रेल बजट के बारे में जानकारी | Rail Budget History in Hindi

रेल बजट के बारे में जानकारी (Rail Budget History, Details in Hindi)

किसी भी देश को बेहतर तरीके से चलाने के लिए उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक होता है और इसके लिए बजट का निर्धारण किया जाता है. इसके अंतर्गत विभिन्न विभाग के लिए बजट का आवंटन किया जाता है. हमारे देश में जितने भी विभाग है, उनमें बजट का आवंटन होता है, उन्हीं में से एक है रेल मंत्रालय. आज हम इस लेख में रेल मंत्रालय के रेल बजट के बारे में बात करने जा रहे हैं, कि यह क्या होता है और इसकी शुरुआत कब की गई थी. आइये रेल बजट के बारे में विस्तार से जानते हैं. 

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रेल बजट क्या है ? (What is Rail Budget ?)

रेल बजट भारत के रेल मंत्रालय द्वारा प्रतिवर्ष पेश किया गया एक वित्तीय स्टेटमेंट है. इसे भारत के रेल मंत्री द्वारा संसद में बजट सत्र के दौरान केन्द्रीय बजट के कुछ समय पहले पेश किया जाता था.

रेल बजट का इतिहास (Rail Budget History)

ब्रिटिश रेलवे के अर्थशास्त्री विलियम एकवोर्थ की अध्यक्षता में सन 1920 – 21 में ‘एक्वोर्थ कमिटी’ ने एक सिफारिश की, और एक ‘एक्वोर्थ रिपोर्ट’ बनाई. जिसके कारण रेलवे का पुनर्गठन हुआ. रेलवे फाइनेंस को सन 1921 में सामान्य सरकार के फाइनेंस से अलग कर दिया गया था. उसके बाद सन 1924 में रेल बजट की घोषणा हुई, और तब से यह सन 2016 तक जारी रहा.

रेल बजट की शुरुआत कब हुई ? (When Rail Budget is Started)  

  • भारत जिस साल आजाद हुआ, उस साल देश के पहले रेल मंत्री एवं वित्त मंत्री जॉन मथाई जी बने, उन्होंने उसी साल नवम्बर में देश का पहला रेल बजट संसद के सामने रखा था.
  • वर्ष 2000 में, ममता बनर्जी पहली महिला रेल मंत्री बनीं, जोकि बाद में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी.
  • सन 2002 में, वह रेलवे बजट पेश करने वाली पहली महिला के साथ – साथ 2 अलग – अलग गवर्निंग गठबंधन एनडीए और यूपीए के लिए ऐसा करने वाली एक मात्र महिला भी हैं.
  • इसके बाद 24 मार्च सन 1994 में रेल बजट का पहला लाइव टेलीकास्ट हुआ. सन 2004 से मई 2009 तक रेल मंत्री बने रहे लालू प्रसाद यादव ने लगातार 6 बार रेल बजट पेश किया.
  • फिर सन 2009 में उनके कार्यकाल में 108 बिलियन यानि 1.5 बिलियन यूएस डॉलर का बजट पारित किया गया था.
  • सन 2014 में मोदी सरकार की कैबिनेट में डी वी सदानंद गौड़ा जी रेल मंत्री नियुक्त किये गये. रेल मंत्री बनने के बाद सदानंद जी ने अपना पहला रेल बजट संसद में प्रस्तुत किया. उस बजट में उन्होंने देश में पहली बुलेट ट्रेन और 9 हाई – स्पीड रेल मार्गों की घोषणा की थी.
  • इसके बाद 25 फरवरी सन 2016 में आखिरी रेल बजट पेश किया गया, जिसे श्री सुरेश प्रभु द्वारा प्रस्तुत किया गया था.

रेल बजट कब बंद हुआ एवं किसने किया (When and Who Stop Rail Budget ?)

सन 2016 में, केन्द्रीय बजट से कुछ दिन पहले तक हर साल रेल बजट पेश किया जाता था. फिर 21 सितंबर 2016 को मोदी सरकार द्वारा अगले साल से रेल बजट और आम बजट को एक साथ पेश करने की मंजूरी दी गई. जिसके चलते देश के सबसे बड़े ट्रांसपोर्टर के लिए एक अलग बजट की 92 साल पुरानी प्रथा समाप्त हो गई. रेल मंत्री सुरेश प्रभु का कहना था, कि उनका यह दोनों बजट को मिलाने का प्रस्ताव रेलवे और देश की अर्थव्यवस्था के हित में पेश किया गया है.    

रेल बजट क्यों बंद किया गया (Why Stop Rail Budget ?)

रेल बजट को बंद करने के लिए सरकार द्वारा निम्न कारण बताये गये हैं –

  • मोदी सरकार द्वारा रेल बजट को आम बजट से जोड़ने का निर्णय देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने और बजटीय सुधार करने के लिए लिया गया था.
  • बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली नीति आयोग समिति का कहना था, कि एक अलग रेल बजट सिर्फ एक वार्षिक रिवाज है, जिसे अब ख़त्म किया जाना चाहिए.
  • इसके साथ ही उन्होंने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें उनका यह कहना था, कि समग्र आम बजट की तुलना में रेल बजट का आकार कम हो गया है, इसलिए अब रेल बजट को अलग से प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है.
  • रिपोर्ट में आगे कहा गया, कि भारत एक अलग रेलवे बजट वाला दुनिया का एक मात्र देश है. वास्तव में जिन सभी देशों ने एक्वर्थ कमेटी की रिपोर्ट का उल्लेख किया था, उनके पास अलग से रेल बजट था, किन्तु अब इस प्रथा को बंद कर दिया गया है.
  • कमिटी ने यह भी कहा, कि रेल बजट केन्द्रीय बजट की तरह कानूनी या संवैधानिक रूप से आवश्यक नहीं है. इसके लिए उन्होंने यह देखा कि वर्षों से रक्षा, सड़क परिवहन, राजमार्ग, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे अन्य मंत्रालयों का खर्च भारतीय रेलवे के खर्च से आगे निकल गया है, भले ही ये मंत्रालय अलग बजट के बिना काम करते हों.
  • कमिटी ने यह अवलोकन भी किया, कि रेल बजट का इस्तेमाल राजनीतिक टूल के रूप में किया जा रहा है, जिसमे नई गाड़ियों, रेल मार्गों एवं किराया वृद्धि के लिए लिए गये फैसले राजनीतिक विचारों के कारण प्रभावित हो रहे थे.

इन कारणों से रेल बजट को आम बजट के साथ मिला दिया गया है. और सन 2017 में वित्त मंत्री अरुण जेटली जी द्वारा पहला संयुक्त केन्द्रीय बजट पेश किया. अतः इसी में रेल बजट को शामिल किया गया.

रेल बजट 2019 (Railway Budget 2019)

सन 2019 के अंतरिम आम बजट को पेश करते हुए वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, कि केंद्र ने भारतीय रेलवे के लिए 1.58 लाख करोड़ रूपये का ओवरऑल कैपिटल एक्सपेंडीचर प्रोग्राम निर्धारित किया है, जो राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर के लिए सबसे अधिक है.  

संयुक्त रेल एवं आम बजट के लाभ (Combined Railway and General Budget Advantages)

संयुक्त बजट के लाभ इस प्रकार है –

  • अलग से रेल बजट न पेश करने से सबसे बड़ा लाभ यह होगा, कि अब रेलवे को सरकार को सकल बजटीय सहायता के लिए वार्षिक लाभ के रूप में अनुमानित 97 बिलियन यानि 9,700 करोड़ रूपये का भुगतान नहीं करना होगा. साथ ही, 2.27 ट्रिलियन रूपये का कैपिटल चार्ज भी अब ख़त्म हो जायेगा.
  • भारतीय रेलवे भारी राजस्व घाटे से जूझ रहा है. इसके एक साथ में हो जाने से बोझ कम होगा, क्योंकि इसे वित्त मंत्रालय पर ट्रान्सफर कर दिया जायेगा.
  • अब रेल बजट को केन्द्रीय बजट के साथ मिला कर पेश करने से संसद के कीमती समय की बचत होगी, और नई नीतियाँ शुरू एवं लागू की जा सकेंगी.
  • इससे रेलवे को अपने पूंजीगत व्यय को बढ़ाने में मदद मिलेगी. और साथ ही इससे आम बजट का आकार बढ़ जायेगा, जोकि देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होगा.
  • रेल बजट को मुख्य बजट में मिलाने से परिवहन नीति सहज हो जायेगी. ब्रिटिश राज के दौरान रेल बजट ने देश के आम बजट का 85 % हिस्सा लिया था, जोकि अब यह घटकर केवल 15 % रह गया है.
  • रेल बजट राजनीतिक दबावों से मुक्त होगा. छोटे दलों को गठबंधन में शामिल करने के लिए प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा सौदेबाजी चिप के रूप में इसका इस्तेमाल किया गया था, यहाँ तक कि गृह राज्यों में नई ट्रेनों का परिचय आम तौर पर मामूली पार्टियों के वोटों से होता था. जोकि अब और नहीं होगा.

संयुक्त रेल एवं आम बजट से हानि (Combined Railway and General Budget Disadvantages) 

रेल और आम बजट के मिल जाने से कुछ हानियाँ भी है जोकि इस प्रकार है –

  • हम सभी ये जानते हैं, कि हमारी पार्टियाँ वादे करना पसंद करती है और फिर मतदाताओं का पक्ष हासिल करने के लिए कीमत कम कर देती हैं. ऐसा ही रेलवे में भी हो सकता है. पार्टियां यात्रियों से मिलने वाले वोट बैंक को खोना नहीं चाहेगी और वह रेलवे की कीमतों को घटा देगी, जोकि रेल विभाग के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
  • पहले विश्व स्तर की सुविधाओं और स्वच्छता के साथ उनमें सुधार करने उन्हें विकसित करने के लिए भारतीय रेलवे के निजीकरण की बात हुई थी. किन्तु अब रेलवे के किसी भी हिस्से का निजीकरण मुश्किल है, क्योंकि जनता का समर्थन हासिल करने के लिए सरकार द्वारा किसी भी अचानक नीति परिवर्तन की सम्भावना से निजी निवेशक हमेशा सावधान रहेंगे.
  • विभिन्न विभागों को धन का वितरण और आवंटन सभी वित्त मंत्रालय के आधीन होगा, जोकि बजट के बढने और घटने के अनुसार निर्णय लेंगे. वार्षिक बजट में गिरावट होगी, तो रेलवे एवं अन्य बजटों में भी एक समान कटौती होगी. यह रेलवे के लिए सामान्य नहीं होगा और वे इसके लिए प्रतिक्रिया भी नहीं दे सकते हैं.
  • सरकार के अधीन विभिन्न विभाग होते हैं, जिसके चलते उन्हें सभी विभागों की परिस्थितियों का ध्यान रखना होता है. ऐसे में रेल बजट के इसमें शामिल होने से सरकार द्वारा इस पर कम ध्यान दिया जा सकता है. क्योंकि हर कोई अपने मतलब निकालने में व्यस्त होता है. ऐसे में यदि सही परिणाम नहीं मिला, तो रेलवे को भारी नुकसान हो सकता है.

इस तरह से रेल बजट जोकि, कई सालों से चला आ रहा है, इसे अब मुख्य बजट में मिला दिया गया है.

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Updated: March 6, 2019 — 10:08 am

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