कुंभ मेला 2021 निबंध | Kumbh Mela Essay in Hindi

कुंभ मेला 2021, निबंध, शाही स्नान, कहां लगता है , कब लगेगा, कब है, रजिस्ट्रेशन, डेट हरिद्वार (Kumbh Mela 2021 Essay in Hind) (Date and Places, Start Date, Last Date, Package)

हमारे हिंदू धर्म में सभी हिंदू त्योहारों और दिवसों को बहुत ही खास माना जाता है और उनकी महत्वता भी हिंदुओं के लिए काफी ज्यादा होती है। हिंदू धर्म में बहुत सारे त्यौहार और बहुत सारे महत्वपूर्ण दिवस लोगों के लिए महत्वता रखते हैं। आज के इस लेख में हम आप सभी लोगों को धार्मिक मेला कुंभ पर निबंध प्रस्तुत करने वाले हैं। आज के इस निबंध में हम आप सभी लोगों को कुंभ मेला कब क्यों और कहां कहां पर मनाया जाता है, इन सभी विषयों पर विस्तार से निबंध के जरिए जानकारी प्रदान करेंगे, तो आज के इस महत्वपूर्ण निबंध को आप सभी लोग अंतिम तक अवश्य और पढ़ें धार्मिक मेला कुंभ पर महत्वपूर्ण जानकारी को जाने।

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कुंभ मेला 2021 निबंध

क्या है पवन कुंभ मेला ?

हमारे देश में सबसे बड़ा हिंदुओं का आयोजित किए जाने वाला यह कुंभ मेला कहलाता है। यह हिंदुओं के लिए सामूहिक तीर्थ मेला कहलाता है और यहां पर बड़ी मात्रा में हिंदू भाई बहन और साधु संत एवं पर्यटन सेनानी भी इकट्ठा होते हैं और पवित्र नदी में स्नान करके इस त्योहार को मनाते हैं। कुंभ का मेला प्राचीन काल से ही चला आ रहा है और अब भी हिंदुओं में इसकी मान्यता खत्म नहीं हुई है। बाहर देश में रहने वाले विदेशी समेत हिंदू मूल के निवासी भी एक बार जरूर इस पावन पर्व में शामिल होते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस पावन उत्सव के दिन नदी में स्नान करने पर शरीर के रोग, कष्ट और पाप आदि धूल जाते हैं। इस पावन पर्व के शुभ अवसर पर भारत के अलग-अलग स्थानों पर हर 4 वर्ष के समय अवधि में इस कुंभ मेले का विशालकाय आयोजन किया जाता है। इस मेले में साधु संत भगवे रंग को धारण करके उपस्थित होते हैं और स्नानादि करके भगवान की पूजा आराधना करते हैं। हर 4 वर्षों के समय अवधि में इस मेले को नासिक की गोदावरी नदी के किनारे, हरिद्वार में गंगा नदी के किनारे, उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे और प्रयागराज में गंगा नदी, यमुना नदी और सरस्वती नदी के संगम जैसे पावन स्थान पर इस विशालकाय मेले का आयोजन किया जाता है। हर 4 साल में अलग-अलग स्थानों पर होने वाले इस मेले का पूरा आयोजन और पूरी सुरक्षा व्यवस्था से लेकर श्रद्धालुओं के हर एक सुविधा की निगरानी की जिम्मेदारी राज्य एवं केंद्र सरकार दोनों ही बखूबी से निभाती हैं। इस मेले में श्रद्धालुओं के हर एक सुविधा का ध्यान केंद्र एवं राज्य सरकार रखती हैं। प्रयागराज के नाम से जाने जाने वाले इस पावन स्थल को पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था, परंतु अब यह पावन स्थान प्रयागराज नाम से सुप्रसिद्ध हो चुका है।

कुंभ मेले का इतिहास एवं पौराणिक कथा

दोस्तों कोई भी स्पष्ट और प्रमाणित तौर पर पक्का सबूत इकट्ठा नहीं किया गया है, जिस पर यह सिद्ध किया जा सके कि आखिर कुंभ मेले का आयोजन क्यों किया जाता है, परंतु कुछ पौराणिक कथाएं जरूर इस पर विख्यात हैं, जो इस प्रकार से है।

हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार एक बार दुर्वासा ऋषि के शराब की वजह से सभी देवी देवताओं ने अपनी ताकत अर्थात शक्ति को दी थी। तब सभी देवी और देवताओं ने अपनी शक्ति को दोबारा हासिल करने के लिए भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव की शरण में गए और फिर इन दोनों देवताओं ने देवगणों को भगवान विष्णु की आराधना करने की सलाह दी और तब स्वयं भगवान विष्णु ने क्षीर सागर का मंथन करने और उसमें से अमृत निकालने की सलाह देवगणों को दी। अकेले क्षीर सागर का मंथन करना देवताओं के लिए संभव नहीं था और इसीलिए देवताओं ने दैत्य के साथ संधि की। इस मंथन मे मंदारा पर्वत का सहारा समुंद्र में एक छड़ी के रूप में किया था। देवताओं और दैत्यों के बीच संधि में जो भी मंथन में निकलेगा उसका बराबर ऐसा किया जाएगा और फिर उसे बांटा जाएगा, ऐसे ही बात हुई थी।मंथन के दौरान समुद्र में से कई चीजें बाहर आई और सभी को बराबर रूप में दैत्यों और देवताओं के बीच बांटा भी गया।

समुंद्र मंथन में से विष का प्याला बाहर आया और विष के प्याले का ग्रहण स्वयं शंकर भगवान जी ने किया था। फिर मंथन करते करते समुद्र में से अमृत का प्याला निकला और देवताओं ने अमृत निकलने के बाद दैत्यों का गलत उद्देश्य समझ लिया। अगर अमृत का प्याला दैत्यों के पास चला जाता तो विश्व का सर्वनाश हो जाता और देवताओं का अस्तित्व खत्म हो जाता। इन सभी खतरों को समझते हुए देवताओं ने इंद्र के पुत्र को अमृत कलश को लेकर जाने की बात कही और फिर तुरंत ही इंद्र पुत्र कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। करीब देवताओं और दैत्यों के बीच 12 दिनों तक और रातों तक निरंतर रूप से युद्ध इस अमृत कलश को लेने के लिए होता रहा। इसी दौरान अमृत के कलश अलग-अलग स्थानों पर अमृत की बूंदे गिरी और वह चार स्थान प्रयागराज, हरिद्वार, नाशिक एवं उज्जैन है। तभी से माना जाता है कि इन चारों तीर्थ स्थानों पर दैवीय और रहस्यमई शक्तियां अपना घर बना चुकी है और इसीलिए इनचार स्थानों पर कुंभ मेले का महा आयोजन किया जाता है। देवलोक में 12 दिन मनुष्य के लिए 12 साल के बराबर होते हैं और इसीलिए इन चार स्थानों पर प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल में कुंभ मेला लगाया जाता है।

कुंभ मेला के प्रकार क्या है

हिंदू परंपरा के अनुसार और रीति-रिवाजों को अनुसार परिंदों को अपने संपूर्ण जीवन काल में एक बार अवश्य कुंभ का स्नान करना चाहिए। हर और 12 वर्षों के अंतराल में अलग-अलग 4 स्थानों में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है और करीब 144 वर्षों में एक बार महाकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। महाकुंभ मेले का आयोजन प्रयागराज में ही किया जाता है। महाकुंभ के मेले में श्रद्धालु पवित्र नदी में स्नान करते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने एक बार कहा था, कि पवित्र नदी गंगा में स्नान करने या डुबकी लगाने से मनुष्य के द्वारा किए गए सभी पापों की मुक्ति हो जाती है। हिंदू पुराण के अनुसार एक बार कुंभ मेले में अगर पवित्र नदी में स्नान कर लिया जाए तो करीब पूर्वजों के 88 पीढ़ियों तक के पाप भूल जाते हैं और वह मुक्ति को प्राप्त हो जाते हैं। वर्ष 2013 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन किया गया था और अब 144 वर्षों के बाद ही महाकुंभ का आयोजन दोबारा से किया जाएगा। आइए जानते हैं, कि कुंभ मेला कितने प्रकार का होता है, जिसकी जानकारी नीचे विस्तृत रूप से बताई गई है।

  • पूर्ण कुंभ मेला :- पूर्ण कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में एक बार प्रयागराज जैसे पावन धार्मिक स्थान पर आयोजित की जाती है। पूर्ण कुंभ के मेले में प्रयागराज के संगम के पवित्र स्थान में लोग एकत्रित होते हैं और फिर स्नानादि करके भगवान की पूजा आराधना करते हैं। इस मेले में भारी मात्रा में पर्यटन सेनानी और लाखों करोड़ों की संख्या में हिंदू श्रद्धालु मौजूद होते हैं और साथ ही में साधु संतों की भी भीड़ अपार संख्या में यहां पर इस पावन और शुभ दिन पर होती है।
  • अर्ध कुंभ मेला :- अर्ध कुंभ मेले का तात्पर्य आधा कुंभ से अर्थात निष्पक्ष है। इस मेले को अर्ध कुंभ के मेले का नाम दिया जाता है, क्योंकि इस मेले को प्रत्येक साल बाद आयोजित किया जाता है। प्रत्येक 12 वर्षों के पूर्ण कुंभ मेले के समारोह के बीच में 6 वर्षों के समय अवधि में अर्ध कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। अर्ध कुंभ मेला प्रयाग राज और हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। पिछला अर्ध कुंभ मेला वर्ष 2016 में हरिद्वार में आयोजित किया गया था।
  • कुंभ मेला :- कुंभ मेला चार स्थानों पर विभिन्न विभिन्न समय पर आयोजित किया जाता है और कुंभ मेला एक बार बड़े पैमाने पर आयोजित किए जाने वाला मेला होता है। इस पावन मेले में अपार संख्या में भक्तगण उपस्थित होते हैं और पवित्र नदी में स्नान करके अंतरात्मा की तृप्ति के साथ-साथ शारीरिक एवं मानसिक रूप से भी सिद्ध हो जाते हैं और भगवान की आराधना में लीन हो जाते हैं।
  • माघ कुंभ मेला :- माघ मेला हिंदू धर्म के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है और हिंदुओं एवं पौराणिक कथाओं के अनुसार माघ मेला की उत्पत्ति ब्रह्मांड के निर्माण के रूप में हुई थी।माघ कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग राज में त्रिवेणी संगम के तट पर हर साल आयोजित किया जाता है।

कुंभ मेले के महोत्सव के लिए चयनित स्थान

कुंभ मेला अपने आप में ही हिंदुओं के लिए बहुत ही पवित्र और पावन मेला है और इसीलिए इसे अलग-अलग चार स्थानों पर आयोजित किया जाता है, जिसकी जानकारी को हम विस्तृत रूप में समझते हैं।

  • हरिद्वार :- हिंदू चैत्र महीने के अनुसार जब सूर्य मेष राशि में उपस्थित होता है और बृहस्पति कुंभ राशि में मौजूद होता है, तब इस मेले का आयोजन हरिद्वार के पावन स्थल पर किया जाता है।
  • प्रयागराज :- हिंदू महीना मांग के दौरान जब सूर्य चंद्रमा मकर में होता है और बृहस्पति मिर्च में होता है, तब इलाहाबाद यानी कि प्रयागराज के नाम से जाने जाने वाले इस पावन स्थल पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।
  • नाशिक :- महीने के अनुसार सूर्य बृहस्पति और सिंह राशि में मौजूद होता है, तब इस मेले का आयोजन नासिक के पावन स्थल पर किया जाता है।
  • उज्जैन :- जब बृहस्पति सिंह राशि में और सूर्य मेष में मौजूद होता है या जब बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा वैशाख के महीने के दौरान तुला राशि में मौजूद होते हैं, तब इस मेले का आयोजन उज्जैन के पावन धार्मिक स्थान पर किया जाता है।

कुंभ मेला कैसे मनाए एवं पारंपरिक रस्मो रिवाज क्या है

इस पवित्र मेले का आयोजन निर्धारित किए गए चार स्थानों के पवित्र नदियों के तटों पर किया जाता है। इस मेले को सभी श्रद्धालु और मेले से जुड़े आस्था से परिपूर्ण लोग स्नान आदि पवित्र नदी में करते हैं।इस मेले में अन्य गतिविधियों के रूप में पवित्र धार्मिक चर्चा है, पुरुष और महिला एक बड़े पैमाने पर गरीबों को भोजन कराते हैं और भक्ति गीतों का आयोजन करना, धार्मिक संप्रदाय धारण करना आदि किया जाता है। इस मेले में बड़े-बड़े आध्यात्मिक और महापुरुष जैसे साधु संत उपस्थित होते हैं और वे अपने अनंत ज्ञान के जरिए मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान और दिशा निर्देश के बारे में जानकारियां प्रदान करते हैं और साथ ही में भगवान की आराधना आदि भी करते हैं। सरकार की तरफ से कुंभ मेले में शिविरों का आयोजन किया जाता है, ताकि सभी भक्तगण आसानी से अपना समय व्यतीत कर सकें और उन्हें किसी भी प्रकार की समस्या ना हो। कुंभ मेले में श्रद्धालु स्नान आदि करने के बाद भगवान की आराधना करने के पश्चात कुछ दान दक्षिणा भी करते हैं और साथ ही में साधु संतों की भीड़ में सत्संग भी या करते हैं और लोग सुनने भी जाते हैं। कुल मिलाकर हिंदू धर्म और हिंदुओं के लिए कुंभ मेला बहुत ही मनो कारी और श्रद्धा से परिपूर्ण होकर मनाया जाने वाला त्यौहार है।

कुंभ मेले के बारे में कुछ रोचक तथ्य

  • कुंभ मेले के पीछे पौराणिक कथा के अनुसार प्रत्येक 12 वर्ष में इस विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन में अमृत कलश निकलने के बाद 12 दिलों और रातों तक निरंतर रूप से देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध हुआ और यह मिला उसी युद्ध को दर्शाता है। स्वर्ग का 1 दिन और एक रात पृथ्वी के 1 वर्ष के बराबर होता है। इसीलिए इस त्यौहार को प्रत्येक 12 वर्ष में मनाया जाता है।
  • वर्ष 2013 में महाकुंभ मेले का आयोजन किया गया था और अब इस मेले को 144 वर्षों के बाद ही दोबारा से आयोजित किया जाएगा और महाकुंभ के मेले में करीब 100 मिलियन से भी अधिक श्रद्धालु उपस्थित हुए थे और इसकी गणना का अनुमान स्वयं सरकार ने लगाया था। हिंदुओं के इस पावन और विशालकाय त्यौहार को 14 अस्थाई अस्पतालों, 243 डॉक्टरों जो काल पर उपस्थित लगभग, 30,000 पुलिस बलों और सुरक्षा कर्मचारियों की ड्यूटी और 40,000 शौचालय और मंत्रालयों के साथ सर्वश्रेष्ठ प्रबंध घटनाओं में से एक के रूप में इस को मान्यता प्रदान की गई है।
  • हिंदुओं का यह पावन त्यौहार करीब 2000 वर्षो से भी अधिक पुराना है और इसके अतिरिक्त तो मैं मेला का पहला दस्तावेज विवरण चीन के यात्री हआन टीसांग द्वारा दर्ज किया गया था और चीन का यह यात्री 629-645 ईसा पूर्व में भारत आया था।
  • अमृता कुभेर साधने, दिलीप पूर्व आईजी के द्वारा निर्देशित पहली बंगाली फीचर फिल्म थी और इस फिल्म में कुंभ मेले का दस्तावेजीकरण किया गया था और इसे 1982 में जारी किया गया।
  • कुंभ मेले में अनुमानित व्यापारिक आय 12 हज़ार करोड़ रुपए है। कुंभ मेले के दौरान रोजगार के अवसर लगभग 65000 है।
  • चारों स्थानों पर कुंभ मेले में धार्मिक स्नान ही इसकी प्रमुख रीति है।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में आने वाले वर्षों में त्यौहार के प्रबंधन में सुधार की आशा के साथ समूह के हवाई दृश्य का आयोजन किया था।
  • त्यौहार में नागा साधु सम्मिलित होते हैं और बिल्कुल नग्न अवस्था में होते हैं।
  • यूनेस्को ने कुंभ मेले को भारत की सांस्कृतिक विरासत का रूप प्रदान किया हुआ है।

हमें उम्मीद है, कि आप सभी लोगों को कुंभ के मेले पर प्रस्तुत किया गया यह निबंध अत्यधिक पसंद आया होगा और साथ ही कुछ रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियां भी आपको कुंभ मेले के संबंधित इस लेख में प्राप्त हुई होगी। कुंभ मेला हिंदुओं की आस्था और एकता को दर्शाने वाला और धार्मिक मान्यताओं को दर्शाने वाला एक महा पर्व है।

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