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क़तर राजनयिक संकट | Qatar Diplomatic Crisis 2017 in hindi

Qatar-Gulf diplomatic Crisis 2017 in hindi छह अरबिया देशों ने क़तर से अपने रिश्ते तोड़ दिए हैं. इस समय यह एक विश्वस्तरीय खबर है. क़तर जो कि गल्फ देशों में एक है, और एक लम्बे समय तक सऊदी अरब के साथ चला है. वह अब अपने स्वतंत्र फैसले करना चाहता है और कई बार सऊदी अरब इसके फैसलों से नाखुश हुआ है. चाहे मुस्लिम ब्रदरहुड का मुद्दा हो या ईराक से रिश्तों का हर क्षेत्र में क़तर अपने सुर सऊदी और उसकी सहायता से चलने वाले देशों जैसे बहरैन, यूएई आदि से अलग रखता रहा है. यह बात किसी भी तरह से सऊदी को पसंद नहीं आ रही है. इन्हीं वजहों से सऊदी अरब और उसके साथ अन्य पांच अरबिया देशों ने क़तर से सारे राजनैतिक सम्बन्ध तोड़ दिए हैं. इस संकट की मुख्य वजहें और इसके प्रभावों का विस्तृत वर्णन नीचे किया जा रहा है.

कतर से रिश्ते ख़तम करने की मुख्य वजह (Reason Behind Qatar Crisis):

  • अरब के छह देशों ने अपने रिश्ते क़तर से तोड़ दिए हैं. इन छह देशों में सऊदी अरबिया, इजिप्ट, बहरीन, यूनाइटेड अरब, अमीरात लीबिया और यमन है. इन छहों देशों का कहना है कि क़तर आतंकवाद का समर्थन करता है.
  • क़तर से सऊदी अरबिया वैसे काफी लम्बे समय से नाखुश था. सऊदी अरबिया एक बहुत बड़ा देश है. वो चाहता है कि गल्फ क्षेत्र के सभी छह देश एक साथ मिलकर कुछ करना चाहता है, किन्तु कतर अपनी विदेशी नीतियां बनाना चाहता है, जो बात सऊदी अरबिया को अच्छी नहीं लगती है.
  • जिस तरह यूएई और बहरीन चुप चाप सऊदी अरबिया की बात सुन लेते हैं क़तर वैसा बिलकुल भी नहीं करना चाहता है. वह वही करना चाहता है, जो उसके लोगों के हित में हो.
  • सऊदी अरबिया को जहाँ ये लगता था कि इस मुद्दे पर क़तर इसका पक्ष लेगा, उसी जगह पर क़तर ने ऐसा करने से मना कर दिया, जो बात सऊदी अरबिया को बहुत बुरी लगी.
  • इसके पीछे ‘मुस्लिम ब्रदरहुड का उत्थान’ भी एक बहुत बड़ा कारण है. साल 2011 में जब होस्नी मुबारक का इजिप्ट के डिक्टेटर पद से पतन हुआ और वहाँ पर मुस्लिम ब्रदरहुड की शुरुआत हुई. उस समय सऊदी अरबिया को मुस्लिम ब्रदरहुड का कांसेप्ट पसंद नहीं आया. इसकी वजह ये है कि सऊदी अरबिया पूरी तरह से स्थिरता चाहता है. उसे इस बात की चिंता है कि किसी तरह की क्रांति न आ जाए. क्यों कि तभी वह ईरान के खिलाफ कुछ कर पायेगा, किन्तु क़तर ने मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन किया और साल 2013 में जब मुस्लिम ब्रदरहुड ने मुहम्मद मर्सी की सरकार को फिर से गिरा दिया, उसका भी क़तर ने बहुत समर्थन किया.

  • अल जज़ीरा, जो कि एक बहुत ही बड़ी न्यूज़ नेटवर्क है और कई देशों के लोगों में देखी जाती है, उसकी सहायता लेकर भी अपने मुल्क में मुस्लिम ब्रदरहुड को बढ़ावा दिया और एक अच्छे रूप में पेश किया. यह बात भी सऊदी अरबिया को बिलकुल भी पसंद नहीं आई.
  • साल 2014 में सऊदी अरबिया, बहरीन और यूएई ने कुछ समय के लिए क़तर से राजनैतिक रिश्ते तोड़ लिए थे, किन्तु तब भी स्थितियां आज की तरह बुरी नहीं हुईं थीं.
  • क़तर के पास बहुत बड़े गैस रेसेर्विओर हैं. इस देश ने साल 1995 से लिक्विड नेचुरल गैस निर्यात करना शुरू किया. पर्शियन गल्फ में स्थित ‘साउथ पार्स नार्थ डोम’ मैदाल विश्व का सबसे बड़ा नेचुरल गैस रिजर्वायर है. इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा क़तर के पास है और कुछ हिस्से ईरान में भी हैं.
  • अतः इस नैचुरल गैस रिजर्वर से गैस निकालने के लिए क़तर को ईरान के साथ सम्बन्ध बेहतर करने पड़े, ताकि शांति से गैस निकाली जा सके. सऊदी अरबिया को क़तर की ये बात भी बिलकुल पसंद नहीं आई. ये गैस बेच कर जीडीपी पर कैपिटल के हिसाब से क़तर विश्व के सबसे अमीर देशों में शुमार हो गया. इसके बाद इसने अपनी विदेश नीति बनानी शुरू की और नए नए निर्णय लेने लगा. इससे आस पास के देशों को बहुत असुरक्षा महसूस हुई और सऊदी को भी इससे परेशानी होने लगी.

डोनाल्ड ट्रम्प का अरब दौरा (Donald Trump Qatar visit) :

इस बीच डोनाल्ड ट्रम्प के सऊदी अरबिया विजिट में ट्रम्प ने कहा कि सभी देशों को मिलकर ईरान को अलग करना होगा. डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में जानने के लिए पढ़े. तात्कालिक समय में ईरान एक नुक्लेअर प्रोग्राम चला रहे हैं. ईरान का ये काम इजराइल को भी पसंद नहीं आ रहा. ध्यान देने वाली बात ये है कि इजराइल अमेरिका का एक बहुत ही करीबी मित्र देश रहा है. अमरीका खुद भी ये नहीं चाहता की ईरान के पास किसी तरह की परमाणु शक्ति आये. हालाँकि क़तर ने आम लोगों के बीच ये कह दिया कि ईरान के साथ ऐसा करना सही नहीं है. कुछ समय बाद क़तर की सरकार ने ये कहा कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है. ये बात उनकी औपचारिक वेबसाइट को हैक करके वहाँ पर डाली गयी है. 

अमेरिका और क़तर के मध्य मनमुटाव की मुख्य वजह (American and Qatar relations) :

पिछले महीने क़तर का एक नेता अमीर शेख तमीम बिन हमद अल ठानी ने अमेरिका के ईरान के प्रति एक आलोचना की बुराई की. ग़ौरतलब है कि अमरीका और ईरान के बीच के रिश्ते अच्छे नहीं हैं और यूएस सऊदी अरबिया का समर्थन करता है, किन्तु क़तर इस जगह पर न्यूट्रल रहने की कोशिश करता है और ईरान की आलोचना करने से कतराता है. इसी बीच जब डोनाल्ड ट्रम्प सऊदी अरबिया आये तो समावेश में उन्होंने ईरान की आलोचना की. इस पर खबर ये आई कि ईरान के नेता ने इस आलोचना का समर्थन नहीं किया और सामने से अमेरिका से सवाल भी पूछ डाले. हालांकि इस खबर के लोगों तक पहुँचने के बाद क़तर की सरकार ने कहा कि उनके नेता ने ऐसी बात बिलकुल भी नहीं की है, किन्तु अब तक बहुत देर हो चुकी थी. अरब के बाक़ी देशों को ये बात पसंद नहीं आई कि क़तर ईरान का समर्थन कर रहा है. हालांकि क़तर ने सिर्फ और सिर्फ मौखिक तौर पर ईरान का समर्थन किया था कि इस देश से रिश्ते ख़राब करने की क्या ज़रुरत है.

क़तर के अन्य गल्फ क्षेत्रिया देशो के साथ सम्बन्ध (Qatar-Gulf Country Relation)

क़तर और सऊदी अरबिया दोनों के बीच के रिश्ते इतने भी बुरे नहीं रहे हैं. ये दोनों ही गल्फ कोऑपरेशन के मेम्बर भी हैं. इस कोऑपरेशन में 6 सदस्य हैं. सीरिया में भी इन दोनों के मिलिटेंट लगभग एक साथ काम करते हैं. सऊदी की तरफ से क़तर के मिलिटेंट की फंडिंग भी की जाती रही है.  ये दोनों देश सीरिया में सिर्फ एक ही मकसद से काम करते हैं और वो मकसद सीरिया के शिया प्रेसिडेंट बशर अल असद को पद से हटाना है.क़तर इस्लामिक मिलिट्री अलायन्स का भी एक सदस्य है. इसे अरब नाटो भी कहा जाता है.

सऊदी अरब की पहल –

इस मूव के अंतर्गत सऊदी अरब ने अपने और क़तर के बीच के बॉर्डर सील कर दिया है. इससे क़तर को काफी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. हालाँकि क़तर एक ऊर्जा संपन्न देश है, किन्तु इस देश को खाद्य सामग्रियों का आयात बाहरी देशों से होता है और आयात के लिए अधिकतर सऊदी अरबिया केप बॉर्डर का इस्तेमाल होता है.

 इन चारों देशों ने कहा है कि क़तर इन देशों के अपने सभी राजदूतों को 48 घंटों के अन्दर वापस अपने देश में ले आयें. साथ ही 14 दिनों का समय उन लोगों को दिया हैं, जो है जो क़तर के है किन्तु इन देशों में रह रहें हैं. इस वजह से क़तर का स्टॉक मार्केट 7.2 प्रतिशत नीचे जा चूका है.

 न्यूज़ मीडिया के अनुसार लोगों ने भोजन और पानी का संचय करना शुरू कर दिया है.

क़तर पर राजनयिक संकट का भारत पर प्रभाव (Qatar Diplomatic Crisis effect on India):

देश की विदेश मंत्री का कहना ये है कि ये ‘गल्फ कारपोरेशन’ का आतंरिक मामला है. इसमें 6 देश सदस्य हैं और इसके मुख्यालय सौदिया अरब के रियाध में हैं. भारत जापान के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गैस आयत करने वाला देश है. भारत प्रति वर्ष 8.5 मिलियन टन नेचुरल गैस क़तर से आयात करता है. हालांकि पेट्रोनेट एलएनजी आरके गर्ग के अनुसार भारत क़तर से समुद्र के रास्ते से करता है. अतः ये माना जा सकता है कि भारत को गैस मिलने में किसी तरह की परेशानी नहीं होगी. भारत का क़तर के साथ सम्बन्ध अच्छे होते जा रहे हैं. कई भारतीय कम्पनियाँ जैसे विप्रो या इन्फोसीस क़तर में पैसे लगाना भी चाहती है, किन्तु क़तर अपनी बनायी विदेशी नीतियों से बाज़ नहीं आता है, तो उसे क़तर में इन्वेस्टमेंट के विषय पर पुनर्विचार करने के आवश्यकता है.

क़तर एयरवेज एक बहुत बड़ी कम्पनी है, जिसके फ्लाइट्स से हर हफ्ते करीब 24000 भारतीय लोग सफ़र करते हैं. भारत एलएनजी के अलावा अमोनिया, यूरिया आदि भी क़तर से आयत करता है, तो एलएनजी के अलावा अन्य वस्तुओं के आयात पर इसका असर पड़ सकता है. अतः भारत ये ही चाहेगा कि इन देशों के बीच सभी रिश्ते फिर से सुधर जाएँ.

क़तर पर राजनयिक संकट का लम्बे समय तक होगा असर (Qatar Diplomatic Crisis 2017 Effect in hindi)-

साल 2018 का फीफा विश्वकप रूस में होने वाला है और उसके बाद क़तर में होने की बारी है. साल 2022 में फीफा वर्ल्डकप क़तर में होने वाला है, किन्तु इस तरह की राजनैतिक स्तिथि से इस विश्वकप के आयोजन में परेशानी आ सकती है. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना है कि यदि क़तर से बाकी अरबी देशों से सम्बन्ध इसी तरह बिगड़े रहे, तो बाकी देश मिलकर क़तर पर सैन्य कार्यवाही भी कर सकते हैं.

अतः अब कई देश चुपचाप क़तर पर सऊदी अरबिया के उठाये जाने वाले क़दमो की ओर ध्यान से देख रहे हैं और क़तर की गतिविधियों पर भी नज़र रखे हुए हैं.

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Ankita

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अंकिता दीपावली की डिजाईन, डेवलपमेंट और आर्टिकल के सर्च इंजन की विशेषग्य है| ये इस साईट की एडमिन है| इनको वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ और कभी कभी आर्टिकल लिखना पसंद है|
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