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नर्मदा जयंती का इतिहास व महत्त्व | Narmada Jyanti Festival Mahatv and history in hindi

Narmada Jyanti Festival Mahatv and history in hindi नर्मदा जयंती, भारत में हिन्दुओं द्वारा मनाया जाने वाला एक त्यौहार है. यह अमरकंटक में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है क्योंकि यह माँ नर्मदा का जन्म स्थान है. इसके अलावा यह पूरे मध्यप्रदेश में बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है. जनवरी माह में मनाये जाने वाले संक्रांति के त्यौहार के आस पास यह त्यौहार मनाया जाता है. हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से माघ माह की शुक्लपक्ष की सप्तमी को माँ नर्मदा का जन्म हुआ था इसलिए यह हर साल इस दिन मनाया जाता है. भारत में 7 धार्मिक नदियाँ हैं उन्हीं में से एक है माँ नर्मदा, हिन्दू धर्म में इसका बहुत मह्त्व है. कहा जाता है कि भगवन शिव ने देवताओं को उनके पाप धोने के लिए माँ नर्मदा को उत्पन्न किया था और इसलिए इसके पवित्र जल में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते है. इसके मह्त्व के बारे में इस आर्टिकल में पूरी जानकारी दी हुई है.

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नर्मदा जयंती का महत्त्व व इतिहास 

Narmada Jyanti Festival history and mahatv in hindi

माँ नर्मदा के जन्म का इतिहास (History of birth of Narmada) –

एक बार देवताओं ने अंधकासुर नाम के राक्षस का विनाश किया. उस समय उस राक्षस का वध करते हुए देवताओं ने बहुत से पाप भी किये. जिसके चलते देवता, भगवान् विष्णु और ब्रम्हा जी सभी, भगवान शिव के पास गए. उस समय भगवान शिव आराधना में लीन थे. देवताओं ने उनसे अनुरोध किया कि – “हे प्रभु राक्षसों का वध करने के दौरान हमसे बहुत पाप हुए है हमें उन पापों का नाश करने के लिए कोई मार्ग बताइए”. तब भगवान् शिव ने अपनी आँखें खोली और उनकी भौए से एक प्रकाशमय बिंदु पृथ्वी पर अमरकंटक के मैखल पर्वत पर गिरा जिससे एक कन्या ने जन्म लिया. वह बहुत ही रूपवान थी, इसलिए भगवान विष्णु और देवताओं ने उसका नाम नर्मदा रखा. इस तरह भगवान शिव द्वारा नर्मदा नदी को पापों के धोने के लिए उत्पन्न किया गया.

इसके अलावा उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर नर्मदा ने कई सालों तक भगवान् शिव की आराधना की, भगवान् शिव उनकी आराधना से प्रसन्न हुए तभी माँ नर्मदा ने उनसे ऐसे वरदान प्राप्त किये जो किसी और नदियों के पास नहीं है. वे वरदान यह थे कि –“ मेरा नाश किसी भी प्रकार की परिस्थिति में न हो चाहे प्रलय भी क्यों न आ जाये, मैं पृथ्वी पर एक मात्र ऐसी नदी रहूँ जो पापों का नाश करे, मेरा हर एक पत्थर बिना किसी प्राण प्रतिष्ठा के पूजा जाये, मेरे तट पर सभी देव और देवताओं का निवास रहे” आदि. इस कारण नर्मदा नदी का कभी विनाश नही हुआ, यह सभी के पापों को हरने वाली नदी है, इस नदी के पत्थरों को शिवलिंग के रूप में विराजमान किया जाता है इसका बहुत अधिक मह्त्व है और इसके तट पर देवताओं का निवास होने से कहा जाता है कि इसके दर्शन मात्र से ही पापों का विनाश हो जाता है. गंगा नदी का इतिहास, महत्व यहाँ पढ़ें.

इन सभी वरदानों के कारण माँ नर्मदा को हिन्दू धर्म में बहुत पूजा जाता है. वैसे इसके जन्म की और भी कथायें हैं. एक कथा के अनुसार कहा जाता है कि एक बार भगवान् शिव (ब्रम्हांड के विनाशक), घोर आराधना में लीन थे, जिससे उनके शरीर से पसीना निकलने लगा, वह एक नदी के रूप में बहने लगा और वही नदी नर्मदा बनी. तो एक कथा के अनुसार एक बार ब्रम्हा जी (ब्रम्हांड के निर्माता) किसी बात से दुखी थे, तभी उनके आंसुओं की 2 बूँद गिरी जिससे 2 नदियों का जन्म हुआ एक नर्मदा और दूसरी सोन. इसके अलावा नर्मदा पूराण में इनके रेवा कहे जाने के बारे में भी बताया गया है.

इस तरह इनके जन्म के मह्त्व की बहुत सी कथाएं हैं यह बहुत ही पवित्र नदी है इसलिए यह हिन्दुओ के बीच इनकी जन्मतिथि पर नर्मदा जयंदी के रूप में मनाया जाता हैं.

माँ नर्मदा का उद्गम एवं मार्ग (Origin and route of Narmada) –

नर्मदा नदी भारत के विंधयाचल और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों पर मध्यप्रदेश के अनूकपुर जिले के अमरकंटक नामक स्थान के एक कुंड से निकलती है. यह इन दोनों पर्वतों के बीच पश्चिम दिशा में बहती है. यह कुंड मंदिरों से घिरा हुआ है. यह भारतीय उपमहाद्वीप में पाँचवीं सबसे लम्बी नदी है, यह भारत की गोदावरी और कृष्णा नदी के बाद तीसरी ऐसी नदी है जोकि पूरे भारत के अंदर ही प्रवाहित होती है. इसे “मध्यप्रदेश की जीवन रेखा” भी कहा जाता है. यह उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच पारम्परिक सीमा के रूप में पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है. यह भारत की एक मात्र ऐसी नदी है जोकि पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है. इसकी कुल लम्बाई 1312 किमी की है और यह गुजरात के भरूच शहर से गुजरती हुई खम्भात की खाड़ी में जाकर गिरती है.

इस नदी के तटों में बहुत से तीर्थ स्थल है जहाँ लोग दर्शन करने आते है. यह नदी मध्यप्रदेश के साथ – साथ छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गुजरात राज्य में भी प्रवाहित होती है. माँ नर्मदा की परिक्रमा का भी प्रावधान है और यह एक मात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा होती है इसके आलवा और किसी नदी के बारे में ऐसा नहीं कहा गया. इसलिए इसके तट में रहने वाले श्रद्धालु इसके मह्त्व को समझते है और कहते है कि इसके दर्शन मात्र से ही पुण्य की प्राप्ति हो जाती है.

नर्मदा जयंती महोत्सव (Narmada Jyanti Festival)

नर्मदा जयंती महोत्सव एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है. इसकी भव्यता के बारे में सभी जानते हैं. नर्मदा जयंती महोत्सव माघ माह की शुक्लपक्ष सप्तमी तिथि को मनाया जाता है. जैसे ही यह अवसर आता है लोग कई हफ्तों पहले से ही इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं. इस साल यह 3 फरवरी को मनाया जायेगा. इस दिन नर्मदा तटों को सजाया जाता है, बहुत से पंडित, साधू – संत इस दिन हवन भी करते है. कई लोग इस दिन माँ नर्मदा को चुनरी भी चढ़ाते हैं. साथ में इस दिन भंडारा भी किया जाता है.

शाम के समय माँ नर्मदा के तट पर बहुत से कार्यक्रम आयोजित किये जाते है जोकि माँ नर्मदा की आराधना के रूप में होते है. लेकिन इससे पहले माँ नर्मदा की महा आरती की जाती है, इसका दृश्य तो देखते ही बनता है. दूर – दराज से लोग माँ नर्मदा की महा आरती में शामिल होने के लिए आते है ताकि उन्हें पुण्य की प्राप्ति हो सके और साथ ही वे इसका प्रसाद गृहण करते है, और सभी माँ नर्मदा की आराधना में लीन हो जाते है.

इस साल नर्मदा जयंती 3 फ़रवरी शुक्रवार 2017 को मनाई जाएगी. इस प्रकार माँ नर्मदा जयंती महोत्सव हर साल बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है.

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