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कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित, जीवन परिचय व जयंती | Kabir ke Dohe and Poem Jayanti in hindi

कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित, जीवन परिचय व जयंती | Kabir ke Dohe and Poem Jayanti in hindi

कबीर शब्द का अर्थ इस्लाम के अनुसार महान होता है. वह एक बहुत बड़े अध्यात्मिक व्यक्ति थे जोकि साधू का जीवन व्यतीत करने लगे, उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण उन्हें पूरी दुनिया की प्रसिद्धि प्राप्त हुई. कबीर हमेशा जीवन के कर्म में विश्वास करते थे वह कभी भी अल्लाह और राम के बीच भेद नहीं करते थे. उन्होंने हमेशा अपने उपदेश में इस बात का जिक्र किया कि ये दोनों एक ही भगवान के दो अलग नाम है. उन्होंने लोगों को उच्च जाति और नीच जाति या किसी भी धर्म को नकारते हुए भाईचारे के एक धर्म को मानने के लिए प्रेरित किया. कबीर दास ने अपने लेखन से भक्ति आन्दोलन को चलाया है. कबीर पंथ नामक एक धार्मिक समुदाय है, जो कबीर के अनुयायी है उनका ये मानना है कि उन्होंने संत कबीर सम्प्रदाय का निर्माण किया है. इस सम्प्रदाय के लोगों को कबीर पंथी कहा जाता है जो कि पुरे देश में फैले हुए है.

कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित   (Kabir ke dohe Meaning in Hindi)

SN कबीर के दोहे  कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित
1 बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

जब मेने इन संसार में बुराई को ढूढा तब मुझे कोई बुरा नहीं मिला जब मेने खुद का विचार किया तो मुझसे बड़ी बुराई नहीं मिली . दुसरो में अच्छा बुरा देखने वाला व्यक्ति सदैव खुद को नहीं जनता . जो दुसरो में बुराई ढूंढते है वास्तव में वहीँ सबसे बड़ी बुराई है .
2 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

उच्च ज्ञान प्राप्त करने पर भी हर कोई विद्वान् नहीं हो जाता . अक्षर ज्ञान होने के बाद भी अगर उसका महत्त्व ना जान पाए, ज्ञान की करुणा को जो जीवन में न उतार पाए  तो वो अज्ञानी ही है लेकिन जो प्रेम के ज्ञान को जान गया, जिसने प्यार की भाषा को अपना लिया वह बिना अक्षर ज्ञान के विद्वान हो जाता है.
3 धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

धीरज ही जीवन का आधार हैं,जीवन के हर दौर में धीरज का होना जरुरी है फिर वह विद्यार्थी जीवन हो, वैवाहिक जीवन हो या व्यापारिक जीवन . कबीर ने कहा है अगर कोई माली किसी पौधे को 100  घड़े पानी भी डाले तो वह एक दिन में बड़ा नहीं होता और नाही बिन मौसम फल देता है . हर बात का एक निश्चित वक्त होता है जिसको प्राप्त करने के लिए व्यक्ति में धीरज का होना आवश्यक है .
4 जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

किसी भी व्यक्ति की जाति से उसके ज्ञान का बोध नहीं किया जा सकता , किसी सज्जन की सज्नता का अनुमान भी उसकी जाति से नहीं लगाया जा सकता इसलिए किसी से उसकी जाति पूछना व्यर्थ है उसका ज्ञान और व्यवहार ही अनमोल है  . जैसे किसी तलवार का अपना महत्व है पर म्यान का कोई महत्व नहीं, म्यान महज़ उसका उपरी आवरण  है जैसे जाति मनुष्य का केवल एक शाब्दिक नाम . 
5 बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

जिसे बोल का महत्व पता है वह बिना शब्दों को तोले नहीं बोलता  . कहते है कि कमान से छुटा तीर और मुंह से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते इसलिए इन्हें बिना सोचे-समझे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए . जीवन में वक्त बीत जाता है पर शब्दों के बाण जीवन को रोक देते है . इसलिए वाणि में नियंत्रण और मिठास का होना जरुरी है .
6 चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।

जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

कबीर ने अपने इस दोहे में बहुत ही उपयोगी और समझने योग्य बात लिखी हैं कि इस दुनियाँ में जिस व्यक्ति को पाने की इच्छा हैं उसे उस चीज को पाने की ही चिंता हैं, मिल जाने पर उसे खो देने की चिंता हैं वो हर पल बैचेन हैं जिसके पास खोने को कुछ हैं लेकिन इस दुनियाँ में वही खुश हैं जिसके पास कुछ नहीं, उसे खोने का डर नहीं, उसे पाने की चिंता नहीं, ऐसा व्यक्ति ही इस दुनियाँ का राजा हैं .
7 माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥

 बहुत ही बड़ी बात को कबीर दास जी ने बड़ी सहजता से कहा दिया . उन्होंने कुम्हार और उसकी कला को लेकर कहा हैं कि मिट्टी एक दिन कुम्हार से कहती हैं कि तू क्या मुझे कूट कूट कर आकार दे रहा हैं एक दिन आएगा जब तू खुद मुझ में मिल कर निराकार हो जायेगा अर्थात कितना भी कर्मकांड कर लो एक दिन मिट्टी में ही समाना हैं .
8 माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । 

कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

 कबीर दास जी कहते हैं कि लोग सदियों तक मन की शांति के लिये माला हाथ में लेकर ईश्वर की भक्ति करते हैं लेकिन फिर भी उनका मन शांत नहीं होता इसलिये कवी कबीर दास कहते हैं – हे मनुष्य इस माला को जप कर मन की शांति ढूंढने के बजाय तू दो पल अपने मन को टटौल, उसकी सुन देख तुझे अपने आप ही शांति महसूस होने लगेगी .
9 तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय । 

कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

 कबीर दास कहते हैं जैसे धरती पर पड़ा तिनका आपको कभी कोई कष्ट नहीं पहुँचाता लेकिन जब वही तिनका उड़ कर आँख में चला जाये तो बहुत कष्टदायी हो जाता हैं अर्थात जीवन के क्षेत्र में किसी को भी तुच्छ अथवा कमजोर समझने की गलती ना करे जीवन के क्षेत्र में कब कौन क्या कर जाये कहा नहीं जा सकता .
10 गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । 

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

 कबीर दास ने यहाँ गुरु के स्थान का वर्णन किया हैं वे कहते हैं कि जब गुरु और स्वयं ईश्वर एक साथ हो तब किसका पहले अभिवादन करे अर्थात दोनों में से किसे पहला स्थान दे ? इस पर कबीर कहते हैं कि जिस गुरु ने ईश्वर का महत्व सिखाया हैं जिसने ईश्वर से मिलाया हैं वही श्रेष्ठ हैं क्यूंकि उसने ही तुम्हे ईश्वर क्या हैं बताया हैं और उसने ही तुम्हे इस लायक बनाया हैं कि आज तुम ईश्वर के सामने खड़े हो .
11 सुख में सुमिरन सब करै दुख में करै न कोई| जो दुख में सुमिरन करै तो दुख काहे होई ।।  कबीर दास जी कहते हैं जब मनुष्य जीवन में सुख आता हैं तब वो ईश्वर को याद नहीं करता लेकिन जैसे ही दुःख आता हैं वो दौड़ा दौड़ा ईश्वर के चरणों में आ जाता हैं फिर आप ही बताये कि ऐसे भक्त की पीड़ा को कौन सुनेगा ?
12 धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । 

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

 कबीर दास जी कहते हैं कि इस दुनियाँ में जो भी करना चाहते हो वो धीरे-धीरे होता हैं अर्थात कर्म के बाद फल क्षणों में नहीं मिलता जैसे एक माली किसी पौधे को जब तक सो घड़े पानी नहीं देता तब तक ऋतू में फल नही आता 
 13 साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय । 

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

 कबीर दास कहते हैं कि प्रभु इतनी कृपा करना कि जिसमे मेरा परिवार सुख से रहे और ना मै भूखा रहू और न ही कोई सदाचारी मनुष्य भी भूखा ना सोये . यहाँ कवी ने परिवार में संसार की इच्छा रखी हैं .
14  कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और । 

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

 कबीर दास जी ने इस दोहे में जीवन में गुरु का क्या महत्व हैं वो बताया हैं . वे कहते हैं कि मनुष्य तो अँधा हैं सब कुछ गुरु ही बताता हैं अगर ईश्वर नाराज हो जाए तो गुरु एक डोर हैं जो ईश्वर से मिला देती हैं लेकिन अगर गुरु ही नाराज हो जाए तो कोई डोर नही होती जो सहारा दे .
15  माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर 

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर 

कविवर कबीरदास कहते हैं मनुष्य की इच्छा, उसका एश्वर्य अर्थात धन सब कुछ नष्ट होता हैं यहाँ तक की शरीर भी नष्ट हो जाता हैं लेकिन फिर भी आशा और भोग की आस नहीं मरती .
16  दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय

जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय 

 कबीर दास जी कहते हैं प्रभु को सभी दुःख तकलीफ में याद करता हैं लेकिन जब प्रभु उस दुःख को दूर करके सुख देते हैं तब मनुष्य पभु को ही भूल जाता हैं अगर मनुष्य सुख में भी प्रभु का चिंतन करे तो उसे कभी दुःख की प्राप्ति ही ना हो .
 17 बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर

पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर

 कबीरदास जी ने बहुत ही अनमोल शब्द कहे हैं कि यूँही बड़ा कद होने से कुछ नहीं होता क्यूंकि बड़ा तो खजूर का पेड़ भी हैं लेकिन उसकी छाया राहगीर को दो पल का सुकून नही दे सकती और उसके फल इतने दूर हैं कि उन तक आसानी से पहुंचा नहीं जा सकता . इसलिए कबीर दास जी कहते हैं ऐसे बड़े होने का कोई फायदा नहीं, दिल से और कर्मो से जो बड़ा होता हैं वही सच्चा बड़प्पन कहलाता हैं .


संत कबीर दास का जन्म, मृत्यु और पारिवारिक जीवन (S
ant Kabir das birth, death and family)

कबीर दास का जन्म सन 1440 में हुआ था और 1518 में इनकी मृत्यु हो गयी थी. कबीर दास के माता पिता के बारे में कोई जानकारी नहीं है हालाँकि ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म हिन्दू धर्म के समुदाय में हुआ था, लेकिन उनका पालन पोषण एक गरीब मुस्लिम परिवार के द्वारा किया गया था. जिस दम्पति ने उनका पालन किया था उनके नाम नीरू और नीमा थे, कबीर उन्हें वाराणसी के लहरतारा के छोटे से शहर में मिले थे. ये दम्पति बहुत ही गरीब मुस्लिम बुनकर होने के साथ ही अशिक्षित भी थे, लेकिन उन्होंने बड़े प्यार से कबीर को पाला था, वह उनके पास एक साधारण और संतुलित जीवन व्यतीत कर रहे थे. ऐसा माना जाता है कि संत कबीर का परिवार अभी भी वाराणसी के कबीर चौरा में रह रहा है.  

कबीरदास का जीवन परिचय (Kabir Das Life Introduction)

SN बिंदु कबीरदास परिचय
1 जन्म 1440 वाराणसी
2 मृत्यु 1518 मघर
3 प्रसिद्धी कवी, संत
4 धर्म इस्लाम
5 रचना कबीर ग्रन्थावली, अनुराग सागर, सखी ग्रन्थ,बीजक

Kabir das ke Dohe

संत कबीर दास की शिक्षा (Sant Kabir das education)

माना जाता है कि संत कबीर दास की शुरूआती शिक्षा उनको रामानंद जो उनके बचपन के गुरु थे, उन्होंने दी थी. कबीर ने उनसे अध्यात्मिक प्रशिक्षण को प्राप्त किया और बाद में वो उनके प्रसिद्ध प्रिय शिष्य बन गए. उनके बचपन के किस्से में यह माना जाता है कि रामानंद उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते थे, लेकिन एक सुबह जब रामानंद स्नान करने जा रहे थे तब उस वक्त कबीर तालाब की सीढियों पर बैठ कर रामा रामा मंत्र का जाप कर रहे थे, अचानक रामानंद ने देखा कि कबीर उनके पैरों के नीचे है तब वो अपने आप को दोषी महसूस करते हुए उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिए. व्यावसायिक रूप से उन्होंने कभी भी कोई कक्षाओं में जाकर अध्ययन नहीं किया, लेकिन रहस्यमयी रूप से वो बहुत जानकर व्यक्ति थे. उन्होंने व्रज, अवधि और भोजपुरी जैसी कई औपचारिक भाषाओं में दोहों को लिखा था.   

संत कबीर दास के विचार (Sant Kabir das thoughts)

कबीर दास पहले ऐसे संत है जिन्होंने हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म दोनों के लिए सार्वभौमिक रूप को अपनाते हुए दोनों धर्म का पालन किया. उनके अनुसार जीवन और परमात्मा का अध्यात्मिक सबंध है और मोक्ष के बारे में उन्होंने ये विचार व्यक्त किये कि जीवन और परमात्मा इन दो दिव्य सिद्धांत को यह एकजुट करने की प्रक्रिया है. व्यक्तिगत रूप से कबीर ने केवल ईश्वर में एकता का अनुसरण किया, लेकिन उन्होंने हिन्दू धर्म के मूर्ति पूजा में कोई विश्वास नहीं दिखाया. उन्होंने भक्ति और सूफी विचारों के प्रति विश्वास दिखाया. उन्होंने लोगों को प्रेरित करने के लिए अपने दार्शनिक विचारों को दिया.    

संत कबीर दास का व्यक्तिगत जीवन (Sant Kabir das)  

कुछ ने उप व्याख्यायित किया है कि कबीर ने कभी भी शादी नहीं की थी वो हमेशा अविवाहित जीवन ही व्यतीत किये थे, लेकिन कुछ विद्वानों ने साहित्य निष्कर्ष निकालते हुए ये दावा किया है कि कबीर ने शादी की थी, और उनकी पत्नी का नाम धारिया था. साथ ही उन्होंने ये भी दावा किया कि उनके एक पुत्र जिसका नाम कमल था और एक पुत्री भी थी जिसका नाम कमली था.  

संत कबीर दास के कार्य (Work of Sant Kabir das)  

कबीर और उनके अनुयायियों ने अपनी मौखिक रूप से रचित कविता को बावंस कहा. कबीर दास की भाषा और लेखन की शैली सरल और सुन्दर है जो की अर्थ और महत्व से परिपूर्ण है. उनके लेखन में सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण के विरोध में हमेशा लोगों के लिए सन्देश रहता था. उनके द्वारा लिखे दोहे बहुत ही स्वभाविक है जो कि उन्होंने दिल की गहराई से लिखा था. उहोने बहुत से प्रेरणादायी दोहों को साधारण शब्दों में अभिव्यक्त किया था. कबीर दास के द्वारा कुल 70 रचनाये लिखी गयी है, जिनमे अधिकांशतः उनके दोहे और गानों के संग्रह है. कबीर निर्गुण भक्ति के प्रति समर्पित थे कबीर दास ने बहुत सी रचनायें की है जिनमे से उनके कुछ प्रसिद्ध लेखन है बीजक, कबीर ग्रंथावली, अनुराग सागर, सखी ग्रन्थ, सबदास, वसंत, सुकनिधन, मंगल, सखीस और पवित्र अग्नि इत्यादि है.

संत कबीर दास की आलोचना

कबीर के द्वारा एक महिला मनुष्य के अध्यात्मिक प्रगति को रोकती है जब वह व्यक्ति के पास आती है तो भक्ति, मुक्ति और दिव्य ज्ञान उस व्यक्ति की आत्मा में समाहित नहीं हो पाते है, वह सब कुछ नष्ट कर देती है. जिसके लिए उनकी आलोचना की गयी है निक्की गुनिंदर सिंह के अनुसार कबीर की राय महिलाओं के लिए अपमानजनक और अवज्ञाकारी है. वेंडी दोनिगेर के अनुसार कबीर महिलाओं को लेकर एक मिथाक्वादी पूर्वाग्रह से ग्रसित थे.  

संत कबीर दास जयंती 2018 में कब है (Sant Kabir das jayanti 2018 Date)

संत कबीर दास की जयंती हिन्दू चन्द्र कैलेंडर के अनुसार जयंता पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, और ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह मई जून के महीनों में मनाया जाता है. संत कबीर दास जयंती एक वार्षिक कार्यक्रम है, जो प्रसिद्ध संत, कवि और सामाजिक सुधारक कबीर दास के सम्मान में मनाया जाता है. यह पुरे भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. कबीर की 641 वीं जयंती इस साल यानि 27 जून 2018 को पूर्णिमा तिथि को 8.12 मिनट से शुरू होकर 28 जून को 10.22 मिनट पर समाप्त होगी. हिन्दू कैलेंडर के महीनों के नाम व उनका महत्व यहाँ पढ़ें.

संत कबीर दास जयंती मनाने का तरीका (Sant Kabir das jayanti celebration)

कबीर दास जयंती के अवसर पर कबीर पंथ के अनुयायी उस दिन कबीर के दोहे को पढ़ते है और उनसे शिक्षा से सबक लेते है. विभिन्न स्थानों पर सत्संग का आयोजन और बैठक करते है. इस दिन खास करके उनके जन्म स्थान वाराणसी के कबीर चौथा मठ में धार्मिक उपदेश आयोजित किये जाते है, साथ ही देश के अलग अलग भागों के विभिन्न मंदिरों में कबीर दास जयंती का उत्सव मनाया जाता है. कुछ जगह कबीर दास जयंती के अवसर पर शोभायात्रा भी निकली जाती है, जोकि एक विशेष स्थान से शुरू होकर कबीर मंदिर तक आ कर ख़त्म हो जाती है.

संत कबीर दास की उपलब्धि (Sant Kabir das achievement)

कबीर दास की हर धर्म के व्यक्ति के द्वारा प्रशंसा कि जाती है उनकी दी हुई शिक्षा आज भी नई पीढ़ियों के लिए प्रासंगिक और जीवित है. उन्होंने कभी भी किसी धार्मिक भेदभाव पर विश्वास नहीं किया था इस तरह के महान कृत्यों के कारण ही उन्हें संत की उपाधि उनके गुरु रामानंद ने दी थी.              

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Karnika

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
Karnika

43 comments

  1. Kindly correct, Kabir was not Muslim He was Hindu.

  2. Kabir’s religion was not “Islam”. He was taken care of by Neeru Neema weaver. His Guru was Ramanand.

  3. Kabir ke dohe mujhe bahut hee pasand hai
    I love kabir ke dohe

  4. Sant Kabir Das Ji Ne Jo Dohe Likhe Hain ,Hum Agar Yeh Dohe Ko Apne Life Me Utaarte Hain,
    Toh Humlog V Ek Achchha Insaaniyat Nibha Sakte Hain…
    Dohe Bahut Pasand Hai…

  5. I like it. Kabir sabad.

  6. Truely inspiring
    Lovely thoughts
    👌👌🖒🖒👏👏👏

  7. कबीर जी के दोहै पढ़ने के बाद मन को बहुत शांती मिलती है

  8. Its no doubts touches the soul, gives the pleasure and internal satisfaction about life and behavior.

  9. Dosto…kabir ko kabhi days Nahi lagta or Nahi unka janm huva he or Nahi vo kavi the…vo to duniya me fele aadambar ko samapt karne Ke liye kashi me lahar talab me Kamal Ke ful par prakat huve the..(pani se peda nahi swasa nahi sharir ann aahar karta nahi taka naam kabir )or vo kisi darm Ke Nahi the.(Hindu ka guru musalman ka pir sat dip no khand me Soham satkabir) krapakarke sahi jankari dale

  10. Aapka hardik abhinandan karta hoon ki aapne hume is prakaar ka gyan diya
    …..me bhut khush hoon ki mjhe kabeer ji ke dohe itne acchi tarah se samajh aaye….DHNYAWAAD AAPKA

  11. sadhvi shivani ji

    kabir das was not muslim ….

  12. गोपाल

    बहुत ही शानदार जानकारी दी है आपने ,
    आप तारीफ़ के काबिल काम करते है !

  13. राजेश अडवानी इंदौर

    कबीर जी के दोहे ऐसे है मानो जीवन का पूरा सार दो लाइन में कह दिया हो उनके इतने उच्च विचारो को मेरा कोटि कोटि नमन है

  14. JAB KABIR G K BARE ME KUCHH CLEAR NI HAI TO FR HM KAISE JKAH SAKTE HAI UNKA DHARM ESLAM HAI

  15. aapke web site pe bahut acche lekh hai .

    kabir ke doho ka arth bahut hi marmik hai jo ki saralta se samajh aa jata hai.

  16. शेलार किशोर

    कबीर जी के विचार मानवी जीवन के उद्धार है इसलिए मुझे ऐ पसंद है

  17. kabirdas ji ke dohe ush prakar hai jis tarh ek kamre me jalti hui rausni

  18. वर्षा प्रधान

    कबीर दास जी ने जो समस्त मानवीय चेतना को सूक्षमता को उतरने का प्रयास किया वो बहुत ही रोचक है।

  19. Dohe of kabir das ji giving right path for life and inspiring us to walk on those…

  20. Exillent…. sahi kaha kabeerdas ji apne aap m ek aisi shakshiyat h ki jinke bare m jitna kaha jaye, jitna bhi likha jaye km hi h….unhone bahut se dohe likhe h. gajal bhi likhi hai….. suprebb unke dohe dil ko sukun dene ka kam krte h….

  21. Yes kabir das thougt is big thought becouse dohe is touch feeling and important in our life .

  22. kabirdas ji ke dohe hamaare jivan ko prerana dete hai jinko hum apne jivan me anusaran karke apne jivan ko dhanya kar sakte hai

  23. bahuta acha he.

  24. nice ..but or bhi dhohe hone chahiye..

  25. Rajesh Kumar Kalyane

    “Sacha shabd kabir ka,sun kar lage aag.
    Agyani to jal mare, gyani jaye jaag.

    Saheb kabir ki vani ka tod kisi bhi yug me nahi hai.

  26. Ye Doha hamare Jivan ko jagane vale hai

  27. admin@hindikebol

    aapka yh artical hame sabse adhik psand aaya

  28. kabir ji aapne apne chote chote doho mai kitni badi baat kahi hai.
    really heart touch wording you are wrote.
    u r god.

  29. Wah kya gajab ke dohe. Aise kabir ke dohe Jo aaj bhi akatya hai

  30. mujhe kabir ke dohe bahut acche lagte hai.

  31. Apnea Kabir saheb ka dharm Muslim kis adhar par bataya he

  32. Dil ko shanti milne wala doha h

  33. Kabir Ke Dohe Bahut Hi Inspiring Hai,

  34. Kabir mana ke sabse bade sudharak the padhakar achchha lags u r best also

  35. ravi lal yadav

    bhut prernadayak

  36. kabir dass ji ke sabhi dohe acche hai. aap unke aaur dohe likhye

    • Bhuvaneshwar Singh

      Kabir ke dohes touches our feelings and sensatise us. We also repeat them according to the situation to motivate others Pl. upload His all dohes.I shall fel oblised.

  37. कबीर के दोहे बहुत अच्छे हैं पर पूर्ण संकलन होने चाहिए।

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