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संजय गाँधी की जीवनी | Sanjay Gandhi Biography in hindi

Sanjay Gandhi Biography in hindi विवादों के बावजूद एक लोकप्रिय राजनेता थे संजय गाँधी. पिछली शताब्दी का सातवाँ दशक भारतीय राजनीति का एक यादगार दशक माना जाता है. इस दशक के दौरान भारत के राजनीतिक पटल पर एक ऐसे नेता का उदय हुआ था जो अपने अल्पायु में ही वह कारनामा कर गया, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था. इस नेता का नाम था संजय गाँधी. कांग्रेस पार्टी के अति-मह्त्वाकांक्षी नेता होने के साथ-साथ नेहरु-गाँधी परिवार के राजनीतिक विरासत के अघोषित वारिस भी थे संजय गाँधी. माना जाता था कि वो अगर जिन्दा होते तो इंदिरा गाँधी के बाद वही कांग्रेस कि बागडोर सँभालते और कांग्रेस के सत्ता में होने पर प्रधानमंत्री बनते. मगर 34 वर्ष की अल्पायु में ही देश को इस नौजवान नेता से मरहूम होना पड़ा.

राजनीति में और देश के लिए कुछ अलग करने की चाहत में उन्होंने परदे के पीछे से कई ऐसे फैसले लिए कि विवादों से उनका चोली-दामन जैसा रिश्ता बन गया. सत्तर के दशक में भारतीय राजनीति में उथल-पुथल मचाने वाले संजय गाँधी पहले तो ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनना चाहते थे, परन्तु यहाँ उनका मन नहीं रमा. फिर उन्होंने अपने बड़े भाई राजीव गाँधी के पदचिन्हों पर चलते हुए कमर्शियल पायलट का लाइसेंस हासिल किया. परन्तु यह काम भी उन्हें नहीं जंचा. वास्तविकता यह थी कि उनके जीवन का लक्ष्य तो कुछ और था और वह था राजनीति में एक ऊँचा मुकाम हासिल करना. हालाँकि अल्पायु में ही दुनिया से विदा होने के कारण वह उस मुकाम के चरम पर तो नहीं पहुँच सके, परन्तु जब तक रहे विवादों में ही घिरे रहे. दूसरी तरफ इस कद्दावर व्यक्तित्व के सम्बन्ध में यह भी सत्य है कि विवादों में घिरे रहने के बाद भी देश के जनमानस में उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई.

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संजय गाँधी की जीवनी

Sanjay Gandhi biography in hindi

संजय गाँधी प्रारंभिक जीवन

संजय गाँधी का जन्म 14 दिसम्बर 1946 को दिल्ली में हुआ था. बचपन से ही जिद्दी स्वभाव के रहे, संजय को पढाई-लिखाई में मन नहीं लगता था. पहले वेल्हम बॉयज स्कूल और फिर ख्यातिप्राप्त देहरादून के दून स्कूल में उनका दाखिला कराया गया. परन्तु इंदिरा और फ़िरोज़ गाँधी के तमाम प्रयासों के बावजूद वह स्कूल की पढाई भी पूरी नहीं कर पाए. अकादमिक योग्यता न होने के बावजूद वह ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनना चाहते थे. इसके पीछे उनकी कारों के प्रति दीवानगी थी. ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में अपना करियर बनाने की चाहत में संजय ने इंग्लैंड का रुख किया और वहां प्रसिद्ध कार निर्माता कंपनी रोल्स-रोयस के साथ तीन वर्षों तक इंटर्नशिप किया. फिर वह भारत वापस लौटे और हवाई जहाज का पायलट बनने की ट्रेनिंग लेकर कमर्शियल पायलट का लाइसेंस हासिल किया. परन्तु हवाई जहाज उड़ाना संजय गाँधी का अंतिम मुकाम नहीं था, उनकी महत्वाकांक्षा तो किसी और उड़ान को लेकर थी और वह थी राजनीति.

संजय गाँधी राजनीतिक सफ़र (Sanjay Gandhi political career) –

यह कहना गलत नहीं होगा कि संजय गाँधी का युग भारतीय राजनीति में परिवर्तन का युग था. आज़ादी के बाद देश की सपाट चलती राजनीति में उन्होंने उथल-पुथल मचा दिया और देश पर एकक्षत्र राज करती आ रही कांग्रेस पार्टी को देश की आम जनता का आक्रोश झेलना पड़ा था. वर्ष 1974 तक संजय के पास राजनीति में करने के लिए कुछ खास नहीं था. परन्तु इसी वर्ष जब देश में सरकार के विरुद्ध एकजुट विपक्ष ने देशव्यापी हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू किया तो इससे न केवल इंदिरा सरकार को झटका लगा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी हिचकोले आने शुरू हो गए. इतना ही नहीं इंदिरा सरकार को एक बड़ा झटका तब लगा, जब 25 जून 1975 को सरकार के काम-काज पर कोर्ट ने एक कड़ी टिप्पणी की और सरकार असहज हो गई.

परिस्थितियों को अपने विरुद्ध जाते देख इंदिरा गाँधी ने आनन-फानन में देश में आपातकाल लगा दिया. राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए जल्द ही होनेवाले लोकसभा के चुनाव को टाल दिया गया, राज्यों के गैर-कांग्रेसी सरकार को बर्खास्त कर दिया गया, प्रेस में सेंसरशिप लागू कर दिया गया और जनता को मिलने वाले कई संवैधानिक अधिकारों को निरस्त कर दिया गया. आपातकाल का विरोध करने वाले नेताओं, कलाकारों, बुद्धिजीवियों सहित हजारों लोगों को गिरफ्तार कर या तो उन्हें जेल भेज दिया गया या फिर नज़रबंद कर दिया गया.

आपातकाल का यह दौर युवा संजय गाँधी के लिए राजनीतिक वरदान साबित हुआ. राजनीति में कुछ अलग कर दिखाने के लिए उतावले संजय ने इंदिरा के सलाहकार की भूमिका निभाते-निभाते पूरी सत्ता को अपने कब्जे में कर लिया और पूरे आपातकाल के दौरान अपनी मर्ज़ी चलाते रहे. यह भी कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान सरकार द्वारा लिए गए सारे कठोर निर्णय इंदिरा और उनकी कैबिनेट के नहीं वरन संजय गाँधी के थे. इस दौरान इंदिरा गाँधी ने जहाँ देश के आर्थिक विकास के लिए 20 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की थी वहीँ संजय ने इससे अलग स्वंय द्वारा प्रतिपादित 5 सूत्री कार्यक्रम को जोर-शोर से पूरे देश में लागू किया था. ये कार्यक्रम थे-शिक्षा, परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, जातिवाद के बंधन को तोड़ना और दहेज़ प्रथा का खात्मा. हालाँकि बाद के दिनों में संजय के कार्यक्रम को इंदिरा के 20 सूत्री कार्यक्रम के साथ सम्बद्ध कर दिया गया और इसे 25 सूत्री कार्यक्रम के तौर पर लागू किया गया. इंदिरा गाँधी जीवन परिचय यहाँ पढ़ें.

उल्लेखनीय है कि संजय गाँधी न तो निर्वाचित प्रतिनिधि थे और न ही वे किसी संवैधानिक व प्रशासनिक पद पर थे, इसके बावजूद इंदिरा गाँधी सरकार में उनका भारी दखल था. सरकार के कैबिनेट मंत्री से लेकर उच्च प्रशासनिक अधिकारीयों और पुलिस महकमे तक पर उनका आदेश मानने का दबाव रहता था. परिणामस्वरूप कई कैबिनेट मंत्रियों और अधिकारीयों ने संजय कि दखलंदाजी से आजिज आकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. इंदिरा सरकार के तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल का कैबिनेट से इस्तीफे की वजह संजय गाँधी का उनके मंत्रालय में बढ़ती दखलंदाजी का ही परिणाम था. गुजराल के इस्तीफे के बाद संजय ने अपनी टीम के सदस्य विद्या चरण शुक्ल को सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया था. संजय के लिए सरकार का यह मंत्रालय सबसे अहम् था क्योंकि संचार माध्यमों जैसे आकाशवाणी और समाचार पत्रों पर आपातकाल के दौरान नकेल कसने के लिए यहीं से आदेश जारी होते थे. इसके बाद संजय ने संचार माध्यमों पर जिस प्रकार से नकेल कसा उसे आज भी आपातकाल के एक तुगलकी आदेशों के तौर पर याद किया जाता है.

अंततः भारी विरोधाभासों और देश में कांग्रेस विरोधी माहौल बनने के कारण 1977 में देश में आपातकाल का दौर खत्म हुआ और चुनाव कराने की घोषणा हुई. संजय गाँधी भी उत्तर प्रदेश के अमेठी निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार चुनाव मैदान में उतरे. इस चुनाव में न सिर्फ इंदिरा और संजय की हार हुई बल्कि कांग्रेस को भी भारी पराजय का सामना करना पड़ा. यह हार संजय के लिए एक चुनौती बन गया. वह नए सिरे से अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने में लग गए. उन्हें मौका भी जल्दी मिल गया. केंद्र की सत्ता में आई जनता पार्टी की सरकार में उपजे अंतर-विरोध जल्दी ही सामने आने लगे. केवल डेढ़ साल में ही प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को अपना पद छोड़ना पड़ा. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई जीवन परिचय यहाँ पढ़ें. फिर चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. इसके बावजूद जनता पार्टी में आंतरिक कलह खत्म नहीं हुआ. दूसरी तरफ देश महंगाई से त्रस्त होने लगा. तेल और चीनी जैसे खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूने लगीं. देश में पैदा हुई इस अव्यवस्था का कांग्रेस पार्टी व संजय गाँधी ने एक अवसर के रूप में देखा और जनता पार्टी सरकार की विफलता को संजय जनता के सामने उजागर करने में जुट गए. जल्द ही उनकी मेहनत ने रंग दिखाया. केवल तीन सालों में जनता पार्टी की सरकार का अंत हो गया. 1980 में देश में एक बार फिर से चुनाव का महायज्ञ हुआ. संजय अमेठी से कांग्रेस के प्रत्याशी बने. इस चुनाव में कांग्रेस को भारी जीत मिली. इंदिरा और संजय भी विजय हुए और कांग्रेस एक बार फिर सत्ता पर काबिज हुई. इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं. राजनीति के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की इस वापसी में संजय गाँधी का बहुत बड़ा योगदान था.

विवादित जीवन

संजय गाँधी का सम्पूर्ण जीवन विवादों से भरा रहा. उनका व्यक्तिगत जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक विवादों से अछूता नहीं रहा था. पढाई से दूर भागना, जबरन शादी करना, बिना किसी पद और ओहदे के सरकारी कामों में दखल देना आदि से वे हमेशा विवादित व्यक्तित्व बने रहे. उनके साथ जुड़े कुछ विवाद निम्न हैं.

मारुती लिमिटेड विवाद

संजय गाँधी का कारों के प्रति दीवानगी जगजाहिर है. वर्ष 1971 में संजय के दबाव में इंदिरा कैबिनेट ने देश में एक ऐसी गाड़ी के निर्माण का प्रस्ताव दिया जिसे देश का मध्यम वर्ग खरीद सके. इस प्रस्ताव को क्रियान्वित करते हुए जून 1971 में सरकार ने कंपनी एक्ट के तहत ‘मारुती मोटर्स लिमिटेड’ नाम की कंपनी के गठन को मंजूरी दे दी. संजय गाँधी को इसका प्रबंध निदेशक बनाया गया. इस पर विवाद तभी से शुरू हो गया.

विवाद की वजह कंपनी के प्रबंध निदेशक का इस विषय में किसी तजुर्बे का न होना था. सवाल इंफ्रास्ट्रक्चर, तैयारी, डिजाईन और नेटवर्क पर भी उठे. इन कमियों के बावजूद कंपनी को लाइसेंस दिया गया, विवाद पैदा होने के लिए काफी था. इसी बीच बांग्लादेश को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया. कुछ समय के लिए मारुती विवाद पर विराम लग गया. परन्तु युद्ध समाप्त होने के बाद एक बार फिर से इस मुद्दे ने जोड़ पकड़ा और यह एक भ्रष्टाचार का मुद्दा बन गया. तब संजय गाँधी ने पश्चिमी जर्मनी की कार निर्माता कंपनी फोक्सवैगन से संपर्क साधा और उसके साथ भारत में कार निर्माण का करार किया. परंतु यह करार भी परवान नहीं चढ़ सका. इस बार इसकी वजह देश में आपातकाल का लागू होना हो गया. इस दौरान विरोधियों के लिए मारुती लिमिटेड का गठन भ्रष्टाचार का एक बड़ा मुद्दा था. आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसने इसकी जांच के लिए न्यायमूर्ति ए. पी. गुप्ता की अध्यक्षता में एक कमीशन बैठा दिया. कमीशन ने कंपनी के गठन में नियमों की अवहेलना पर कड़ी और प्रतिकूल टिप्पणी की थी.

गौरतलब है कि संजय गाँधी के रहते देश में ‘आमजनों की गाड़ी’ का निर्माण तो नहीं हो सका परन्तु 1980 में उनकी मौत के एक साल बाद इंदिरा सरकार के प्रयास से वी. कृष्णमूर्ति के नेतृत्व में एक बार फिर से ‘मारुती उद्योग लिमिटेड’ के नाम से उस कंपनी का पुनर्गठन किया गया. इसके बाद कंपनी ने जापान की कंपनी सुजुकी को भारत में कार बनाने के लिए आमंत्रित किया. अंततः संजय गाँधी का सपना पूरा हुआ और उनकी गैर मौजूदगी में देश के मध्य वर्ग को सस्ती कीमत की छोटी गाड़ी ‘मारुती 800’ के रूप में मिली.

नसबंदी कार्यक्रम पर विवाद

आपातकाल के दौरान देश में लागू किए गए कठोर कानूनों में जो सबसे विवादित कानून रहा, वह था परिवार नियोजन कार्यक्रम को सख्ती से लागू करने के लिए चलाया गया नसबंदी का अभियान. देश की बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए संजय गाँधी ने इसे कड़ाई से लागू करने का आदेश जारी किया था. इसके तहत नसबंदी को अनिवार्य कर दिया गया और साफ़-सफाई के लिए शहरी इलाकों से झुग्गियों को हटाने का कार्यक्रम चलाया गया. परन्तु संजय की यह पहल आम जनता के लिए एक त्रासदी साबित हुई. कार्यक्रम को कड़ाई से लागू कराने के चक्कर में ‘संजय गाँधी ब्रिगेड’ के सदस्यों ने अति कर दी थी. संजय को खुश करने के लिए यूथ कांग्रेस के नेता पुलिस के सहयोग से लोगों को जबरन पकड़कर नसबंदी कैंप तक ले जाते थे और उन्हें नसबंदी कराने के लिए मजबूर करते थे. माना जाता है कि उस दौरान लगभग 4 लाख लोगों की जबरन नसबंदी की गई थी. सरकार की इस जोर-जबरदस्ती से आम जनता में भारी असंतोष पैदा हुआ और देशभर में इस कार्यक्रम का विरोध शुरू हो गया.

‘किस्सा कुर्सी का’ विवाद

वर्ष 1975 में अमृत नाहटा द्वारा बनाई गई और निर्देशित फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ इंदिरा और संजय गाँधी पर लक्षित था. इस फिल्म को अप्रैल 1975 में सेंसर बोर्ड के पास प्रमाणन के लिए भेजा गया था. फिल्म में संजय गाँधी द्वारा कार निर्माण पर व्यंग्य के साथ-साथ तत्कालीन इंदिरा-संजय की चौकड़ी में शामिल हस्तियों जैसे, स्वामी धीरेन्द्र ब्रहमचारी, इंदिरा गाँधी के निजी सचिव आर. के. धवन और रुखसाना सुल्तान को भी लपेटा गया था. फिल्म के विवादित विषय को देखते हुए सेंसर बोर्ड ने फिल्म को एक सात सदस्यों वाले पुनरीक्षण समिति के पास भेज दिया. तब समिति ने विषय की गंभीरता को भांपते हुए इसे सरकार को भेज दिया. इसके बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से फिल्म के निर्माता और निर्देशक को 51 आपत्तियों सहित कारण बताओ नोटिस जारी किया गया.

नोटिस के जबाव में फिल्म के निर्माता अमृत नाहटा ने कहा कि ‘फिल्म के सभी पात्र काल्पनिक हैं, उनका किसी राजनीतिक पार्टी या व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है.’ परंतु मंत्रालय नाहटा के जबावों से संतुष्ट नहीं हुआ और फिल्म के प्रमाणन को लटका दिया गया. इसी बीच देश में आपातकाल लागू हो गया. मौके का फायदा उठाते हुए फिल्म के मास्टर प्रिंट सहित उससे जुड़े कागजातों को सेंसर बोर्ड के कार्यालय से गायब कर दिया गया और उसे गुडगाँव स्थित मारुती फैक्ट्री में लाकर जला दिया गया. वर्ष 1977 में जनता पार्टी द्वारा आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए गठित शाह आयोग ने इस फिल्म से जुड़े मुद्दे की भी जाँच की थी और फिल्म के मास्टर प्रिंट को जलाने में संजय गाँधी और उनके ख़ास तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल को दोषी ठहराया था.

निजी जीवन

जीवन की अन्य पहलुओं की तरह संजय गाँधी का वैवाहिक जीवन भी उस दौर में चर्चा का विषय बना रहा था. उन्होंने अपने उम्र से दस साल छोटी 17 वर्षीय सिख परिवार की लड़की मेनका से विवाह किया. कहा जाता है कि संजय ने यह विवाह मेनका के परिवार वालों के न चाहते हुए भी किया था. मेनका एक मॉडल बनना चाहती थीं. उन्हें मॉडलिंग का ब्रेक भी मिला था और वह भी उस समय के प्रसिद्ध ब्रांड बॉम्बे डाईंग के विज्ञापन का. इस विज्ञापन में ही संजय ने मेनका को देखा था और उन्हें अपना दिल दे बैठे थे. बाद में संजय की मुलाक़ात मेनका से वीनू कपूर ने करवायी जो मेनका की रिश्तेदार थीं. वर्ष 1973 में दोनों की मुलाक़ात विनू की शादी की पार्टी में हुई थी. इसके बाद दोनों में प्रेम का परवान चढ़ा और अगले ही वर्ष दोनों की सगाई हो गई. फिर 23 सितम्बर 1974 को दोनों ने शादी रचा ली. इस सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि शादी के बाद मेनका गाँधी के अंश को बॉम्बे डाईंग के विज्ञापन से हटा दिया गया था जिसकी वजह संजय गाँधी की आपत्ति थी. शादी के बाद संजय और मेनका गाँधी देश के राजनीतिक पटल पर एक पावरफुल कपल के तौर पर उभरे थे. मेनका संजय के साथ हर दौरे में जाती थीं, चाहे वह राजनीतिक हो या गैर राजनीतिक. आगे जाकर मेनका ने राजनीति में भी रूचि लेना शुरू कर दिया और संजय के साथ कांग्रेस पार्टी को मजबूती देने के लिए उन्होंने ‘सूर्या’ नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था.

मृत्यु और विरासत (Sanjay Gandhi death) –

संजय गाँधी हवाई जहाज उड़ाने के शौक़ीन थे. 23 जून 1980 को वह दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट पर दिल्ली फ्लाइंग क्लब के नए जहाज को उड़ा रहे थे. जहाज को हवा में कलाबाजी दिखाने के दौरान वे नियंत्रण खो बैठे और जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इस दुर्घटना में वह अकाल मृत्यु के शिकार हो गए. संजय की मृत्यु से तीन महीने पूर्व मेनका ने एक बच्चे को जन्म दिया था जिसका नाम उन्होंने वरुण गाँधी रखा. संजय की मृत्यु के पश्चात गाँधी परिवार में इंदिरा और मेनका के बीच विवादों का दौर शुरू हो गया. अंततः 1981 में मेनका अपने बेटे वरुण के साथ हमेशा के लिए गाँधी परिवार से अलग हो गईं. आज माँ-बेटा दोनों राजनीति में हैं और भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं.

यह कहना गलत नहीं होगा कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में संजय गाँधी एक ऐसे राजनेता थे जो महत्वाकांक्षी तो थे ही, वह दूरदृष्टि भी थे. उन्होंने देश को जो योजनाएं दी थी उन्हें अगर तरीके से लागू किया जाता तो देश का कायाकल्प हो सकता था. विवादित व्यक्तित्व होने के बावजूद उनकी जीवनी और क्रियाकलापों के बारे में जानने की जिज्ञासा आज भी हम भारतीयों के मन हिलकोरें मार रहा है.

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अंकिता दीपावली की डिजाईन, डेवलपमेंट और आर्टिकल के सर्च इंजन की विशेषग्य है| ये इस साईट की एडमिन है| इनको वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ और कभी कभी आर्टिकल लिखना पसंद है|
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