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क्या है राफेल सौदा और क्या है इससे जुड़ा विवाद | Rafale Deal Controversy Details in Hindi

राफेल डील विवाद क्या है ? (Rafale Deal, Scam, Cost, History, BJP, Congress Controversy, history, Details in Hindi)

हाल ही में मौजूदा सरकार पर विपक्षी दलों ने उसके एक समझौते को लेकर इल्जाम लगाए है. यह समझौता एक ऐसे लड़ाकू विमान का है, जिसकी गिनती दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमानों में की जाती है. उस लड़ाकू विमान का नाम है राफेल. ऐसे 36 विमानों को भारत सरकार द्वारा फ्रांस से ख़रीदा जा रहा है. किन्तु इस समझौते को लेकर कई सारे विवाद सामने आ रहे हैं. इस विवाद ने राजनीति का रूप भी ले लिया है. जिसमें कांग्रेस सरकार द्वारा बीजेपी सरकार पर आरोप लगाये गये हैं. इसके बारे में यहाँ पूरी जानकारी दी गई है.

Rafale Deal Controversy

राफेल डील की जानकारी (Rafale Deal Details)

यह फ्रांस का एक ऐसा लड़ाकू विमान है, जिसे फ्रांस की एक कंपनी डेसाल्ट एविएशन द्वारा निर्मित किया गया है. इसकी विशेषता यह है कि यह एक फ्रांसीसी ‘ट्विन – इंजन मल्टीरोल’ लड़ाकू विमान है. भारत में इस विमान के समझौते की बात सन 2008 में यूपीए सरकार द्वारा शुरू हुई थी. इस बातचीत में भारत के तत्कालिक रक्षा मंत्री ए. के. एंटोनी ने फ्रांस से 126 मध्यम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट को खरीदने का जिक्र किया था. उस समय मौजूदा केंद्र सरकार कांग्रेस की थी और यह प्रस्ताव वायु सेना द्वारा भी मंजूर कर लिया गया था. इस समझौते में कुछ विमानों को खरीदे जाने के बारे में बात की गई थी, वे विमान लॉकहीड मार्टिन का एफ-16s, यूरोफाइटर टाइफून, रशिया का एमआईजी-35, स्वीडन का ग्रिपेन, बोइंग का एफ/ए-18s और डेसाल्ट एविएशन का राफेल आदि थे.

लंबी अवधि की प्रक्रिया के बाद सन 2012 में भारत के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की, कि डेसाल्ट राफेल ने लोवेस्ट बिडर एल – 1 के रूप में जीत हासिल की है. इसलिए इसकी खरीद की बात सामने आई. इसके ओरिजिनल प्रपोसल में पहले 18 विमानों को पूरी तरह से डेसाल्ट एविएशन द्वारा निर्मित किया जाना था और बाकी के 108 विमानों को डेसाल्ट से टेक्नोलॉजी के ट्रान्सफर के साथ लाइसेंस के तहत हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा बनाया जाना था. यूपीए सरकार और डेसाल्ट के बीच इसकी कीमतों और टेक्नोलॉजी के ट्रान्सफर पर लंबी बात हुई. यह बात इतनी लंबी चली की इसे 2 साल लग गये, लेकिन सौदा नहीं हो सका और भारत में एनडीए की सरकार आ गई. पूर्व में मौजूद सरकार द्वारा एक राफेल की कीमत को पाँच सौ छब्बीस करोड़ रूपये बताया गया था. यह कीमत एवियोनिक्स और हथियारों के साथ की थी. किन्तु इसकी एक्चुअल कीमत को आधिकारिक तौर पर उजागर नहीं किया गया था.

राफेल लड़ाकू विमान की विशेषता (Rafale Fighter Plane Features)

यह एक ऐसा लड़ाकू विमान है जोकि एक तूफ़ान है और इसे फ्रेंच में राफेल कहा जाता है. तो जैसा इसका नाम है वैसा ही इसका काम है. इसकी विशेषताएं निम्न है –

  • इस विमान में कुल 6 मिसाइल होती हैं जिसमें से इसके दोनों पंखों में 2-2 मिसाइल फिट की जाती है, और 2 मिसाइल इसके नीचे के हिस्से में लगी होती है.
  • इस विमान का वजन इतना कम होता है कि यह 3000 किमी से भी अधिक रेडियस की ऊंचाई से हमला कर सकता है.
  • 4000 किलोग्राम से भी अधिक इसकी ईंधन क्षमता है. राफेल में 30 MM की गन लगी होती है, जोकि एक बार में 125 राउंड फायर कर सकती है. इसमें 2 शक्तिशाली इंजन भी लगे होते हैं.
  • यह बाकी विमानों की तुलना में लम्बाई, चौड़ाई और वजन में काफी कम है. यह विमान 27 मीटर लंबा और 10.80 मीटर चौड़ा है. और इसका वजन बिना हथियारों के दस हजार तीन सौ किलोग्राम है, और हथियार के साथ 15 हजार किलोग्राम है.
  • यह कम ऊंचाई में काफी शानदार प्रदर्शन कर सकता है. लेकिन यह 55,000 किमी की ऊंचाई से भी बेहतर तरीके से बम गिरा सकता है.

मोदी सरकार द्वारा की गई फाइनल डील (Rafale Deal By BJP)

प्रधानमंत्री मोदी जी 3 साल पहले फ्रांस की यात्रा पर गए थे, उन्होंने वहां से आने के बाद 10 अप्रैल सन 2015 को एक महत्वपूर्ण घोषणा की थी. उस घोषणा में उन्होंने इस सौदे में खरीदे जाने वाले लड़ाकू विमानो के संबंध में जानकारी दी थी. दरअसल मोदी जी और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रानोईस हौलेंड के बीच हुई बातचीत में 36 राफेल जेट की सप्लाई के लिए इंटर – सरकारी समझौते को पूरा करने पर सहमत हुई. अंततः हुआ यह कि भारत और फ्रांस दोनों ही सरकारों ने मिलकर 23 सितंबर 2016 को इस विमान के सौदे पर हस्ताक्षर कर दिये, जिसमें इसका कुल मूल्य 58,000 करोड़ रूपये की राशि तय की गई.

भारत और फ़्रांस की सरकारों के बीच किये गये इस समझौते में 50 प्रतिशत ओफ़्सेट ऑब्लिगेशन शामिल है, जोकि भारत के इतिहास का सबसे बड़ा ओफ़्सेट कॉन्ट्रैक्ट है. ओफ़्सेट समझौते की मुख्य बात यह है कि इसे भारत से 74 प्रतिशत इंपोर्ट किया जाता है. तो पीटीआई रिपोर्ट के मुताबिक इसका मतलब यह है कि यहाँ 22,000 करोड़ रूपये का डायरेक्ट बिज़नस है.

सरकार पर विपक्ष द्वारा लगाये गए आरोप (Allegations Of Opposition and Congree)

इस समझौते के बाद विपक्ष ने मोदी सरकार पर एक के बाद एक कई प्रश्न उठाये. उनका कहना था कि प्रधानमंत्री ने सुरक्षा पर मंत्रिमंडल समिति की मंजूरी के बिना इस सौदे को फाइनल कर दिया. उन्होंने सरकार से इसका भी जवाब माँगा है कि इस समझौते में राज्य संचालित एयरोस्पेस प्रमुख एचएएल शामिल क्यों नहीं है. और साथ ही कांग्रेस का यह कहना है कि रक्षा मंत्री निर्मला इसे एक गोपनीय समझौता कह रही है जोकि गलत है. कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार इस सौदे के माध्यम से रिलायंस डिफेन्स लिमिटेड (आरडीएल) को लाभ पहुंचा रही है. क्योंकि इस कंपनी ने 58,000 करोड़ रूपये के सौदे के लिए ओफ़्सेट ऑब्लिगेशन को एक्सीक्यूट करने के लिए डेसाल्ट एविएशन के साथ संयुक्त वेंचर स्थापित किया है, जोकि ओफ़्सेट कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने में प्रमुख भूमिका निभाएगा. उनका यह आरोप है कि रिलायंस डिफेन्स का गठन प्रधानमंत्री द्वारा की गई समझौते की घोषणा से सिर्फ 12 दिन पहले किया गया था.

पहले और बाद की डील में अंतर (Deal Difference between BJP and Congress)

मोदी सरकार द्वारा की गई डील में वर्तमान कीमतों में कई सालों तक मेंटेनेंस बैकअप की गारंटी है, इसके अलावा इन विमानों को जिस स्थान पर लगाया जाना था, वहाँ का इंफ्रास्ट्रक्चर अच्छा होना चाहिए था, जोकि इस विमान की निरंतरता, मैन्टेनेबिलिटी और सपोर्ट सिस्टम के लिए जरुरी था. यह सब पहले की डील में नहीं था. इसके अलावा पहले की डील में 18 विमान फ्रांस द्वारा निर्मित किये जाने थे और बाकि के 108 विमान भारत में निर्मित किये जाने थे, किन्तु भारत में जिन विमानों का निर्माण किया जाना था, फ्रांस ने उसकी गारंटी लेने से इंकार कर दिया था. इसलिए एनडीए सरकार ने इसके बदले पूर्ण रूप से फ्रांस में निर्मित 36 विमानों को क्रय करने की डील की.

सरकार की प्रतिक्रिया (BJP Government’s Response)

विपक्षी पार्टी द्वारा लगाये गये इल्जामों पर सरकार ने सफाई देते हुए कहा, कि सन 2008 में जब इस सौदे की बात शुरू हुई थी, तब इसे गुप्त रखे जाने को कहा गया था. इस बार की पुष्टि फ्रांस सरकार ने भी की है. उनका कहना है कि इससे दोनों देशों की सुरक्षा पर असर हो सकता है. सरकार का यह कहना है कि उस समय कांग्रेस की सरकार थी और रक्षा मंत्री ए.के. एंटोनी जी थे, जब भारत और फ़्रांस ने सुरक्षा खरीद पर इस इंटर – सरकारी समझौते पर बात शुरू की थी. और उसमे इसे गोपनीय रखने के बारे में भी जिक्र था. करीब 2 साल पहले रक्षामंत्री जी ने इस एक विमान की कीमत को गुप्त न रखते हुए जिक्र किया था, कि इसकी कीमत छह सौ 70 करोड़ बताई गई थी.

वित्त मंत्री जी ने भी फेसबुक के जरिये ये कहा कि कांग्रेस के अध्यक्ष ‘असत्य से जूझ’ रहे हैं और झूठा अभियान कर रहे हैं. उनका कहना था कि एनडीए सरकार द्वारा साइन की गई डील सन 2008 में यूपीए सरकार के तहत सहमत की गई डील की तुलना में बेहतर शर्तों पर है.

फ्रांस सरकार की प्रतिक्रिया (French Government’s Response)

फ्रांसीसी मीडियापार्ट जोकि एक ऑनलाइन इन्वेस्टिगेटिव और राय पत्रिका है, इस पर एक आर्टिकल द्वारा यह कहा गया कि रिलायंस डिफेन्स लिमिटेड को राफेल डील में पार्टनर के रूप में नामित करने के लिए कहा गया है. इस आरडीएल कंपनी के संस्थापक अनिल अंबानी जी हैं.

किन्तु इसके विरोध में फ्रांसीसी सरकार ने एक बयान जारी किया, जिसमें उल्लेख किया गया कि फ्रांसीसी कंपनियों को राफेल कॉन्ट्रैक्ट के लिए भारतीय फर्मों का चयन करने की पूर्ण स्वतंत्रता है. डेसाल्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनिल अंबानी डेसाल्ट एविएशन की पसंद थीं.

अनिल अंबानी की प्रतिक्रिया (Anil Ambani’s Respons)

कांग्रेस द्वारा लगाये गए सभी आरोपों को आरडीएल ने खारिज कर दिया है. साथ ही उसके जवाब में अनिल अंबानी ने कांग्रेस पार्टी पर मानहानि का मुकदमा दायर करने की धमकी दी है.

न्यायपालिका का स्टैंड (Judiciary’s Stand)

सितंबर 2018 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद से सम्बंधित पीआईएल को सुनने के लिए अपनी सहमती दिखाई है. जबकि कांग्रेस ने कहा कि वे इस मामले पर अदालत में जाने से पहले आवश्यक दस्तावेज पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

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Ankita

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अंकिता दीपावली की डिजाईन, डेवलपमेंट और आर्टिकल के सर्च इंजन की विशेषग्य है| ये इस साईट की एडमिन है| इनको वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ और कभी कभी आर्टिकल लिखना पसंद है|
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