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जीरो बजट प्राकृतिक खेती क्या है | Zero Budget Natural Farming (ZBNF) In Hindi

जानिए क्या है जीरो बजट प्राकृतिक खेती (Zero Budget Natural Farming (ZBNF) in India In Hindi)

हमारे देश में कई किसानों ने जीरो बजट प्राकृतिक खेती (जेडबीएनएफ) के तहत खेती करना शुरू कर दिया है और काफी कम समय के अंदर ही जीरो बजट प्राकृतिक खेती हमारे देश में काफी लोकप्रिय भी होती जा रही है. जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत किसान केवल उनके द्वारा बनाई गई खाद और अन्य चीजों का प्रयोग खेती के दौरान करते हैं. जीरो बजट प्राकृतिक खेती करने में किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती है.

Zero Budget Natural Farming

इस खेती के तहत उगाई गई फसल सेहत के लिए हेल्दी भी होती है, क्योंकि इन फसलों को उगाने में किसी भी प्रकार के रासायनिक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. इस वक्त हमारे देश के कुछ राज्यों द्वारा जीरो बजट प्राकृतिक खेती को अपना लिया गया है और आने वाले समय में उम्मीद है कि ये खेती भारत के पूरे राज्यों में भी की जाने लगेगी.

क्यों रखा गया जीरो बजट प्राकृतिक खेती नाम

इस तकनीक के तहत खेती करने के लिए किसानों को बाजार से किसी भी प्रकार के केमिकल्स को खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है. जिसके कारण जीरो बजट प्राकृतिक खेती करने के दौरान शून्य रुपए का खर्चा (zero  net cost of production) आता है और इसलिए इस खेती को जीरो बजट प्राकृतिक खेती का नाम दिया गया है. हालांकि इस प्रकार की खेती करने के दौरान खाद बनाने में थोड़ा खर्चा आता है.

क्या होती है जीरो बजट प्राकृतिक खेती

जीरो बजट प्राकृतिक खेती, एक कृषि अभ्यास है जिसमें उर्वरकों और कीटनाशकों या अन्य केमिकल तत्वों का प्रयोग किए बिना फसलों को उगाया जाता है. जीरो बजट प्राकृतिक खेती तकनीक के तहत खेती कर, जो फसल उगाई जाती उनका विकास करने के लिए केमिकल की जगह प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल किया जाती है और ये खाद खुद से तैयार की जाती है.

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के फायदे (Benefits)

कम लागत लगती है

जीरो बजट प्राकृतिक खेती तकनीक के जरिए जो किसान खेती करते हैं उन्हें किसी भी प्रकार के केमिकल और कीटनाशकों तत्वों को खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है और इस तकनीक में किसान केवल अपने द्वारा बनाई गई चीजों का इस्तेमाल केमिकल की जगह करते हैं. जिसके चलते इस प्रकार की खेती करने के दौरान कम लागत लगती है.

जमीन के लिए फायदेमंद

केमिकल और कीटनाशकों तत्वों का इस्तेमाल खेती के दौरान इसलिए किया जाता है ताकि फसलों में किसी भी प्रकार का कीड़ा ना लग सके और फसल का अच्छे से विकास हो सके. हालांकि जब किसानों द्वारा केमिकल और कीटनाशकों तत्वों का छिड़काव फसलों पर किया जाता है, तो इनके कारण जमीन के उपजाऊपन को नुकसान पहुंचता है और कुछ समय बाद जमीन पर फसलों की पैदावार अच्छे से नहीं हो पाता है. मगर जीरो बजट प्राकृतिक खेती तकनीक का इस्तेमाल किसानों द्वारा खेती के दौरान किया जाए तो इसकी मदद से जमीन का उपजाऊपन बना रहता हैं और फसलों की पैदावार अच्छी होती है.

मुनाफा ज्यादा होता है

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत केवल खुद से बनाई कई खाद का इस्तेमाल किया जाता है और ऐसा होने से किसानों को किसी भी फसल को उगाने में कम खर्चा आता है और कम लागत लगने के कारण उस फसल पर किसानों को अधिक मुनाफा होता है.

अच्छी पैदावार होती है

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत जो फसल उगाई जाती है उसकी पैदावार काफी अच्छी होती है. इसलिए अगर आपको लग रहा है कि जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत खेती करने से फसलों की पैदावार कम होगी तो ऐसा बिल्कुल नहीं है.

कैसे शुरू हुई भारत में जीरो बजट प्राकृतिक खेती

भारत में इस खेती की शुरूआत सबसे पहले दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में हुई थी और धीरे धीरे ये खेती भारत के अन्य राज्य में भी प्रसिद्ध होने लगी है. इस खेती की शुरूआत कर्नाटक राज्य में सुभाष पालेकर ने स्टेट फार्मर्स एसोसिएशन कर्नाटक राज्य रैथा संघ (KRRS), और मेंबर ऑफ ला वाया कम्पेसिना (Member Off La Via Compassina) के साथ मिलकर की थी. इस वक्त कनार्टक के करीब एक लाख किसानों ने इस खेती की तकनीक को अपना लिया है और अनुमान है कि आने वाले समय में ये संख्या और अधिक हो जाएगी.
कौन हैं सुभाष पालेकर (Subhash Palekar)

सुभाष पालेकर एक पूर्व कृषि वैज्ञानिक हैं और इन्होंने पारंपरिक भारतीय कृषि प्रथाओं को लेकर कई रिसर्च की हुई है. इन रिसर्च की मदद से ही इन्होंने जीरो बजट प्राकृतिक खेती किस प्रकार से की जाती हैं इस पर अध्ययन किया था. अध्ययन के बाद इन्हें 60 से अधिक विभिन्न भारतीय भाषाओं में जीरो बजट प्राकृतिक खेती के ऊपर किताबें भी लिख रखी हैं. इन सभी किताबों में जीरो बजट प्राकृतिक खेती के बारे में इन्होंने विस्तार से जानकारी दे रखी है. इन किताबों की मदद से कोई भी किसान  जीरो बजट प्राकृतिक खेती किस तरह से की जाती है ये जानकारी हासिल कर सकता है.

जेडबीएनएफ के चार स्तंभ –

जीरो बजट प्राकृतिक खेती को करने के लिए नीचे बताई गई चार तकनीकों का प्रयोग खेती करने के दौरान किया जाता है.

जीवामृत / जीवनमूर्ति (Jivamrita) –

जिवामिता या जीवनमूर्ति की मदद से जमीन को पोषक तत्व मिलते हैं और ये एक उत्प्रेरक एजेंट (catalytic agent) के रूप में कार्य करता है, जिसके वजह से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ जाती है और फसलों की पैदावार अच्छे से होती है.  इसके अलावा जीवामृत की मदद से पेड़ों और पौधों को कवक और जीवाणु संयंत्र रोग होने से भी बचाया जा सकता है.

जीवामृत बनाने की विधि (Method)

एक बैरल में 200 लीटर पानी डालें और उसमें 10 किलो ताजा गाय का गोबर, 5 से 10 लीटर वृद्ध गाय का मूत्र, 2 किलो पल्स का आटा, 2 किलो ब्राउन शुगर और मट्टी को मिला दें. ये सब चीजे मिलाने के बाद आप इस मिश्रण को 48 घंटों के लिए छाया में रख दें. 48 घंटों तक छाया में रखने के बाद आपका ये मिश्रण इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो जाएगा.

किस तरह से इस्तेमाल करें इस मिश्रण को

एक एकड़ जमीन के लिए आपको 200 लीटर जीवामृत मिश्रण की जरूरत पडेगी और किसान को अपनी फसलों को महीने में दो बार जीवामृत का छिड़काव देना होगा. किसान चाहें तो सिंचाई के पानी में इसे मिलकर भी फसलों पर छिड़काव दे सकते हैं.

बीजामृत/ बीजामूर्ति (Bijamrita/beejamrutha)

इस उपचार का इस्तेमाल नए पौधे के बीज  रोपण के दौरान किया जाता है और बीजामृत की मदद से नए पौधों की जड़ों को कवक, मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारी और बीजों की बीमारियां से बचाया जाता है. बीजामृत को बनाने के लिए गाय का गोबर, एक शक्तिशाली प्राकृतिक कवकनाश, गाय मूत्र, एंटी-बैक्टीरिया तरल, नींबू और मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है.

किस तरह से इस्तेमाल करें इस मिश्रण को

किसी भी फसल के बीजों को बोने से पहले उन बीजों में आप बीजामृत अच्छे से लगा दें और ये लगाने के बाद उन बीजों को कुछ देर सूखने के लिए छोड़ दें. इन बीजों पर लगा बीजामृत का मिश्रण सूख जाने के बाद आप इनको जमीन में बो सकते है.

आच्छादन मल्चिंग (Acchadana  Mulching)

मिट्टी की नमी का संरक्षण करने के लिए और उसकी प्रजनन क्षमता को बनाए रखने के लिए मल्चिंग का सहारा लिया जाता है. मल्च प्रक्रिया के अंदर मिट्टी की सतह पर कई तरह के मटेरियल लगाए जाते हैं. ताकि खेती के दौरान मिट्टी को गुणवत्ता को नुकसान ना पहुंचे. मल्चिंग तीन प्रकार की होती हैं जो कि मिट्टी मल्च, स्ट्रॉ मल्च और लाइव मल्च है.

स्ट्रॉ मल्च – खेती के दौरान मिट्टी की ऊपरी सतह को कोई नुकसान ना पहुंचाने इसलिए मिट्टी मल्च का प्रयोग किया जाता है और मिट्टी के आसपास और मिट्टी को इक्ट्ठा करके रखा जाता है, ताकि मिट्टी की जल प्रतिधारण क्षमता को और अच्छा बनाया जा सके.

स्ट्रॉ मल्च- स्ट्रॉ (भूसा) सबसे अच्छी मल्च सामग्री में से एक है और भूसे मल्च का उपयोग सब्जी के पौधों की खेती में अधिक किया जाता है. कोई भी किसान चावल के भूसे और गेहूं के भूसे का उपयोग सब्जी की खेती के दौरान कर अच्छी सब्जियों की फसल पा सकता है और मिट्टी की गुणवत्ता को भी सही रख सकता है.

लाइव मल्चिंग लाइव मल्चिंग प्रक्रिया के अंदर एक खेत में एक साथ कई तरह के पौधे लगाए जाते हैं और ये सभी पौधे एक दूरे पौधों की बढ़ने में मदद करते हैं. उदाहरण के लिए, कॉफी और लौंग के पेड़ को बढ़ने के लिए फुल सनलाइट की जरूरत नहीं पड़ती है. वहीं गेहूं, गन्ना, बाजरा, रागी और मक्के के पौधे केवल फुल सनलाइट में ही बड़े हो सकते हैं. इसलिए लाइव मल्चिंग प्रक्रिया के अंदर ऐसे दो पौधे को एक साथ लगा दिया जाता है जिनमें से कुछ ऐसे पौधे होते हैं जो कि कम धूप लेने वाले पौधों को अपनी छाया प्रदान करते हैं और ऐसा होने से पौधा का अच्छे से विकास हो पता है.

व्हापासा (Whapasa , moisture)

सुभाष पालेकर द्वारा लिखी गई किताबों के अंदर कहा गया है कि पौधों को बढ़ने के लिए अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है और पौधे व्हापासा यानी भाप की मदद से भी बढ़ सकते हैं. व्हापासा वह स्थिति होती है जिसमें हवा अणु हैं और पानी के अणु मिट्टी में मौजूद होते है और इन दोनों अणु की मदद से पौधे का विकास हो जाता है.

किन राज्य ने अपनाया इस खेती को

  • भारत का आंध्र प्रदेश राज्य पहला ऐसा राज्य है जिसने जीरो बजट प्राकृतिक खेती को पूरी तरह से अपना लिया है और साल 2024 तक आंध्र प्रदेश सरकार ने जीरो बजट प्राकृतिक खेती को हर गांवों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है.
  • इस राज्य की सरकार ने साल 2015 में सबसे पहले इस तकनीक का प्रयोग कुछ गांव में किया था और जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत, खेती करने से इन गांवों के किसानों को फायदा भी पहुंचा था. जिसके बाद इस खेती को यहां की सरकार द्वारा और बढ़ावा दिया गया.
  • इस वक्त आंध्र प्रदेश के लगभग पांच लाख किसानों ने जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत खेती करना शुरू भी कर दिया है.
  • वहीं हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार ने भी जीरो बजट प्राकृतिक खेती को अपने राज्य में बढ़ावा देने के एक परियोजना शुरू कर दी है.

 जीरो बजट प्राकृतिक खेती के प्रसिद्ध होने के कारण अब हमारे देश में केमिकल्स का इस्तेमाल खेती के दौरान धीरे धीरे बंद होने लगा है. कई राज्य जीरो बजट प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में भी लगे हुए हैं, ताकि उनके राज्य के किसान भी केमिकल्स की जगह प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल कर खेती करने के लिए प्रोत्साहित हों सकें.

 

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