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भारत में फर्म के लिए रजिस्टर कैसे करें | How to Register for a Firm in India in hindi

How to register for a firm in India in hindi व्यवसाय वो माध्यम है जिसके ज़रिये मनुष्य अपना और अपने साथ काम करने वाले लोगों के जीविकोपार्जन का ख्याल रख पाता है. भारत में व्यवसाय के कई संभावनाएँ हैं. मसलन यहाँ के अधिकतर जगहों पर परिवहन के साधन, कच्चे माल आदि बहुत आसानी से मिल जाते हैं. जिस वजह से यहाँ व्यापार का अच्छा विकास हो सका है. धीरे धीरे व्यापार में बढ़ोत्तरी होती हुई नज़र आती है, और अब व्यापार एक ऐसा काम बन गया है जिसे समझने के लिए वाणिज्य की पढायी करनी होती है. नए नए शिक्षण प्रतिष्ठान इस काम को करते हुए नज़र आते हैं जो इस विषय का अध्ययन- अध्यापन करते हैं.

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भारत में फर्म के लिए रजिस्टर कैसे करें?

How to register for a firm in India in hindi

फर्म क्या है? (What is Firm)

फॉर्म एक व्यवसाय संसथान होता है, जो उत्पादों को बेचकर या एक विशेष तरह की सेवा देकर धन के रूप में लाभ अर्जन करता है. एक फर्म एक या एक से अधिक संस्था के अंतर्गत हो सकता है. एक ही संस्था में आने वाले एक या एक से अधिक फॉर्म एक ही इ.आई.एन नंबर इस्तेमाल करते है. शब्द “फर्म” मूलतः ऐसे व्यापार संस्थानों के लिए इस्तेमाल होता है जिनके सरोकार क़ानूनी प्रक्रियाओं से होता है. इसके अतिरिक्त फर्म शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग व्यवसाय संस्थानों के लिए भी हो सकता है. कभी कभी ये शब्द “बिज़नस” या “एंटरप्राइज” की जगह पर भी इस्तेमाल होते है.

फॉर्म का मुख्य उद्देश्य संस्था के आर्थिक लाभ को बढ़ाना है. यह तथ्य समय और व्यापार के स्थान के बदलने के साथ बदलता है. नये तथ्यों के आधार पर फर्म दो तरह के हो गये हैं, पहले वे जो एक लम्बे समय तक चलाने के लिए बनते हैं, और दुसरे वे जिनका मुख्य उद्देश्य आर्थिक लाभ कमाना होता है, इस तरह के फॉर्म छोटी अवधि के लिए भी होते है.

इसके अलग-अलग रूप (Different types of firms)

स्वामित्व ढाँचे के आधार पर फर्म कई तरह के होते हैं. एक फर्म सिर्फ एक आदमी पर भी निर्भर कर सकता है जो उसे चलाता है, उसकी लागत अपने जेब से देता है उस फर्म का सारा दायित्व अपने काँधे पर लिए लाभ- हानि की जिम्मेवारी स्वयं उठाता है. इसे अमूमन “सोल प्रोपेराइटरशिप” या “सोल ट्रेड” भी कहा जाता है.

इसी तरह एक फर्म को दो या दो से अधिक लोग मिल कर भी चला सकते हैं. सोल ट्रेड की तरह ही इस तरह के फर्म में भी सभी जिम्मेदारियां और लागत प्रोपराइटरशिप लेने वाले पार्टनर्स के ऊपर होती हैं. इस फर्म में आर्थिक लाभ को पार्टनर्स आपस में एक निश्चित प्रतिशत में बांटते हैं. एक फर्म में कई लोग पार्टनर रह सकते हैं.

फर्म का एक और रूप है जिसे कारपोरेशन कहा जता है. ये एक अलग ढाँचे का काम करता है, जिसमे आर्थिक दायित्व और व्यक्तिगत दायित्व एक दुसरे से बंटा और सीमित होता है. इस तरह के फर्म में मालिक (ओनर) किसी भी तरह के आर्थिक या क़ानूनी दायित्वों से मुक्त होता है. एक फर्म कारपोरेशन किसी का व्यक्तिगत या व्यापारिक संस्था, सरकार आदि के अधीन हो सकता है. एक फर्म अधिक लोगों के ज़रिये संचालित होने पर उसे कंपनी कहा जाता है.

को-ऑपरेटिव भी फर्म का ही एक रूप है. को-ऑपरेटिव के सभी ओनर के अपने सीमित दायित्व होते हैं, और इसमें निवेशक ठीक उसी तरह की भूमिका निभाते हैं जैसी कंपनी में उनकी भूमिका होती है.

फर्म में रजिस्टर करने के तरीका (Process of registration of firm)

किसी भी संस्था को स्थापित करने के लिए सबसे पहले कुछ ऑफिसियल प्रक्रियाओं से गुज़ारना पड़ता है. किसी भी फर्म को चलाने से पहले उसे पंजीकृत कराना अति आवश्यक है क्योंकि इससे फर्म के चलने के दौरान कोई क़ानूनी दिक्क़त पेश नहीं आती. भारत अवसरों का देश है यहाँ हर तरह का व्यापार चलता है. भारत में लगभग 7 लाख रजिस्टर्ड कंपनी है. हर महीने हज़ारों नये फर्म पंजीकृत कराने का आवेदन देते हैं. कंपनी एक्ट के सेक्शन 3 के अंतर्गत कंपनी का मतलब एक लीगल सत्ता होती है, जो कम्पनीज एक्ट 1956 के अंतर्गत पंजीकृत होती है. इस एक्ट में दो तरह की कम्पनियां होती हैं जिन्हें प्राइवेट कंपनी और पब्लिक कंपनी कहते हैं. “लिमिटेड” सबसे आम टाइटल है जिसका प्रयोग अक्सर बहुत सी कम्पनीज के नामे के अंत में होता है.

यह तो हुआ पहला चरण, इसके बाद अब उस चरण की बात आती है जो किसी भी कंपनी के पंजीकरण के लिए अति महत्वपूर्ण है. इस चरण में कंपनी का नाम उसका पता कंपनी निर्देशक आदि पंजीकृत होते हैं.

  • आवेदन पत्र जमा कर देने के बाद ऍमसीए मंत्रालय आवेदक को कंपनी के नाम के चार विभिन्न रूप देते हैं जिसमे से एक चुनना होता है.
  • इसके बाद फॉर्म-18 भरना होता है, जिसमे कंपनी की ऑफिस की स्थिति का विवरण होता है.
  • फॉर्म-32 में नए कंपनी के निर्देशक, मेनेजर और सचिव का चुनाव होता है.
  • इन फॉर्म को भर लेने के बाद और मंज़ूरी मिल जाने के बाद MCA द्वारा एक प्रमाणीकरण ई-मेल आता है.

कंपनी का नाम पाने के लिए फॉर्म-1A रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज (ROC) के साथ भरना होता है. इसका शुक्ल मात्र 500 रूपए होता है. कंपनी के नाम के लिए चार नाम देने होते हैं. 1950 अधिनियम के तहत एक ही नाम पर दो कंपनी पंजीकृत नहीं हो सकती. 10 दिनों के अन्दर ROC की तरफ से मंज़ूरी या नामंजूरी का जवाब आ जाता है. नामंज़ूर होने पर ROC कुछ नए नाम सुझा सकती है.

नोट – ऊपर के सभी दस्तावेजों को जमा करने से पहले एक बार दुबारा जांच लें. उसके बाद अपने कंपनी के नाम से TAN कार्ड, PAN कार्ड प्राप्त कर लें.

प्राइवेट और पब्लिक कंपनी में अंतर (Difference between public company and private company)

  • किसी भी प्राइवेट कंपनी में बोर्ड मेम्बर की संख्या 2 होती है वहीँ पब्लिक कंपनी के लिए ये संख्या 7 हो जाती है.
  • किसी भी प्राइवेट कंपनी में अधिकतम 50 सदस्य हो सकते हैं वहीँ किसी पब्लिक कंपनी में इन सदस्यों की संख्या कितनी भी हो सकती है.
  • एक प्राइवेट कंपनी “इनकॉर्पोरेटेड” रहते हुए भी अपना व्यापार शुरू कर सकती है पर एक पब्लिक कंपनी तब तक अपना व्यापार शुरू नहीं कर सकती जब तक उसे “बिज़नस कोम्मेंसमेंट सर्टिफिकेट” नहीं मिल जाता.
  • एक प्राइवेट कंपनी को अपने शेयर्स किसी को नहीं बेचने चाहिए, जबकि एक पब्लिक कंपनी ऐसा कर सकती है.
  • किसी प्राइवेट कंपनी के दो निर्देशक होने चाहिए और पब्लिक कंपनी के कम से कम तीन.

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Ankita

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अंकिता दीपावली की डिजाईन, डेवलपमेंट और आर्टिकल के सर्च इंजन की विशेषग्य है| ये इस साईट की एडमिन है| इनको वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ और कभी कभी आर्टिकल लिखना पसंद है|
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