म के लोग हैं, उन्हें भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी. और साथ ही गैर कानूनी तरीके से रह रहे लोगों की पहचान कर उन्हें यहाँ से निष्काषित किया जायेगा. इसके लिए एक समय सीमा भी निर्धारित की हैं कि जो लोग सन 2014 से पहले भारत आये हैं उन्हें यहाँ की नागरिकता प्रदान की जाएगी. और जो बाद में आने वाले हैं उन्हें यहाँ से निकाल दिया जायेगा.   

लेकिन इसके पीछे असम के लोगों का कहना हैं कि इस बिल के आने से सन 1985 में जो असम समझौता हुआ था उसका उल्लंघन हो रहा है. उनका यह कहना है कि इस बिल के अनुसार  सन 1971 के बाद आये बांग्लादेशी शरणार्थियों को अब भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी. यानि कि जिन लोगों के नाम एनआरसी प्रक्रिया से शोर्ट लिस्ट किये गये थे वह सब ख़ारिज हो जायेगा. और यह सब कुछ असम समझौते के खिलाफ हैं. इससे बांग्लादेश से आये गैर मुस्लिम लोग बड़ी संख्या में असम में बस जायेंगे. और वहां के मूल निवासियों का अधिकार उनसे छिनने लगेगा. इसी डर के कारण असम में वहां के मूल निवासियों द्वारा विरोध प्रदर्शन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. दूसरी ओर बांग्लादेशी शरणार्थी जोकि मुस्लिम हैं और गैर – कानूनी रूप से यहाँ रह रहे हैं, उन्हें अब भारत छोड़कर जाना होगा. इस वजह से वे लोग भी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

इन्हीं सब मुद्दों के चलते असम में हिंसक घटनाएँ हो रही हैं, और यह सभी जगह सुर्खियों पर छाया हुआ है.

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इनर लाइन परमिट (आईएलपी) सिस्टम क्या है ? (What is Inner Line Permit System ?)

इनर लाइन परमिट एक ऐसा दस्तावेज हैं जिसे भारत सरकार द्वारा देश के कुछ राज्यों मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बनाया गया हैं. लेकिन यह पूर्वोत्तर के केवल नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश राज्य में लागू हैं, हालांकि इसे पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में लागू करने की मांग शुरू से ही की जाती रही है. इसे सन 1873 में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान बंगाल – ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्यूलेशन एक्ट के तहत सुरक्षा के उपायों और स्थानीय जातीय समूहों के लिए बनाया गया था. अर्थात इसके तहत किसी अन्य क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति यदि इन राज्यों में जाता हैं, तो उन्हें कुछ निर्धारित समय सीमा के लिए ही यात्रा करने की अनुमति होगी. वे यहाँ जाकर बस नहीं सकते हैं.

इसे दूसरे शब्दों में कहें तो यदि कोई व्यक्ति भारत का ही रहने वाला क्यों ना हो, वह पर्यटन या फिर किसी बिज़नस पर्पस से इनर लाइन परमिट वाले राज्यों में प्रवेश करता हैं, तो उन्हें इस दस्तावेज के माध्यम से ही इन राज्यों में जाने की कुछ निर्धारित समय सीमा के लिए अनुमति मिलेगी. ऐसा इसलिए किया गया ताकि इन राज्यों में रहने वाले लोगों की संस्कृति एवं भाषा की रक्षा हो सके. क्योकि यदि इन राज्यों में दूसरे राज्य या बाहर के लोग आकर बस जायेंगे, तो यहाँ की स्थानीय जनसँख्या कम हो जाएगी और बाहरी लोगों की संख्या ज्यादा हो जाएगी. इससे इन राज्यों में वे अपने कल्चर को ले आएंगे और स्थानीय कल्चर धीरे – धीरे समाप्त हो जायेगा. इस वजह से ही इस एक्ट को बनाया गया.

हाल के नागरिकता संशोधन विधेयक के आने के बाद इस इनर लाइन परमिट सिस्टम को पूर्वोत्तर के सभी राज्यों जैसे असम, मेघालय एवं त्रिपुरा में लागू करने की मांग बहुत जोरों से की जा रही है. हालांकि इस पर भारत सरकार द्वारा कुछ न कुछ बदलाव किये जाते रहे हैं. इस बिल को पेश करने के साथ ही मणिपुर में आईएलपी को लागू करने की भी घोषणा की गई थी.

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असम समझौते के बाद असम में काफी साल तक शांति का मौहाल रहा था. किन्तु अब इस नागरिकता संशोधन बिल के आने से असम में शांति भंग हो गई. यहाँ सन 1970 – 80 के दशक में हुए विरोध की तरह आग फिर से भड़क गई है. और यहाँ बड़े ही आक्रमक रूप में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा हैं. अब आने वाले समय में यह विरोध कौन सा मोड़ लेगा, यह सवाल लोगों के मन में उठ रहा हैं. और इस बिल के आने से देश में क्या बदलाव होगा यह बात भी काफी दिलचस्प होगी. 

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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