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अयोध्या में राम मंदिर (जन्म भूमि ) का मुद्दा | Ayodhya Case Ram Mandir (Janmabhoomi) Issue in hindi

अयोध्या में राम मंदिर (जन्म भूमि ) का मुद्दा , विवाद  (बाबरी मस्जिद)| Ayodhya Case Ram Mandir (Janmabhoomi) Vivad Issue in hindi | राम जन्मभूमि का इतिहास (Babri Masjid)

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद या बाबरी मस्जिद विवाद भारत के कई लम्बे विवादों में एक है. इस विवाद की वजह से देश में कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जो लोगों को आज भी शोक में डाल देती हैं. यह मुद्दा एक तरफ तो कोर्ट में चलता रहा किन्तु दूसरी तरफ़ राजनेताओ ने अपनी तरह से इसका फायदा उठाने की कोशिश की, जिस वजह से देश में कई स्थान पर कई दंगे हुए और हजारों की संख्या में लोग मारे गये. यह केस अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चूका है, जहाँ से इसके फैसले आने बाकी हैं. इस विवाद से सम्बंधित सभी आवश्यक जानकारी यहाँ पर दी जा रही है.

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रामजन्मभूमि विवाद क्या है (What is Ram Mandir Issue) :                                                                        

कई हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में इस बात का उल्लेख प्राप्त होता है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था. भगवान राम हिन्दुओं के पूज्यनीय भगवानों में से एक हैं. उनका जन्म अयोध्या में हुआ और कालान्तर में उन्होंने अयोध्या पर राज भी किया. मध्यकालीन भारत में इस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण किया गया. यह मंदिर उस स्थान पर बनाया गया जहाँ पर भगवान राम का जन्म हुआ था. अतः इसे जन्मभूमि भी कहा जाता है. इसके बाद सन 1528 में यहाँ पर एक मस्जिद बनाई गयी. यह मस्जिद मीर बाक़ी द्वारा बनाई गयी थी, जो कि बाबर का एक आर्मी जनरल था. ग़ौरतलब है कि बाबर वर्ष 1526 में भारत में आया और उसके साथ मीर बाक़ी भी आया और अवध क्षेत्र को जीत कर वहाँ अपना शासन स्थापित किया.इसी समय मीर बाक़ी ने यहाँ पर एक मस्जिद बनायी, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना गया.चूँकि मीर बाक़ी बाबर के सेना का था और इस मस्जिद के बनने के पीछे बाबर की अहम भूमिका रही थी. अतः इसे बाबरी मस्जिद कहा जाता है. आरम्भ में इस मस्जिद को यहाँ की आम भाषा में मस्जिदे जन्मस्थान भी कहा जाता था..

बाबरी मस्जिद विवाद का इतिहास (Babari Masjid history in hindi):                                                               

बाबरी मस्जिद के विवाद की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के आस पास ही हो गयी थी. यह मस्जिद इस समय यहाँ पर बनी हुई थी. यहाँ के मुस्लिम इस मस्जिद के अन्दर जाकर अपनी इबादत करते थे और इसी के बाहर एक चबूतरा था, जहाँ पर हिन्दू अपनी पूजा अर्चना करते थे. इस वजह से यहाँ पर हिन्दू मुस्लिम विवाद का एक माहौल बनता रहा. सन 1853 के आस पास इस मस्जिद को लेकर स्थानीय दंगे होने शुरू हो गये. इस समय अंग्रेजों का शासन था. अंग्रेजों ने इस स्थान को फेंसिंग से घेर दिया ताकि एक तरफ मस्जिद के अन्दर जाकर मुस्लिम सजदे कर सकें और दूसरी तरफ हिन्दू पूजा पाठ आदि कर सकें. वर्ष 1885 में राम चबूतरा के महंत रघुवर दास के फैजाबाद कोर्ट में एक अपील की, कि इस चबूतरे पर मंदिर बनाने दिया जाये. चूँकि चबूतरे पर पूजा अर्चना एक लम्बे समय से की जा रही थी अतः इस स्थान पर इन्होने एक मंदिर बनाने की मांग की. हालाँकि कोर्ट की तरफ से यह अपील खारिज कर दी गयी. कोर्ट के जज ने कहा कि इस स्थान पर चूँकि 350 साल से यह मस्जिद खड़ी है, अतः इस स्थान पर अब मंदिर बनाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती.

वर्ष 1949 के घटनाक्रम

वर्ष 1949 में इस मस्जिद से सम्बद्ध कुछ अन्य घटनाएं घटीं. इस वर्ष 22/ 23 दिसम्बर की रात को इस मस्जिद में ज़बरदस्ती घुस कर रामलला (भगवान श्री राम का बाल रूप) की मुर्तियां यहाँ पर रख दीं और बात ये फैलाई गयी कि मस्जिद के अन्दर रामलला की मूर्ति प्रकट हुई है. इसके उपरान्त यहाँ के स्थानीय प्रशासन द्वारा इस स्थान को अपने देख रेख में ले लिया गया. दरअसल जब मुस्लिमों के यहाँ के स्थानीय ऑफिसर के के नायर को इस स्थान से मूर्ति हटवाने के लिए कहा, (क्योंकि मस्जिद में मुर्तियां नहीं होती) तो उन्होंने कहा कि यदि इस समय यहाँ से मूर्तियाँ हटायीं गयीं तो दंगे हो सकते हैं. अतः यह स्थान प्रशासन के अधीन ही रखा जाएगा.

जनवरी वर्ष 1950 में राम चबूतरे के तात्कालिक महंत रामचंद्र दास ने पुनः कोर्ट में याचिका दायर की और कहा कि चूँकि मस्जिद के अन्दर मूर्तियाँ भी स्वयं प्रकट हो गयीं हैं, अतः अब वहाँ पर यानि मस्जिद के अन्दर हिन्दुओं को पूजा अर्चना करने की अनुमती दी जाए. हालाँकि कोर्ट ने इस याचिका को पुनः खारिज कर दिया और निर्णय लिया कि इस मस्जिद के अन्दर किसी को भी जाने की अनुमति नहीं होगी. न तो मुश्लिमों को और न ही हिन्दुओं को. मस्जिद में प्रशासन ने ताला लगा दिया और अब न तो मुस्लिम इबादत के लिए अन्दर दाख़िल हो सकते थे और न ही हिन्दू.   

वर्ष 1959 के घटनाक्रम                              

चूँकि यह स्थान अब एक विवादित स्थान का रूप ले चूका था, अतः इस स्थान को लेकर अन्य तरह के विवाद भी सामने आने लगे थे. इस समय के विशेष घटनाक्रमों का वर्णन नीचे किया जा रहा है.

  • वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़ा नामक धार्मिक हिन्दू संस्था, जो कि भगवान् राम की भक्ति करती है और स्वयं इस स्थान पर मंदिर बनाने के लिए कई वर्षों से लड़ रही थी, उसने प्रशासन से मांग की कि इस स्थान की सभी देख रेख की जिम्मेवारियां उनके अधीन कर दी जाएँ. ग़ौरतलब है कि 1853 में हुए दंगों में भी इस संस्था की मुख्य भूमिका थी.
  • वर्ष 1961 में सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने भी प्रशासन से मांग करते हुए कहा की यहाँ से मूर्तियाँ हटा दी जाएँ और यहाँ पर हिन्दुओं को पूजा करने नहीं दी जाए.
  • इसके बाद लगातार 20- 25 वर्ष तक यह मुद्दा कोर्ट में चलता रहा, और इस विवाद में बढ़ोत्तरी नहीं हुई.

1980 का दशक:

1980 के दशक में यह मांग राजनैतिक रूप लेने लगी और यहाँ मांग किया जाने लगा कि इस स्थान पर मंदिर बनाया जाए. इस समय सन 1984 में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा एक धर्म संसद बुलाया गया और कई धार्मिक लोगों को एक स्थान पर इकठ्ठा किया गया. यहाँ पर यह तय किया गया कि रामजन्म भूमि मुद्दे को राजनैतिक तौर पर उठाया जाना चाहिए और इस स्थान पर रामजन्मभूमि मंदिर का ही निर्माण किया जाना चाहिए.

वर्ष 1986 में शाहबानो केस:

ऐसा कहा जाता है कि इस समय हिन्दुओं को खुश करने के लिए राजीव गाँधी सरकार ने बाबरी मस्जिद के ताले हिन्दुओं के पूजा पाठ के लिए खुलवा दिए. इस समय हुआ ये था कि फैज़ाबाद जिला कोर्ट से ये आदेश आया कि यहाँ के ताले खोल दिए जाएँ और आदेश के 1 घंटे के अन्दर ही यहाँ के ताले खोल दिए गये. हालाँकि कोर्ट के अहम् फैसलों के बाद भी सरकार महीनों इस पर अमल नहीं करती किन्तु यह इस सरकार की एक बहुत बड़ी विडम्बना थी कि फैसले के 1 घटे के अन्दर यहाँ के ताले खोल दिए गये. इस घटना का दूरदर्शन पर टीवी ब्रॉडकास्टिंग भी की गयी थी. कांग्रेस के इस फैसले से यह लगने लगा कि इन्होने हिन्दुओं को भी खुश करने की कोशिश की है.

इसके बाद विभिन्न स्थानों पर मुस्लिमों ने इसका विरोध करना शुरू किया और इसी समय ‘बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी’ का गठन किया गया. इसी समय बाबरी मस्जिद के मुद्दे को लेकर कई जगह दंगे होने शुरू हुए और सैकड़ों लोग मारे गये. ग़ौरतलब है कि इस समय से ही भारत में दंगों का दौर शुरू हुआ और लगातार एक लम्बे समय तक चलता रहा. आज भी आये दिन दंगों की खबरें सुनने को मिल ही जाती हैं.

हिंदुत्व की रानजीति का आविर्भाव:

भारत में इसी समय यानि 80 के दशक में हिंदुत्व की राजनीति का आविर्भाव हुआ. इस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इनसे संलग्न अन्य राजनैतिक दल जैसे विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा आदि ने इस मुद्दे को और भी जोर शोर से आगे बढ़ाया. जो मुद्दा अब तक एक लीगल केस और धार्मिक मामला था उसे भारतीय जनता पार्टी ने अब एक राजनैतिक कैंपेन का रूप दे दिया था.

इसी समय विश्व हिन्दू परिषद ने इस मुद्दे को लेकर एक कारसेवा की शुरूआत की. यह एक तरह का कैंपेन था. जिसके अंतर्गत आम हिन्दुओं को ये कहा जाता था कि वे आगे आयें और मंदिर निर्माण के वालंटियर कार्यों में अपना सहयोग दें. इस कैंपेन के अंतर्गत लोगों को ईंट वगैरह दान करने के लिए भी कहा गया, जिसका प्रयोग मंदिर बनाने के लिए किया जाना था. ऐसे लोगों को कारसेवक कहा जाता है. इस समय इस मुद्दे को सामाजिक रंग देने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अयोध्या में राम जानकी रथ यात्रा का आरम्भ किया. इसी समय विश्व हिन्दू परिषद के द्वारा युवाओं के लिए बजरंग दल का गठन किया गया. इस समय बजरंग दल का मुख्य कार्य रामजानकी रथयात्रा को सुरक्षा देना था.

इसी समय धार्मिक भावों को और भी सबल बनाने के लिए शिला पूजन का कार्यक्रम भी शुरू किया गया. शिला का अर्थ पत्थर होता है. इसके अंतर्गत देश भर के लोग रामनाम लिखी हुई ईंटें भेजते थे. इन ईंटों को इस आधार पर इकठ्ठा करना शुरू किया गया कि जब भी राम मंदिर का निर्माण आरम्भ होगा, उसमे इन ईंटों का प्रयोग किया जाएगा.

वर्ष 1989 की घटनाएं :

वर्ष 1989 के अगस्त के महीने में इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच ने बाबरी मस्जिद विवाद से सम्बंधित सभी पेंडिंग केस को एक स्थान पर कर दिया. इस समय कोर्ट की तरफ से ये आदेश था कि मस्जिद की स्थिति ज्यों की त्यों बनायी रखी जाए अर्थात जब तक फ़ैसला नहीं आ जाता तब तक यहाँ पर न तो मंदिर बनाया जाए और न ही मस्जिद.

इसी वर्ष नवम्बर के महीने में विश्व हिन्दू परिषद ने इस स्थान पर शिलान्यास का कार्यक्रम रखा. शिलान्यास किसी इमारत के बनने के पहले भूमि पूजन की विधि को कहा जाता है. हिन्दुओं में यह मान्यता है कि किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण से पहले वहाँ का शिलान्यास शुभ होता है.

इसी समय लोगों को यह लगने लगा था कि शिलान्यास के समय जो भी कारसेवक रामजन्म भूमि पूजन के लिए आ रहे हैं, वे बाबरी मस्जिद को तोड़ देंगे. अतः यह डर इसी समय से लोगों के अन्दर आ गया था. इस समय शुरू में हालांकि न तो उत्तरप्रदेश सरकार और न ही केंद्र सरकार इस शिलान्यास समारोह की अनुमति दे रही थी, किन्तु धीरे धीरे भाजपा और वीएचपी केंद्र को मनाने में सफ़ल हो गयी और इन्होने गृह मंत्रालय को यह आश्वासन दिया कि शिलान्यास के समय किसी भी तरह की तोड़ फोड़ या हिंसा नहीं की जायेगी और यह भूमिपूजन विवादित क्षेत्र से हट कर किया जाएगा.

इस समय जब कांग्रेस ने इसकी अनुमति दे दी, तो कांग्रेस के कई नेता और पार्टी समर्थक नाराज़ हो गये, क्योंकि कांग्रेस शुरू से यह दिखाती रही है कि वह एक धर्म निरपेक्ष पार्टी है. साथ ही शिलान्यास के लिये अनुमति देने पर यह लगने लगा कि कांग्रेस इस बात को मान रही है कि इस स्थान पर मंदिर का निर्माण होना चाहिए, जबकि मामला अभी तक कोर्ट में था.

  • कांग्रेस के ऐसी अनुमति के पीछे का मुख्य कारण उस समय आने वाले चुनाव थे. कांग्रेस इस समय अपनी मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति का खंडन करना चाहती थी, ताकि उसे हिन्दूओं के भी वोट प्राप्त हो सके. ताकि लोगों को लगे की कांग्रेस हिन्दुओ और मुस्लिमों दोनों धर्मों की ही पार्टी है.
  • इस समय राजीव गाँधी ने अपना चुनावी कैंपेन भी अयोध्या से ही शुरु किया था. हालाँकि अब तक ऐसा बहुत कम हुआ था कि कांग्रेस किसी धार्मिक स्थान से अपना चुनावी कैंपेन शुरू करे.
  • हालाँकि इस समय इस शिलान्यास से पूरे देशभर में दंगे होने लगे, क्योंकि सरकार के इस फैसले से कई मुस्लिम संगठन नाराज़ थे. इस समय होने वाले दंगों में लगभग 1000 लोग मारे गये थे.

लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा

इस सरकार के गठन के बाद इस समय भारतीय जनता पार्टी के तात्कालिक अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने एक रथयात्रा निकाली जिसे सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक ले जाया गया. इस रथ यात्रा के दौरान इन्होने हिन्दुओं को सन्देश दिया कि कोई भी सरकार अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर को बनाने से रोक नहीं सकती. इस समय इस रथयात्रा के ज़रिये पूरे 10,000 किलोमीटर की दूरी तय की गयी थी. किन्तु यह रथयात्रा जहाँ जहाँ से भी गुजरी वहाँ पर कई दंगे होने शुरू हो गये कई लोगों की मृत्यु हुई. सन 23 अक्टूबर 1990 में जब यह रथयात्रा बिहार से गुज़र रही थी, उस समय बिहार के तात्कालिक मुख्य मंत्री लालू प्रसाद यादव ने यात्रा को रुकवा दिया और लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करने के आदेश प्रशासन को दिए. 30 अक्टूबर को यह रथ यात्रा अयोध्या में समाप्त होनी थी. इस दिन यहाँ पर एक बड़ी संख्या में कारसेवक उपस्थित हुए और उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराने की कोशिश की. हालाँकि इस समय उत्तरप्रदेश में मुलायम सरकार थी. उन्होंने पुलिस को आदेश दिए कि यहाँ पर गोलियाँ चला दी जाएँ. पुलिस द्वारा गोलियाँ चला दी गयीं और कई कारसेवक मारे गये. अतः 30 अक्टूबर को बाबरी मस्जिद गिराने की कारसेवकों की कोशिश नाकाम हो गयी. 

. उत्तरप्रदेश की सरकार:       

इसी समय उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार बनी थी. भाजपा को यहाँ के विधानसभा चुनाव में कुल 425 सीटों में 221 सीटें हासिल हुईं थीं और कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें. इसके बाद इस सरकार ने कुछ नए फैसले लिए.

  • नयी सरकार ने विवादित स्थान के आस पास के 77 एकड़ की ज़मीन को अपने अधीन कर लिया, और कोर्ट को कहा कि वे इस स्थान का प्रयोग टूरिज्म के उद्देश्य से करेंगे. किन्तु इस ज़मीन के अधिग्रहण के बाद उन्होंने इसे जन्मभूमि न्यास नामक ट्रस्ट को लीज पर दे दिया.
  • इस समय इलाहाबाद कोर्ट ने इस स्थान पर सख्त रूप से किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर बैन लगा दिया.
  • सरकार ने कोर्ट में एक एफिडेविट जमा की और कहा कि सरकार कोई भी निर्माण कार्य उस स्थान पर नहीं करेगी.

बाबरी मस्जिद का गिरना:

बाबरी मस्जिद को उसी समय गिराया गया जब उत्तरप्रदेश में भाजपा का शासन चल रहा था. इस समय के कुछ विशेष घटनाओं का वर्णन निम्नलिखित हैं,

  • इलाहाबाद कोर्ट की तरफ से ये आदेश दिया गया था कि, इस स्थान पर किसी तरह का निर्माण कार्य नहीं होगा.
  • हालाँकि सरकार अभी भाजपा की थी. अतः विश्व हिन्दू परिषद को इसका ख़ासा लाभ मिलना था. उन्होंने कहा कि कारसेवा आवश्य होगी और जुलाई 1992 में पुनः कारसेवा का कार्यक्रम यहाँ पर आयोजित किया गया.
  • कारसेवक यहाँ पर एक निर्माण कार्य करने की कोशिश करने लगे. हालाकिं इस निर्माण कार्य को रोका गया किन्तु अब केंद्र और राज्य सरकार के सम्बन्ध पूरी तरह से तनावपूर्ण हो गये थे.
  • इस समय भारत के तात्कालिक प्रधानमन्त्री ने विश्व हिन्दू परिषद् और बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी को एक साथ आमने सामने बैठा कर मामला सुलझाने की कोशिश की. उन्होंने दोनों पक्षों को बुलाया और दिल्ली में इन दोनों के बीच बात से मामला सुलझाने की कोशिश की.किन्तु बात से कोई हल नहीं निकला.
  • इसी समय जब दोनों पक्षों में दिल्ली में बात चल रही थी, उस समय विश्व हिन्दू परिषद् ने पुनः एक धर्म संसद का आयोजन किया और अगले कारसेवा के लिए 6 दिसम्बर का दिन तय किया.
  • इस समय केंद्र के कई नेता और होम सेक्रेटरी ने प्रधानमन्त्री नरसिम्हाराव को यह सुझाव दिया कि वे उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार बर्ख़ास्त करके राष्ट्रपति शासन लागू कर दें, क्यों कि कल्याण सिंह भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री हैं, वे कारसेवकों को नहीं रोकेंगे.
  • हालाँकि नरसिम्हाराव ने सरकार बर्खास्त नहीं किया और सरकार से आश्वासन माँगा कि 6 दिसम्बर को होने वाले कारसेवा में किसी तरह का निर्माण कार्य अथवा कुछ ऐसा नहीं होने देंगे, जिससे लॉ और आर्डर खराब हो, कल्याण सिंह ने भी केंद्र सरकार को आश्वस्त किया कि वे ऐसा कुछ नहीं होने देंगे.
  • दूसरी तरफ कल्याण सिंह ने यह ऐलान कर दिया कि पुलिस किसी भी कारसेवक पर गोलियाँ नहीं चलायेगी. अतः कारसेवकों को पहले से यह पता लग गया था कि वे कुछ भी करें उन पर गोली नहीं चलाई जायेगी. इस तरह से प्रशासन को सुचारू रूप से चलाना पुलिस के लिए काफ़ी चुनौती पूर्ण कार्य हो गया था.
  • 6 दिसम्बर के दिन कारसेवा के लिए अयोध्या में लगभग 2 लाख से अधिक कारसेवक जमा हुए. एक दिन पहले अटल बिहारी वाजपेई और लालकृष्ण आडवाणी ने कारसेवकों को संबोधित करते हुए जोशीले भाषण दिए.
  • ग़ौरतलब है कि 6 दिसम्बर के दिन जब कारसेवा की जा रही थी वहाँ पर कई बड़े नेता जैसे लाल कृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार तथा अन्य कई भाजपाई और विहिप नेता मौजूद थे और लगातार भाषण दिए जा रहे थे.
  • बाद में लिब्राहन आयोग ने यह कहा भी था कि इन्हीं नेताओं के जोशीले भाषण से भीड़ उग्र हो गयी और उन्होंने तोड़ फोड़ करनी शुरू कर दी.
  • भीड़ उग्र हो जाने के बाद कारसेवक बाबरी मस्जिद के अन्दर घुसने की कोशिश करने लगे और इस समय उनके हाथ में जो भी औज़ार आये उनका प्रयोग करके बाबरी मस्जिद की एक एक ईंट को तोड़ के बाहर निकालने लगे.
  • हालाँकि नेताओं ने भीड़ से अपील की कि वे उस विवादित स्थान पर न जाएँ तथा गुम्बदों और मीनारों पर न चढ़ें किन्तु भीड़ को न कुछ दिखाई देता और न ही सुनाई.
  • सुबह से लोगों ने इस मस्जिद को तोडना शुरू किया था और शाम तक यह मस्जिद पूरी तरह से गिराई जा चुकी थी.
  • शाम के समय यहाँ पर एक छोटा सा मंदिर बना दिया गया और इस मंदिर पर रामलला की मूर्ति रख दी गयी. यह सबकुछ सिर्फ 1 दिन के अन्दर ही कर दिया गया.
  • इस स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने यह ऐलान किया कि उत्तर प्रदेश की सरकार को बर्ख़ास्त करके वहाँ पर राष्ट्रपति शासन लगाई जायेगी, हालाँकि इसके होने के कुछ घंटे पहले ही कल्याण सिह ने मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफ़ा दे दिया, जिस वजह से उत्तरप्रदेश की सरकार गिर गयी.
  • अगले दिन कल्याण सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस में बाबरी मस्जिद में जो भी हुआ उन सब घटनाओं की नैतिक जिम्मेवारी ली, क्योंकि उन्होंने कोर्ट में लॉ एंड आर्डर बरक़रार रखने का एफिडेविट जमा किया था. इसके बाद उन पर कोर्ट की अवमानना का केस चला तथा उन्हें 1-2 दिन की जेल भी हुई थीं.
  • इस स्थान पर हालांकी एक बड़ी संख्या में केंद्र सुरक्षा बल तथा राज्य पुलिस थी, किन्तु उन्हें किसी तरह की फायरिंग के आदेश नहीं थे और इस वजह से 2 लाख लोगों के आगे से पुलिस को हट जाना पड़ा.

बाबरी मस्जिद टूटने के बाद के दंगे:

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देश भर में सांप्रदायिक तनाव का माहौल बन गया और कई दुखद घटनाएं एक के बाद एक घटनी शुरू हुईं.

  • इस घटना के बाद पूरे देश भर में दंगे होने लगे. भारत में कई शहरों में दंगे हुए और सबसे अधिक दंगे मुंबई में होने शुरू हुए थे. यहाँ पर लगभग 1 हज़ार लोग मारे गये थे. मुंबई में आज़ादी के बाद इतने बड़े दंगे नहीं हुए थे.
  • पूरे देश भर में होने वाले दंगों में सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 2000 लोग मारे गये.
  • इसका असर पकिस्तान और बांग्लादेश तक गया. बाबरी घटना की वजह से उन देशों में एंटीहिन्दू दंगे होने शुरू हो गये. कराची में कई मंदिरों को तोड़ दिया गया और कई हिन्दुओ को वहाँ पर मार दिया गया. बंगलादेश में भी हिन्दुओं को माँरा जाने लगा.
  • इस घटना की वजह से मार्च 1993 में बम्बई में बाबरी मस्जिद का बदला लेने के लिए एक ही दिन में एक के बाद एक कई ब्लास्ट किये गये, जिससे पूरा मुंबई दहल गया.
  • इस ब्लास्ट में बमों को विशेषतः वहाँ रखा गया जहाँ पर हिन्दू जनसँख्या अधिक थी.

लिब्राहन कमीशन की स्थापना:

इन सभी दुखद घटनाओं से पूरा देश त्रस्त था. क़ानून व्यवस्था बुरी होती जा रही थी. ऐसे समय पर सरकार द्वारा लिब्रेहन कमिटी की स्थापना की गयी. इसके स्थापना के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं,

  • इसकी स्थापना बाबरी मस्जिद गिराने के पीछे के संपूर्ण घटनाक्रम की जांच के लिए की गयी. अतः ये एक जांच आयोग था जिसके जज जस्टिस लिब्रेहन थे.
  • यह कमिटी सबसे लम्बे चलने वाले कमिटियों में एक था. इसने लगभग 48 बार अपनी समयावधि बढाई और लगभग 17 वर्ष लगे रिपोर्ट पेश करने के लिए.
  • इस रिपोर्ट के अनुसार 68 लोगों को दोषी माना गया जिसमे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अटल बिहारी वायपेयी आदि भी शामिल थे. इस रिपोर्ट में कल्याण सिंह की काफ़ी आलोचना की गयी.
  • इस कमिटी ने यह भी कहा कि बाबरी मस्जिद गिराने के पीछे की साज़िश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रची थी, जिसमे विश्व हिन्दू परिषद की भी काफ़ी सहभागिता थी.
  • किन्तु इस रिपोर्ट को भाजपा, विहिप और आरएसएस ने यह कहते हुए नकार दिया कि यह रिपोर्ट पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है.

विभिन्न कोर्ट केस :

कोर्ट केस से सम्बंधित आवश्यक जानकारियाँ नीचे दी जा रहीं है,

  • वर्ष 2003 में इलाहाबाद कोर्ट ने पुरातत्व विभाग को मस्जिद के नीचे खुदाई करने को कहा और पता लगाने को कहा कि वहाँ पर मंदिर था या नहीं.
  • खुदाई में पुरातत्ववेताओं को कुछ ऐसे खम्भे मिले जिनमे हिन्दू संस्कृती सम्बंधित चीज़े बनी हुईं थीं.
  • पुरातत्व विभाग ने अपने रिपोर्ट कोर्ट में पेश करते हुए कहा कि वहाँ पर 10 वीं 11 वीं सदी के आस पास एक हिन्दू काम्प्लेक्स ज़रूर था, किन्तु इस विभाग ने इसके राम मंदिर होने की पुष्टि नहीं की.
  • इस रिपोर्ट को लेकर इतिहासकारों में हालाँकि कई तरह के विवाद हैं. इससे पहले भी अयोध्या में कई खुदाई हुए हैं, 19 वी सदी के एक खुदाई में यहाँ पर बौद्ध धर्म के अवशेष भी पाए गये थे. अतः बौद्धों का कहना है कि इस स्थान पर न हिन्दू और न मुस्लिम बल्कि पहली बौद्धों के लिए महत्वपूर्ण हैं.

मंदिर बनाने वालों के तर्क:

जो लोग यह कहते हैं कि इस स्थान पर मंदिर बन्ने चाहिए, उनके तर्क निम्नलिखित हैं,

  • वे पुरातत्व विभाग के के सुबूतों को मानते हुए कहते हैं कि यह मंदिर होने का प्रमाण है अतः यहाँ पर मंदिर बनना चाहिए.
  • मुग़ल काल में जो यूरोपियन भ्रमणकारी भारत आये थे, उन्होंने भी अपने लेखों में इस स्थान पर मस्जिद के होने की बात दर्ज की है.
  • इन लेखों में यह स्थान ‘मस्जिदे जन्मस्थान’ के रूप में लिखा गया है. अतः इससे ये साबित होता है कि वहाँ पहले जन्मस्थान था.
  • राम चबूतरे पर एक लम्बे समय से पूजा अर्चना की जा रही है. अतः वहाँ पर मंदिर था. अन्यथा कोई व्यक्ति मंदिर के बाहर बैठकर पूजा पाठ क्यों करेगा.

मस्जिद बनवाने वालों के तर्क:

जो लोग वहाँ मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, उनके तर्क निम्नलिखित हैं.

  • इनके अनुसार पुरातत्व विभाग के रिपोर्ट से पूरी तरह यह पता नहीं लगता कि वहाँ पर कोई मंदिर ही था.
  • इन के पीछे वक्फ़ बोर्ड् के इतिहासकारों का दावा है कि मस्जिद बनाते समय उस स्थान के स्थानीय कारीगरों को काम दिया गया. अतः उन्होंने उसी तरह के पिलर बनाए जो वे बना सकते थे या उन्हें आता था.
  • इस स्थानीय कारीगरों को इस्लामी फलसफे नहीं मालूम थे कि इस्लाम में आप फिगर वगैरह नहीं बना सकते हैं. अतः उन्होंने उसी डिजाईन में पिलर बनाए जो उन्हें आता था और अपनी कारीगरी ज़ारी रखी और वह मज्जिद हिन्दू कलाकृतियों के आधार पर बनायीं गयीं.
  • अपने तर्क में नुस्लिम इतिहास्स्कार इस बात का भी तर्क देते हैं की रामचरितमानस में इस घटना की जिक्र क्यों नहीं आता. यह धार्मिक पुस्तक गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या में जाकर उसी समय लिखी थी, जब यह मस्जिद बनायी जा रही थी. अतः उनका प्रश्न होता ही कि यदि इस समय कोई मंदिर तोड़ा गया होता तो क्या इस घटना का वर्णन श्रीरामचरितमानस में नहीं किया जाता.
  • मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड के इतिहासकारों के अनुसार यह मस्जिद लगभग 460 वर्षों से उस स्थान पर खड़ी थी. अतः इतने लम्बे समय से खड़ी एक इमारत, जो कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, क्या उसे तोडना सही है. अतः इतिहास में ये मस्जिद तोड़ने वाले कितने अन्दर तक जायेंगे और इतिहास का संशोधन करेंगे.’
  • अतः इनका मानना है जो बाबरी मस्जिद तोड़ दी गयी है, उसे फिर से वहाँ बना दी जाए क्यों की मस्जिद का टूटना बहुत ग़लत था.

कानूनी केस:

यह स्थान हिन्दुओं और मुस्लिमों दोनों की आस्था का प्रश्न है, अतः इसे लेकर एक लम्बे समय तक कोर्ट केस चल रहा है. यहाँ पर इस मुद्दे से सम्बंधित कोर्ट केस का वर्णन किया जा रहा है,

  • एक समय इलाहाबाद हाई कोर्ट में सारे केस एक साथ जोड़ दिए गये थे.
  • इस केस की सुनवाई 20 वर्षों तक हाईकोर्ट में चली. ध्यान देने वाली बात ये है कि हाई कोर्ट में चलने से पहले यह केस लगभग 35- 40 वर्षों तक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में चली. अतः लगभग 65- 70 वर्षों से यह केस कोर्ट में ही चल रहा है, जो कि भारत की न्याय व्यवस्था की सक्रियता को भलीभांति दर्शाता है.
  • अन्ततः 30 सितम्बर 2010 को हाई कोर्ट ने अपना फैसला जारी किया. इस फैसले के अंतर्गत कोर्ट ने इस 77 एकर की विवादित स्थान को तीन हिस्सों में विभाजित कर दिया.
  • ये तीन हिस्से निम्नलिखित हैं,
  1. ज़मीन का पहला हिस्सा रामलला को गया. ग़ौरतलब है कि इस कोर्ट केस में भगवन राम को भी एक पार्टी बना लिया गया, जिसका प्रतिनिधित्व राम जन्मभूमि न्यास कर रही थी. राम जन्मभूमि न्यास को इस विवादित स्थान का वह हिस्सा दिया गया जहाँ पर छोटा सा मंदिर बनाया गया था.
  2. इसके बाद निर्मोही अखाड़ा को भी इसके अंतर्गत हिस्सा प्राप्त हुआ. इस संस्था को सीता रसोई और श्री राम चबूतरा दे दिया गया.
  3. इसके बाद जो भी बाक़ी की ज़मीन है, उसे सुन्नी वक्फ़ बोर्ड दे दिया गया.

हालाँकि कोर्ट के इस फैसले से तीनों दल ही खुश नहीं थीं और अतः तीनों ही नाराज़ हो गये. उनके अनुसार कोर्ट ने उन तीनों को ही आधा अधूरा हक़ दिया था. अतः इस फैसले के ख़िलाफ़ तीनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. ध्यान देने वाली बात ये है कि इस अपील के बाद सात साल तक कोई सुन्वाइ नहीं हुई. अन्तः अगस्त 2017 में इस केस की हियरिंग सुप्रीम कोर्ट में शुरू होनी थी. किन्तु छः सात भाषाओँ में मौजूद इस केस के दस्तावेजों का अनुवाद आदि करने के लिए समय दिया गया है और अब इस केस की सुनवाई 5 दिसम्बर 2017 को होगी.     

  • ध्यान देने वाली बात ये है कि सीबीआई ने अपने कोर्ट में लालकृषण आडवानी, उमा भारती, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर पर आपराधिक साजिशों के केस चल रहे हैं. जबकि अशोक सिंघल तथा गिरिराज किशोर की मौत हो चुकी है.
  • मई 2017 में इन्होने इस कोर्ट में अपनी हाजिरी दर्ज कराई थी, जहाँ से इन्हें बेल मिल गयी थी, किन्तु केस अभी भी कोर्ट में चल रहा है.

बाबरी मस्जिद मुद्दा भारत के महत्वपूर्ण क्यों:

इतने लम्बे समय तक यह घटना चलने के पीछे कई ऐसी बातें हैं, जिनकी वजह से यह मुद्दा भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है. ध्यान देने वाली बात है कि यह सिर्फ एक मंदिर मस्जिद विवाद है, फिर इसके लिए हज़ारों लोगों की जान जाने की क्या वजह है, देश में राजनीति को यह किस तरह से प्रभावित कर रहा है, यहाँ पर इन सभी बातों का वर्णन किया जा रहा है,

  • ध्यान दें कि इस मुद्दे ने देश की एकता और अखंडता को सीधी चुनौती दी है.इस मुद्दे की वजह से देश के सामाजिक सौहार्द्र एक बहुत बड़े खतरे में पड़ गया था.
  • इस समय क़ानून व्यवस्था भी फ़ैल होने लगी थी और मुंबई जैसे आधुनिक शहर में भी दंगे हुए और हज़ारों लोग मारे गये. अतः भविष्य में ऐसी स्थिति न आये इसके लिए इस मुद्दे पर साईं समय पर सही फैसला करना आवश्यक है.
  • इसके बाद भारत में कई आतंकवादी हमले भी हुए. और हमलावरों ने इन हमलों का कारण बाबरी मस्जिद गिराने को बताया. यहाँ तक कि इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों ने पूछ ताछ् के दौरान यह साफ़ कहा कि वे बाबरी मस्जिद का बदला ले रहे हैं.
  • भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है, जो अपने संविधान को सर्वोपरि रखता है और ‘रूल ऑफ़ लॉ’ का पालन करता है. वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद गिरा दिए जाने पर विश्व भर में भारत की छवि खराब हुई थी. भारत के धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्न उठा और कई देशों ने भारत की निंदा की.
  • कई देशों ने ये भी कहा की भारत वहाँ के अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पा रहा है.
  • वर्ष 2002 में होने वाले गोधरा काण्ड का भी एक करण बाबरी मस्जिद ही है. ध्यान देने वाली है कि इस स्थान पर जिस ट्रेन को जलाया गया था उसमे लगभग 60 कारसेवक मौजूद थे. ये कारसेवा करने के लिए अयोध्या जा रहे थे. इन्हें यहाँ पर जला दिया जाता है और फिर गुजरात में दंगे शुरू हो जाते हैं.
  • भारत एक धार्मिक देश रहा है अतः यहाँ की राजनीति मे धर्म की एक भूमिका अवश्य रहती है किन्तु 80 के दशक के समय जब से यह मुद्दा उछाला जाने लगा, देश में सांप्रदायिक राजनीति को खुल कर बढ़ावा मिला तथा धर्म और राजनीति के बीच की मर्यादा समाप्त हो गयी.
  • अब यह पूरी तरह से एक राजनैतिक मुद्दे का रूप ले चुका है.देश की रूलिंग पार्टी भारतीय जनता पार्टी तो चुनावों से पहले अपने घोषणापत्र लोगों को दिखाते हुए यह कहती है कि राम मंदिर बनवाना उनके राजनैतिक अजेंडे में शामिल है.
  • `ग़ौरतलब है कि मंदिर और मस्जिद बनवाना सरकारों का कार्य नहीं होता. इनका कार्य देश वासियों को एक् अच्छी व्यवस्था और देश के लॉ एंड आर्डर को मेन्टेन करना होता है.

आगे की राह: चूँकि इस मुद्दे से सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा मिला है, जो लोकतंत्र के लिए सही नहीं है. आगे इस मुद्दे का रास्ते का अनुमान निम्नलिखित है,

  • भारत एक लोकतान्त्रिक देश है.किसी भी लोकतान्त्रिक देश को एक लम्बे समय तक स्वस्थ रूप से चलाने के लिये सबसे आवश्यक बात ये है कि यहाँ के क़ानून और न्याय व्यवस्था का सुचारू रूप से चलना ज़रूरी है.
  • इस मुद्दे पर कोर्ट का जो भी फैसला आता है, उसे मानने की आवश्यकता होती है, तथा रूल ऑफ़ लॉ किसी भी क़ीमत पर बनाए रखने की ज़रुरत होती है. यानि क़ानून कोई भी व्यक्ति या संस्था अपने हाथ में न ले और इसे चलाने की जिम्मेवारी सरकार के हाथ होनी चाहिए.
  • भारत के लोग बहुत ही धार्मिक होते हैं. यहाँ पर विभिन्न धर्म सम्प्रदाय के लोग हैं, अतः सभी को एक दुसरे के धर्म साम्प्रदाय की इज़्ज़त करने की ज़रुरत है. इस नीति के साथ ही मिल जुल कर आगे बढ़ा जा सकता है.
  • कई उच्च पदाधिकारी नेताओं ने इस बात को माना भी है कि वे सुप्रीम कोर्ट से आने वाले सभी निर्देशों और फैसलों का पालान करेंगे. कुछ ऐसे भी नेता भी हैं जो ये कहते हैं कि किसी भी क़ीमत पर मंदिर या मस्जिद बन कर रहेगा किन्तु ऐसे नेताओं की संख्या बहुत कम है. अधिकतक नेता सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने की ही बात करते हैं.
  • ध्यान देने वाली बात है अब भारत में नेताओं और आम लोगों की एक नयी जनरेशन आ रही है., जिसमे हम और आप शामिल हैं. अतः इस मुद्दे का सारा दारोमदार हम पर है कि हम इस मुद्दे को किस तरह से संभाल के चलते हैं.
  • इस नए जनरेशन की समझदारी का एक उदाहरण वर्ष 2010 में इलाहाबाद कोर्ट के फैसले के बाद देखा गया था, कि कोर्ट के फैसले के बाद देश में किसी भी स्थान पर किसी तरह की हिंसा नहीं हुई थी.

राम मंदिर कब बनेगा: राममंदिर बनने का कोई भी समय अभी तक तय नहीं हुआ है. इस समय यह केस सुप्रीमकोर्ट में चल रहा है. जब तक देश के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला नहीं आ जाता, इस विवादित स्थान पर कुछ नही हो सकता है. हालाँकि इस मुद्दे को राजनीतिकी पार्टियों द्वारा समय समय पर चुनावी मुद्दा बनाया जाता रहा है, किन्तु चुनाव के बाद इस विवाद पर कोई सीधा फैसला नहीं आ पाता. इस वजह से सुप्रीमकोर्ट के फैसले का इतजार करने की ज़रुरत है, क्यों कि इस फैसले के बाद ही इस स्थान पर कुछ भी हो सकेगा.

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मुद्दे पर प्रमुख घटनाक्रम (Ram Mandir and Babri Masjid Issue)

वर्ष घटनाएँ
1528 बाबर के सेनापति मीर बांकी ने पौराणिक रामजन्म भूमि को तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया. हिन्दुओं का कहना है कि जिस जगह पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया वह स्थान भगवान राम का जन्म स्थान है और हिन्दुओं के लिए वह पवित्र और पूज्यनीय स्थान है.
1853 विवादित जगह पर कब्जे को लेकर अयोध्या में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए.
1859 विवाद को बढ़ते देखकर अंग्रेजी सरकार ने मामले को संज्ञान में लेते हुए विवादित परिसर को दो भागों में बांटकर कंटीले तारों से उसकी घेराबंदी कर दी और दोनों समुदायों को वहां अलग-अलग पूजा और इबादत करने की मंजूरी प्रदान की.
1885 पहली बार मामला अदालत में पहुंचा और राम जन्म भूमि के महंत रघुवर दास ने फैजाबाद अदालत से राम मंदिर निर्माण की अनुमति मांगी.
1949 कुछ हिन्दुओं ने चोरी-छिपे विवादित परिसर के गर्भगृह में भगवान राम की मूर्ति को स्थापित कर दिया. हिन्दुओं ने वहां नियमित पूजा शुरू कर दी.
1950 राम जन्म भूमि के महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिन्दुओं द्वारा पूजा जारी रखने के लिए अदालत में मुकद्दमा दायर किया.
1959 अयोध्या स्थित निर्मोही अखाड़ा के नागा साधुओं ने विवादित स्थल पर दावा ठोंकते हुए कोर्ट में मुकदमा दायर किया.
1961 उत्तर प्रदेश के सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद का हवाला देते हुए और विवादित परिसर पर दावा ठोंकते हुए कोर्ट का रुख किया.
1984 विश्व हिन्दू परिषद् ने विवादित ढ़ांचे का ताला खुलवाने और वहां पर विशाल राम मंदिर निर्माण के लिए देशभर में एक अभियान छेड़ा.
1986 फैजाबाद की जिला अदालत ने विवादित स्थल पर हिन्दुओं को पूजा करने की इज़ाज़त दी और परिसर के ताले खोले गए. विरोधस्वरुप मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी का गठन किया.
1989 भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की. इसी वर्ष 9 नवम्बर को केंद्र में सत्तारूढ़ राजीव गाँधी की सरकार ने विवादित ढ़ांचे के नजदीक मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास करने की अनुमति प्रदान की.
1990 अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा शुरू कर मामले को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया.
1991 उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने विवादित परिसर के आस-पास की 2.77 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया.
1992 6 दिसम्बर को अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए एकत्र हुए हजारों कार सेवकों ने उन्माद में विवादित ढ़ांचे को गिरा दिया. इसी वर्ष इस घटना की जांच के लिए लिब्राहन आयोग का गठन हुआ.
2002 विवादित स्थल पर दावे को लेकर उच्च न्यायालय की इलाहाबाद पीठ में सुनवाई शुरू हुई.
2003 मामले के पक्षकारों के दावे की सच्चाई को जांचने के उद्देश्य से उच्च न्यायालय के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई शुरू की.
2010 30 सितम्बर को इलाहाबाद उच्च नयायालय ने इस विवाद पर ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा, कि विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटकर एक हिस्सा राम मंदिर के लिए, दूसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए.
2011 हाई कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी.
2017 21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को धर्म और आस्था से जुड़े होने का हवाला देते हुए सभी पक्षों को आपसी बातचीत से समस्या का हल निकालने की अपील की.

बहरहाल, राम मंदिर का मुद्दा इतना अधिक संवेदनशील है कि दोनों पक्ष शायद ही समस्या के समाधान के लिए एक टेबल पर आएं. इसकी आशंका सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी जता दी है. फिर भी कोर्ट ने मामले पर सुनवाई जारी रखते हुए स्वामी को 31 मार्च 2017 को कोर्ट में अपना पक्ष रखने को कहा है. परन्तु कोर्ट की इस टिपण्णी पर केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा क्या रुख अपनाती है, इसपर आगे सबकी निगाहें टिकी रहेगी.

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कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं
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