कोख की आवाज पर कविता

इस कविता का मुख्य सन्दर्भ: गर्भस्थ कन्या ¼ भ्रूण ½ द्वारा मां के साथ संवाद को दर्शाने का प्रयास किया है|

कोख की आवाज पर कविता

किसी दिन किसी माँ की इक बेटी

गहरी निंद्रा में सो रही थी,

मधूर,मीठे सपनों में खो रही थी।

टूटी गहरी तन्द्रा हुआ इक ‘ आगाज ’

कि अचानक आई कोख से आवाज।

माँ  मैं तो भीतर से हूँ बोल रही

आज शायद जीवन का आखिरी पन्ना हूँ खोल रही।

माँ, आज एक सवाल तुझसे पुछूंगी,क्यों कल मुझ पर होगा प्रहार

मैं तो अजन्मी हूँ अब तक फिर नव ‘पल्लवन’ से पहले ही

क्यों शुरू हो गया अत्याचार। 

माँ,  तुम भी तो किसी बेटी की बेटी हो

क्या बेटी ही बेटी की जान गंवायेगी

क्या नहीं, नौ माह गर्भ भीतर रख पायेगी।

गर नानी ने भी ‘कर्मकिया होता इसी प्रकार

जन्म से पहले ही तुझको भी दिया होता मार

तो कैसे ये सारी सुन्दर सृष्टि रचती

न नर होता मदचूर, न ये रेखाएं खिचती।

स्वाभिमान और कुल रक्षा की खातिर जब नारी ने हो आगे कदम बढ़ाया है

दभं चूर हो गया दंभी नर का अपना स्वर्णिम इतिहास रचाया है।

 दुनिया देखूं बाहर की, क्या यह कल्पित स्वपन होगा

बिगुल बजादो माँ,  अब तुम, तब जाकर सपना मेरा सच होगा।

क्या मा¡ तुझको विश्वास नहीं, हम भी परचम लहरा देगीं।

मौका मिल जाए नारी को, तो दुनिया को राह दिखा देगीं

मैं भी चाहूँ  बाधू¡ राखी, करू¡ आरती करू¡ श्रृगांर

भैया पर अर्पण हो खुशियां,अनुज बने मेरे रक्षा आधार।

कुंजन वन में खिलूं कमल सा, महका दू¡, संसार

दंभी नर को सबक सिखा दू¡, देखू¡ कैसे हो अत्याचार।

मा¡, क्या बिना खिले ही बुझ जाउगी बिना उदय ही छिप जाना है

मुझ पर ही क्यों बंधन सारे, जब सबको ही हक पाना है

मा¡, तुमसे सच कहती हू¡, एक बार जन्म दो मुझको

लड़का बन सारे दु:ख हर लूंगी, ना दु:ख दूंगी तुझको।

जीवन की राह मा¡ छूट रही है,

सांसो की डोरी जैसे टूट रही है

ओ अम्मी अब मुझे बचालों, दो प्राणों की भीख

नारी बने आधार अबला की फिर कब दे पाओगी सीख।

kokh ki awaz kavita in hindi

¼बेटी से½

बेटी मैं तो खुद ही खुद से हू¡ हार रही

उलझन ही उलझन में उलझी, न मंजिल को हू¡ पा रही।

सिर्फ शब्दों में ही नर से नारी भारी है,

                                   हर मंजिल वह चूक रही, बाहर भीतर वह हारी है।                                 

किस पर करू¡ मैं विश्वास, आधार तुम्हारा ही कर रहा आघात

आधार मातृ न चाहे तुझको, कौन हरे अब तेरे संताप।

 नन्ही, मैंने भी बचपन में पढ़ी कहानी थी

नारी निंदा मत कर नारी गुण की खान

नारी से ही नर उपजे, भक्त धुव समान।

लेकिन मैं अब तक, इक ध्रुव न दे पाई

कैसी ये नियति मेरी, जो तुम पर बन सामत आई।

सच बेटी ही बेटी पर, कर मूक प्रहार रही

बन श्रृंद्वा की देवी, सबसे पहले कर अत्याचार रही।

           ¼मा¡ से½

मा¡ पीड़ा तेरी समझ रही हू¡, जन्म से पहले ही हार रही हू¡

बेटी होना ही दोष अगर है तो करो ना मा¡ सोच विचार

मत रोओं, न लाओं आ¡सू, उठाओं हाथ और दो आशिष

कुल चंदा को देओं रोशनी, अब जीवन से उठ रहा विवास। 

मा¡ अन्दर से ही देख रही बाहरी संसार

कोई तो हो इस जग में जो हम पर भी करें विचार……………………….।

Save the Girl Child

लेखक

सुनील सिंह

Ankita

अंकिता दीपावली की डिजाईन, डेवलपमेंट और आर्टिकल के सर्च इंजन की विशेषग्य है| ये इस साईट की एडमिन है| इनको वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ और कभी कभी आर्टिकल लिखना पसंद है|
Ankita

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *