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भारत में बैंकिंग प्रणाली का इतिहास व प्रकार | Banking System Type and history in India in hindi

भारत में बैंकिंग प्रणाली का इतिहास व प्रकार ( Banking System Type and history in India in hindi)

बैंक आज हमारी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह इतने महत्वपूर्ण हो चुके हैं कि इनके बिना हम अपने फाइनेंशियल मैनेजमेंट की कल्पना तक नहीं कर सकते हैं. रोज आधुनिक और नई तकनीक ला रहे हमारे देश के बैंकों का इतिहास भी कम रोचक नहीं है. बैंकों की सामान्य परिभाषा से देखा जाए तो ऋग्वैदिक काल से ही मुद्रा को सहेजने वाली एजेंसियों और उन पर ब्याज देने वाली संस्थाओं का अस्तित्व रहा है. भारत में बैंकिंग के मूल को पुरातन महाजन परम्परा से भी जोड़ कर देखा जा सकता है जो लोगों को जरूरत के समय पैसे उधार देते थे और लोगों के धन को विदेश जाने और आने के दौरान हवाला के जरिये उन तक पहुंचाते थे और इसके बदले कुछ रकम वसूल करते थे. मिस्र और ऐसी ही दूसरी पुरातन सभ्यताओं के साथ व्यापारिक लेन—देन के दौरान भी ऐसी ही संस्थाओं का जिक्र मिलता है लेकिन उनपर ज्यादा शोध और संदर्भ सामग्री उपलब्ध नहीं है. आधुनिक बैंकिंग जिसे आज हम उपयोग कर रहे है, इसका वर्तमान स्वरूप मूल रूप से यूरोपियन्स की ही देन है और आज भी इस प्रणाली में ज्यादातर नये प्रयोग उन्हीं के द्वारा हो रहे हैं.

History-Of-Banking-In-India

 भारत में बैंकिंग का इतिहास

Banking System history in India in hindi

प्राचीन भारत में बैंकिंग प्रणाली व बैंकिंग का इतिहास (Banking system in ancient India or History)

  • प्राचीन भारत में जब सभ्यता अपने पूर शिखर पर थी, यहां चारों तरफ ऐश्वर्य और पैसे का बोलबाला था. ऐसे में पैसे के प्रबंधन के लिए बैंक जैसी संस्था की जरूरत पड़ी.
  • वेदों में कुसीदिन नाम के पद का उल्लेख मिलता है जो उस दौर में पैसों का प्रबंधन किया करता था. इसका उल्लेख सूत्रों और जातकों तक में मिलता है.
  • इससे समझ में यह आता है कि धन का यह प्रबंधक 2000 ईसा पूर्व से लेकर 400 ईसा पूर्व तक लगभग 1600 सालों तक लोगों के बीच लेन—देन का प्रमुख स्रोत बना रहा.
  • इसी बीच इन्हीं स्रोतों में इस संस्था के अवसान या बुराइयों का उल्लेख भी मिलने लगा था जिससे इस बात का पता चलता है कि समय के साथ इनकी विश्वसनीयता प्रभावित हुई और कालान्तर में यह समाप्त हो गए.
  • जातकों में सूद पर उधार देने का उल्लेख भी सामने आता है, उधार दिए जाने के लिए किए जाने वाले करार को यहां ऋण पत्र या ऋण पन्ने की तरह उल्लेखित किया गया है.
  • कौटिल्य अपनी किताब अर्थशास्त्र में भी इन ऋण पत्रों का उल्लेख करते हैं, वे इसे ऋण आलेख कह कर संबोधित करते हैं.
  • मौर्य काल आते—आते राज्य सत्ता बैंकिंग का काम करने लगती है, इसके प्रमाण सामने आते है. उल्लेख मिलता है कि राज्य आदेश पत्र के माध्यम से व्यापारियों को पैसा चुकाने के वादा पत्र दिया करता था.
  • यह प्रथा बाद में व्यापारियों ने भी अपना ली और 185 ईसा पूर्व आते—आते ऐसे वादापत्र आम प्रचलन में आ गए.

भारत में मध्यकाल के दौरान बैंकिंग का स्वरूप (Banking system in medieval India)

  • मौर्य काल में जो ऋण पत्र प्रचलन में आए वे मध्यकाल में खासकर मुगल काल तक यूं ही प्रचलन में रहे और खूब उपयोग में लाए जाते रहे.
  • मुगलकालीन दस्तावेजों में दो तरह के ऋणपत्रों का उल्लेख मिलता है, दस्तावेज ए इन्दुतलाब को मांग पर जारी किया जाता था जबकि दस्तावेज ए मियादी एक खास समय के बाद ही कैश किया जा सकता था, यह उस दौर के फिक्स डिपॉजिट जैसा था.
  • ये दस्तावेज शाही खजाने से ही जारी किए जाते थे लेकिन इसके समानान्तर एक और व्यवस्था ने जन्म ले लिया था जिसे महाजनी भी कहा जाता था.
  • इसमें एक व्यक्ति पैसों को उधार देकर मनमाना सूद वसूलता था. इसी दौर में व्यापारियों ने विदेशी व्यापार के लिए पहली बार हुंडी का इस्तेमाल करना शुरू किया जो एक तरह का क्रेडिट कार्ड का प्राचीन रूप कहा जा सकता है.

भारत में आधुनिक बैंकिंग की शुरूआत (Modern banking system in India)

  • भारत में आधुनिक बैंकिंग की शुरूआत इस देश में औपनिवेशिक काल के शुरूआत के साथ ही माना जा सकता है, जब आज से लगभग 200 साल पहले डच, अंग्रेज और फ्रांसिसी व्यापार के उद्देश्य से भारत आए.
  • इनमें से अंग्रेजों को ही यहां पांव जमाने का अवसर मिला. व्यापार के साथ उन्हें अपनी आय और मुद्रा के प्रबंधन के लिए बैंक की जरूरत पड़ी और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहले पहल 3 बैंकों की नींव भारत में रखी.
  • चुंकि सबसे पहले अंग्रेजों का प्रभाव बंगाल में ही बढ़ा इसलिए पहला बैंक बंगाल में ही 1809 बैंक आॅफ बंगाल के नाम से खोला.
  • इसके बाद उन्होंने अपने दूसरे प्रभाव वाले क्षेत्रों बॉम्बे और मद्रास प्रसीडेंसी में 1840 में बैंक आॅफ बॉम्बे और 1843 में बैंक आॅफ मद्रास की शुरूआत की. 1857 की क्रांति के बाद जब भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त कर दिया गया और शासन सीधे ब्रिटेन की महारानी के तहत आ गया तो इन तीन बैंकों का आपस में ​विलय करके इन्हें नया नाम इंपीरियल बैंक दे दिया गया.
  • यह इंपीरियल बैंक ही आजादी के बाद भारत का प्रमुख बैंक बना जिसे 1955 में नाम परिवर्तित करके भारतीय स्टेट बैंक कर दिया गया. भारत का यह सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक था.

आजादी के बाद भारत में बैंकिंग (Banking in India after independence)

  • देश के तौर पर बैंकिंग संस्थाओं को रेगुलेट करने और सरकारी मुद्रा के प्रबंधन के लिए भी भारत सरकार को एक संस्था की जरूरत महसूस हुई तो 1949 में भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और आजादी के बाद भी केन्द्रिय बैंक के तौर पर इसकी भूमिका को यथावत रखा गया.
  • रिजर्व बैंक को भारत में बैंकिंग को रेगुलेट करने के सभी अधिकार भी दे दिए गए. इसके बाद भारत के बैंकिंग क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन तब आया जब भारत सरकार ने 1959 में भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम के माध्यम से देश के आठ क्षेत्रीय बैंकों का राष्ट्रीय करण कर दिया और इन्हें भारतीय स्टेट बैंक का अनुषंगी बना दिया.
  • इसमें स्टेट बैंक आॅफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक आॅफ त्रावणकोर, स्टेट बैंक आॅफ हैदराबाद, स्टेट बैंक आॅफ इंदौर, स्टेट बैंक आॅफ मैसूर, स्टेट बैंक आॅफ इन्दौर और स्टेट बैंक आॅफ पटियाला प्रमुख हैं.
  • इस सफल राष्ट्रीयकरण से प्रेरित होकर भारत सरकार ने इसी तरह का एक बड़ा कदम 19 जुलाई 1969 को उठाया और देश के प्रमुख चौदह बैंकों का राष्ट्रीय करण कर दिया.
  • यह पहले से भी बड़ा कदम था इससे भारतीय बैंकों की​विश्वसनियता में इजाफा हुआ और भारतीय बैंकिंग प्रणाली मजबूत हुई.
  • इसके बाद लंबे समय के बाद 15 अप्रेल 1980 को छह निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया.
  • भारतीय बैंकिंग क्षेत्र ने 1993 में उस वक्त एक बड़ी छलांग लगाई जब भाारतीय रिजर्व बैंक ने घरेलू बैंकों को बैंकिंग गतिविधियां करने की अनुमति दे दी और प्राइवेट क्षेत्र के बैंक भी अब सार्वजनिक बैंकों की तरह भारतीय जनता को अपनी सेवाएं देने लगे.

कितनी तरह की बैंकिंग से चलती है दुनिया की अर्थव्यवस्था?

आपको अगर एक बैंक के बारे में बताने को कहा जाए तो आपका यही ख्याल होगा न, एक ऐसी जगह जहां आप अपने पैसे को सुरक्षित रखते है और वित्तीय लेन—देन करते हैं. लेकिन यहां आप सही तो है लेकिन बहुत सीमित हैं. जी हां जनाब इस आम लेन—देन से अलग पूरी दुनिया में बैंकिंग के तौर पर और भी बहुत कुछ होता है. बैंकिंग के काम भी अलग होते हैं और वे उनकी सेवा देने का माध्यम भी बहुत अलग होता है. इनमें से कुछ बैंक का नाम तक भी आपने नहीं सुना होगा. यहां उनमें से कुछ के बारे में बताया जा रहा है, ताकि आपको पता चले की दुनिया की अर्थव्यवस्था में हमारे बैंक कितना महत्वपूर्ण रोल अदा करते हैं.

भारत में बैंकिंग के प्रकार  (Types of Banking System in India)

वैसे तो बैंकिंग के किस्मों की बात करते हुए एक बात साफ कर देनी चाहिए, कि इनके काम में इतना ज्यादा फर्क नहीं है कि आप इनके बीच अंतर की एक मोटी लाइन खींच पाएं. बल्कि बहुत महीन अंतर की वजह से इनके काम करने का तरीका बदल जाता है और ये अलग—अलग तरह के क्लाइंट्स को अपनी सेवाएं देती हैं.

रिटेल बैंक (Retail banking)

  • यह वे बैंक है जिनके बारे में हम सभी जानते हैं और यह दुनिया की आबादी के सबसे बड़े हिस्से को अपनी सेवाएं देते हैं.
  • यह बैंक आम आदमी के लिए काम करते हैं और उनके पैसों का प्रबंधन करते हैं.
  • कोई भी व्यक्ति कुछ कागजी खानापूर्ति के बाद यहां अपना बचत या चालू खाता खोल सकता है.
  • यह बैंक अपने ग्राहक को बचत पर ब्याज देता है और जरूरत पड़ने पर दिए जाने वाले उधार पर ब्याज वसूलता है.
  • यह बैंक अपने ग्राहकों को सुविधा के नाम पर डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और चेक जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाता है.
  • इस तरह के बैंक का व्यापारिक ढांचा मूल रूप से कम ब्याज पर पैसे लेकर ज्यादा ब्याज पर उपलब्ध करवाने वाले बिजनेस मॉडल पर काम करता है.

वाणि​ज्यिक बैंक (Commercial banking)

  • जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है यह बैंक मूल रूप से वाणिज्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए काम करता है.
  • इसके ग्राहक सिर्फ व्यापारी या बिजनेसमैन होते हैं जो यहां अकाउंट ओपन करवाते हैं.
  • इस तरह के कस्टमर्स को अपने व्यापार के अनुरूप लेन—देन के लिए अलग तरह की सेवाओं और बैंक गारंटी की जरूरत होती है, जो इस तरह के बैंक उपलब्ध करवाते हैं.
  • इस तरह के बैंक बड़ी राशियों के लेन—देन का प्रबंधन करते हैं और उन्हें मैनेज भी करते हैं.

इन्वेस्टमेंट बैंक (Investment banking)

  • इन्वेस्टमेंट बैंक्स अपनी फाइनेंशियल विशेषज्ञता के लिए जाने जाते हैं और इसी वजह से व्यवसायी इनकी सेवाएं लेते हैं.
  • अगर कोई बिजनेस मैन अपनी कंपनी को शेयर बाजार में लिस्टेड करना चाहता है या​ फिर अपनी कंपनी के लिए कोई इन्वेस्टर खोजना चाहता है, तो ऐसे बैंक उसकी सहायता करते हैं.
  • ये बैंक अपने ग्राहकों को निवेश दिलवाते हैं और कई बार उनको दिलवाये गए निवेश की गारंटी भी लेते हैं.
  • इस तरह के बैंक अपने ग्राहक के बिजनेस की रेटिंग करने के साथ ही उसे और बेहतर बनाने के सुझाव भी देते हैं.

सेंट्रल बैंक्स (Central banking)

  • सेंट्रल बैंक्स पूरी दुनिया की मुद्रा प्रणाली को संभालने वाले प्रमुख निकाय है.
  • दरसअल दुनिया का हरेक देश अपनी मुद्रा को संभालने के लिए ऐसी संस्था का निर्माण करता है, जो उसकी मुद्रा के चलन पर नजर रखे उसे मूल्यवान बनाने के लिए काम करें.
  • भारत में रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया सेंट्रल बैंक की भूमिका का निर्वहन करता है.
  • किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती और कमजोरी का ज्यादातर हिस्सा इन सेंट्रल बैंक्स द्वारा बनाई गई नीतियों पर काम करता है.
  • सेंट्रल बैंक मुद्रा का प्रबंधन करने के साथ ही उसके अवैध उपयोग और अवमूल्यन पर भी नजर रखते है.
  • सेंट्रल बैंक अपने देश के सभी बैंकों की कार्यप्रणाली को लाइसेंसीकरण भी करती है, और उनके ​लिए काम करने के लिए आदर्श गाइडलाइन्स का भी निर्माण करती है.

क्रेडिट यूनियन्स या लघु ऋण संगठन (Credit Union banking)

  • क्रेडिट यूनियन्स या लघु ऋण संगठन मूल रूप से एक स्वयं सहायता समूह होते हैं जो किसी बैंक की तरह ही काम करते हैं.
  • यह आम उपभोक्ता की जगह सिर्फ अपने सदस्यों को ही सेवा दे सकते हैं.
  • इस तरह के संगठन अपने सदस्यों को न नफा न नुकसान को आधार बनाते हुए जरूरत पर पैसा उधार देते हैं और उनसे आसान किस्तों में भुगतान लेते हैं.
  • इन संगठनों द्वारा उधार दिया जाने वाला धन भी सदस्यों के सहयोग से ही इकट्ठा किया जाता है, जिस पर किसी तरह का ब्याज नहीं लिया जाता है या फिर बहुत कम ब्याज दिया जाता है.

ऑनलाइन बैंक (Online banking)

  • इस तरह के बैंक्स का चलन इंटरनेट के प्रचलन में आने के बाद हुआ है, और यह अपनी सारी सेवाएं वेब के माध्यम से ही उपलब्ध करवाती हैं.
  • यहां भी ग्राहक अकाउंट खोलता है और अपना वित्तिय लेन—देन अपने आॅनलाइन अकाउंट के माध्यम से करता है.
  • भारत में अभी इसकी शुरूआत हुई है, हमारे देश में आॅनलाइन वॉलेट्स और मोबाइल वॉलेट्स इन आॅनलाइन बैंकिंग की प्रारंभिक अवस्था में माने जा सकते हैं.
  • यह बैंक दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दस वर्षों में दुनिया की आधी आबादी इस तरह के बैंक से जुड़ जाएगी.

म्यूचुअल बैंकिंग (Mutual banking)

  • म्यूचुअल बैंकिंग काफी कुछ क्रेडिट यूनियन बैंकिंग से मिलती जुलती होती है, लेकिन जहां क्रेडिट यूनियन्स सिर्फ व्यवसाय करने के लिए उधार देते हैं वहीं म्यूचुअल बैंकिंग निजी जरूरतों को ध्यान में रखकर अपने सदस्यों को ऋण देती है.
  • इस बैंकिंग में भी उधार लेने और देने का काम सिर्फ सदस्यों के बीच ही किया जाता है, और यह भी न नफा न नुकसान के सिद्धान्त पर काम करती हैं.
  • इस तरह की बैंकिंग में एक सदस्य से पैसा लेकर दूसरे सदस्य को मुहैया करवाया जाता है और इसी प्रक्रिया को बार—बार दोहराया जाता है.
  • इस तरह की बैंकिंग विकासशील और पिछड़े हुए देशों में ज्यादा प्रचलन में है क्योंकि इसके लिए लाइसेंसिंग प्रक्रिया बहुत आसान होती है या फिर नहीं होती है.

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Ankita

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अंकिता दीपावली की डिजाईन, डेवलपमेंट और आर्टिकल के सर्च इंजन की विशेषग्य है| ये इस साईट की एडमिन है| इनको वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ और कभी कभी आर्टिकल लिखना पसंद है|
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