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भारत के शास्त्रीय नृत्य | Indian Classical Dance information in hindi

Indian classical dance information in hindi भारत विविधताओं से भरा देश है, जिसकी वजह से यहाँ कला कई रूपों में सामने आती है. साथ ही कला का एक ही रूप अलग- अलग जगहों पर अपनी विशेषता के लिए ख़ुद को संवारता है. यहाँ नृत्य के कई रूप- मौजूद हैं. अलग- अलग दिशा में मानों नृत्य स्वयं अपनी मुद्राएँ बदल कर सामने आता हैं, और वही अलग मुद्रा एक अलग शास्त्रीय नृत्य का रूप ले लेती है. देश के विभिन्न राज्यों के विभिन्न शास्त्रीय नृत्य हैं.

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भारत के शास्त्रीय नृत्य

Indian classical dance information in hindi

एक शास्त्रीय नृत्य वो नृत्यकला है जिसके सिद्धांत, औचित्य, प्रशिक्षण आदि एक सीखने वाले को प्राचीन भारतीय परम्पराओं से जोड़ता है. प्राचीन काल से ही इसके सीखने और सिखाने का प्रचलन रहा है जिससे गुरु शिष्य परंपरा की शुरुआत हुई. बात यदि भारतवर्ष में नृत्य उद्भव की की जाए तो ये वैदिक काल से चला आ रहा है. वेदों में ईश्वरीय सत्ता के पक्ष में कई नाटक हुआ करते थे, जिसमे ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए न सिर्फ़ मन्त्रों का उच्चारण और गायन था बल्कि इसके साथ-साथ संवाद भी हुआ करते थे. यहाँ का शास्त्रीय नृत्य यहाँ की धरोहर है. भरतनाट्यम यहाँ का सबसे पुराना और विख्यात शास्त्रीय नृत्यों में एक है. प्रारम्भिक नृत्यों के प्रमाण हमें “नट्ट सूत्र” से प्राप्त होते हैं, जो लगभग 500 ईसापूर्व के लिखे गये पाणिनि के संस्कृत व्याकरण में मौजूद हैं.

भारत के शास्त्रीय नृत्य और उनके राज्य (Indian classical dance and state)

भारत के अलग-अलग जगहों के अपने अलग शास्त्रीय नृत्य हैं, जो यहाँ के शास्त्रीय नृत्य की ज़मीन को मजबूत बनाता है. इसकी संख्या आठ या आठ से अधिक हो सकती है. भारत के संगीत- नाटक अकादमी ने मुख्यतः आठ नाम सुझाये हैं, जिनमे भरतनाट्यम, कत्थक, कुचिपुदु, ओडिसी, कत्थककलि, सत्त्रिया, मणिपुरी और मोहिनीअट्टम है. इन सबके अतिरिक्त बाद में द्रिड विलियम ने इसमें कुछ और नाम सुझाए, जिनके नाम छउ, यक्सगना और भगवत मेला हैं. भारत के सांस्कृतिक मंत्रालय ने इसमें से छउ का नाम संगीत- नाटक अकादमी की फेहरिस्त में जोड़ा. नीचे नृत्य के सभी रूपों और उनके स्थान का नाम दिए जा रहे है.

  • भरतनाट्यम : तमिलनाडु
  • कत्थक : उत्तरप्रदेश
  • कत्थककलि : केरल
  • कुचिपुड़ी : आंध्रप्रदेश प्रदेश
  • मणिपुरी : मणिपुर
  • ओडिसी :उड़ीसा
  • सत्त्रिया : आसाम
  • मोहिनीअट्टम : केरल

इस सब नृत्यों के अपने नियम, अपने सिद्धांत और अपना अलग प्रशिक्षण है. इस वजह से किसी एक नृत्य रूप के बारे में जानकारियाँ लेने पर हमें उसके उद्भव, विकास उसकी परंपरा और साथ ही उसके उद्भव स्थल के इतिहास के विषय में पता चलता है.

भरतमुनि कृत नाट्य शास्त्र को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की बुनियाद कहा जाता है. इसके सबसे अधिक पढ़े जाने वाले संस्करण में लगभग 6000 श्लोक कुल 36 अध्यायों में संकलित है. इस पुस्तक में शिव तांडव, रस- ज्ञान, भाव, मुद्राएँ, अभिव्यक्ति, अभिनय तकनीक, खड़े रहने का आसन आदि के बारे में बहुत ही रोचक व्याख्या है. यद्यपि भरतमुनि के नाट्य शास्त्र का स्थान हिन्दू परम्परा में बहुत ही श्रद्धेय स्थान रखता है, लेकिन इसके अतिरिक्त भी कई ऐसी पुस्तकें लिखी गयीं जिनसे भारतीय शास्त्रीय नृत्य की बारीकियां सीखने और समझने में आसानी होती है. इन पुस्तकों मे “अभिनय दर्पण”, “अभिनय भारती”, “नाट्य दर्पण”, “भाव प्रकाश” आदि पुस्तकें बहुत विख्यात हैं.

पारंपरिक ढंग से भारतीय शास्त्रीय नृत्य अभिनय के माध्यम से किया जाता रहा है. ऐसे नृत्य प्रायः हिन्दू परम्पराओं की ज़मीन पर किये जा रहे है. इसके विषय मुख्यतः ‘वैष्णव”, “शैव, “प्रकृति (शक्ति)” आदि होते हैं. धार्मिक रंग लिए होने की वजह से ये कला अक्सर मंदिरों में और मंदिरों के आस-पास होती रही हैं.

भारत के 8 प्रमुख शास्त्रीय नृत्य (indian classical dance)

  • भारतनाट्यम :

भरतनाट्यम भारतीय शास्त्रीय नृत्य का एक बहुत बृहत् रूप है. इसका उद्भव और विकास तमिलनाडु और उसके आस- पास के मंदिरों से हुआ है. मुख्यतः परंपरा के अनुसार भरतनाट्यम एक “एकक” नृत्य फॉर्म है, जिसका प्रदर्शन मुख्यतः एक स्त्री करती है. इसका विषय हिन्दू परम्पराएँ होती हैं, जिसमे वैष्णव, शैव, शक्ति आदि का प्रभाव देखने मिलता है. इसकी सैद्धांतिक बुनियाद नाट्य शास्त्र में प्राचीन संस्कृति में संकलित है.

भारतनाट्यम अपनी विशेष मुद्राओं के लिए मशहूर है. स्थाई ऊपरी धड़ और स्थिर घुटनों के साथ मुड़े पैर इसकी मुद्रा को एक ख़ास रूप देते हैं. इसकी ख़ास इंगित भाषा का व्याकरण इसे एक अलग रूप देती है. इस नृत्य का प्रदर्शन प्रायः संगीत और गायक के साथ होता है, प्रदर्शन के समय नर्तक अथवा नर्तकी के गुरु निर्देशक के तौर पर वहाँ मौजूद रहते हैं.

उन्नीसवीं सदी तक भरतनाट्य भारतीय मंदिरों में होता रहा, और फिर 1910 ईस्वी के आस- पास ब्रिटिश सरकार ने इसे बैन करा दिया. भारतीय लोगों ने इस बैन का विरोध किया और 20 वीं सदी में मंदिरों के बाहर करने लगे. आधुनिक भरतनाट्यम निगमित विशुद्ध नृत्य है, जिसका विषय किसी धर्म विशेष पर आधरित नहीं होता.

  • कत्थक :

कत्थक शब्द की उत्पति संस्कृत के “कथा” से हुई है. संस्कृत में कथा कहने वाले को “कत्थक” कहा जाता है. कत्थक की उत्पति भक्ति आन्दोलन के समय हुई. उस समय इसमें भगवन श्री कृष्ण के बचपन की तथा अन्य कहानियों को दिखाया जाता है. इसके अतिरिक्त अन्य कहानियों की भी प्रस्तुति नृत्य के माध्यम से होती है. धीरे धीरे इसका विकास हुआ और 16 वीं सदी के आस पास मुग़ल बादशाहों के दरबार में ये फ़ारसी भाषा के साथ पेश किया जाने लगा.

कत्थक तीन अलग अलग फॉर्म में पाया जाता है. ये तीन अलग अलग फॉर्म तीन अलग-अलग जगहों में किय जाने की वजह से है. ये तीन शहर हैं बनारस, जयपुर और लखनऊ. इस नृत्य में मुख्यतः विशेषता इसकी पैरों का मूवमेंट हैं.

  • कत्थकली :

केरल में सत्रहवीं सदी के आसपास इस अभिनय- नृत्य का उद्भव और विकास देखने मिलता है. कत्थक यानि कथा और कलि यानि प्रदर्शन, “कत्थकली” भी कत्थक की ही तरह विशेष तरह से कहानियों को कहने का आर्ट फॉर्म है. इसमें नर्तक या नर्तकी को बहुत ही विशेष तरह की सज्जा दी जाती है. बहुत रंगीन मेक- अप और विशेष तरह के पोशाक में प्रायः पुरुष इस नृत्य को पेश करते नज़र आते हैं.

प्राथमिक तौर पर कथकली हिन्दू धर्म की विशेषताओं को लिए जन्मी थी, जो हिन्दू मिथकों के महान व्यक्तित्वों की कहानियाँ कहती थी. आधुनिक समय में इसके प्रदर्शन के समय अभिनय और नृत्य के साथ साथ एक गायक भी होता है, जो प्राचीन समय में नहीं रहने से अभिनेता और नर्तक को ही गायन भी करना पड़ता था.

  • कुचिपुड़ी :

कुचिपुड़ी शास्त्रीय नृत्य का जन्म आधुनिक भारत के आन्ध्रप्रदेश के कृष्णा ज़िले में हुआ. अन्य बड़े शास्त्रीय नृत्य कलाओं की तरह ही ये भी धार्मिक विश्वास को लिए पनपा है. पारंपरिक कुचिपुड़ी में सारे कलाकार पुरुष ही होते थे. ये पुरुष मुख्यतः ब्राम्हण होते थे. ये पुरुष ही प्रदर्शन के समय स्त्री का रूप लेते थे. बहुत अच्छे पोशाक और सज्जा के साथ इसे किया जाता रहा.

आधुनिक कुचिपुड़ी में ऐसी धारणा है कि तीर्थ नारायण यति और उनके शिष्य सिद्धेन्द्र योगी ने बहुत ही व्यवस्थित तरह से इसे सत्रहवीं सदी के आस पास विकसित किया. ये नृत्य विशेषतः भगवान विष्णु या श्री कृष्णा पर आधारित “वैष्णव” परंपरा को लिए होता है. ये तमिलनाडु में होने वाले “भगवत मेला” से बहुत मिलता- जुलता हुआ प्रतीत होता है.

  • ओड़िसी :

ओड़िसी का उद्भव भारत के उड़ीसा राज्य में हुआ. शास्त्रीय नृत्य का ये रूप मुख्यतः स्त्रियों द्वारा किया जाता रहा. इस फॉर्म में भी धार्मिक विश्वासों को आधार बनाकर नृत्य किया जाता था. भगवान विष्णु के जगन्नाथ रूप की कथाओं और मिथकों को इस नृत्य में खूब अपनाया गया. इसके अतिरिक्त यह भगवान शिव और सूर्य की कथाओं के आधार पर भी खूब किया गया.

ओड़िसी मुख्यतः एक ऐसा “डांस- ड्रामा” है जिसमे सांकेतिक पोशाकों को पहन कर हिन्दू विश्वासों पर आधारित कविताओं पर या कथाओं के आधार पर कलाकार विशेष मुद्राओं के साथ नृत्य प्रस्तुत करता हैं.

  • सत्त्रिया :

पंद्रहवीं सदी के आस- पास असम में रह रहे वैष्णवों के बीच इस नृत्य कला का जन्म हुआ. ये मुख्यतः भगवान कृष्णा की लीलाओं पर आधारित था. पंद्रहवीं सदी के आस पास भक्ति काल के संत श्रीमंत शंकरदेव ने इसे भक्ति आन्दोलन से जोड़ा. इस नृत्य कला को यदि एक अंक में प्रस्तुत किया जाए तो उसे “अंकीय नट” कहा जाता है. ये मुख्यतः कृष्णा- राधा के सम्बन्धों की कथाओं पर या कभी कभी राम- सीता के कथाओं पर आधारित होता है.

  • मणिपुरी :

भारत और म्यांमार (वर्मा) के बॉर्डर पर स्थित मणिपुर में इसका उद्धव और विकास हुआ. मणिपुर में उद्भव होने की वजह से इसे मणिपुरी कहा जाता है. ये मुख्यतः अपने वैष्णव थीम और राधा-कृष्ण की प्रेमलीला “रासलीला” के लिए जाना जाता है. इसके अतिरिक्त ये शिव, शक्ति आदि पर आधारित कथाओं पर भी होता है. इसका प्रदर्शन एक पूरा नृत्य दल मिल के करता है, जिसमे सभी एक विशेष क़िस्म के पोशाक “कुमिल” पहने हुए होते हैं. इसमें नर्तकों की मुद्राएँ विशेषतः उसके हाथ और शरीर के ऊपरी भागों पर आधारित होती है.

  • मोहिनीअट्टम :

मोहिनीअट्टम भगवन विष्णु के “मोहिनी” अवतार पर आधारित है, जिस वजह से इसे “मोहिनीअट्टम” कहा गया है. इसका उद्भव और विकास केरल में हुआ. “मोहिनी” भगवान् विष्णु का वह अवतार है, जिसकी सहायता से भगवान विष्णु ने एक सुर- असुर के बीच के युद्ध में देवताओं की मदद की थी, और असुरों को भ्रमित किया. इस नृत्य फॉर्म में “लस्य” शैली का प्रयोग किया जाता है, जिसका वर्णन नाट्य-शाश्त्र में मिलता है. “लस्य” शैली में बहुत ही कोमल भावों को विभिन्न मुद्राओं से दर्शाया जाता है. ये मुख्यतः एक “एकल” नृत्य फॉर्म है, जिसे सीखने के लिए महिलाओं को खूब मेहनत करनी पड़ती है. इसमें इस्तेमाल होने वाले गीत मुख्यतः “मणिपर्व” नाम के एक भाषा में होते है, जो संस्कृत और मलयालम से मिल कर बनी है.

इन नृत्यों के अतिरिक्त कई और तरह के लोक- नृत्य हैं. प्रायः लोक-नृत्य इन्ही शास्त्रीय नृत्यों से विकसित हुए हैं.

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Ankita

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अंकिता दीपावली की डिजाईन, डेवलपमेंट और आर्टिकल के सर्च इंजन की विशेषग्य है| ये इस साईट की एडमिन है| इनको वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ और कभी कभी आर्टिकल लिखना पसंद है|
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